राम,अयोध्या और आडवाणी

भाजपा जैसी पार्टी को पहली बार जिस व्यक्ति ने राष्ट्रीय फलक पे स्थापित किया आज वही विराट व्यक्तित्व (लालकृष्ण आडवाणी) किसी शापित की भांति पिड़ा के शतसैया पर पड़ा अपनी मौन कराह के साथ जीने को बाध्य लग रहा है।

राजनैतिक उदय होते भाजपा के यौवन काल की

शायद लालकृष्ण आडवाणी ने राजनैतिक उदय होते भाजपा के यौवन काल की उस “राजनैतिक सुंदरी का अपमान किया जो कभी महाभारत के भिष्म पितामह ने की थी।” काश आडवाणी ने “कुर्सी के उस प्रणय को स्वीकार कर लिया होता तो आज कुर्सी उनसे अपमानित अपने यौवन उन्मादो का बदला न लेती” और वैसे भी युगो-युगो से तमाम विद्वत लोगो ने अपनी नीतियो में ये कहा है कि “सत्ता का सर्वोच्च कभी भी संवेदना के मोल नही जानती। ये निर्णय की वो पराकाष्ठा है जिसे लेते हुये व्यक्ति के चेहरे पर कंपन या सिकन नहीं होनी चाहिये।”

भाजपा की मूर्छाकाल का सुखैन वैद्य

आज भाजपा की मूर्छाकाल का ये सुखैन वैद्य सत्ता के लक्ष्मण को ठीक कर खुद इतना असहाय और बीमार हो गया है कि खुद अयोध्या के राम इस कलयुग के वैद्य की कोई भी मदद करने में असमर्थ हैं। याद करिये बाबरी विध्वंस को तो दिल और दिमाग में एक-एक चित्र उभर आयेंगे। आज के विवाद की “बाबरी” ने तमाम को सत्ताशीन किया। इसी बाबरी को एक क्रांति का रूप देकर पूरे देश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को राष्ट्रीय चिंतन में परिवर्तित कर उस धर्म की नगरी अयोध्या के पवित्र सीने पे बाबर जैसे वाह्य आक्रांता के खड़े किये मस्जिद को ढ़हा दिया।” केवल उस भगवान श्री राम के लिये जो महज राम नहीं अपितु शत-प्रतिशत भारतियों के लिये एक मर्यादा का वे मूर्तरुप है,जिसकी परिकल्पना आज भी रामराज्य के रुप में की जाती है। अगर हमारे धर्म और आस्था से “भगवान शिव,कृष्ण और राम निकाल दिये जाये तो करोड़ो हिंदू अनुयायियों के पास धर्म के नाम पर बचेगा ही क्या ?”

आडवाणी जी के साथ तब जय श्री राम कहा था आज

जिस व्यक्ति ने एक हनुमान की तरह भारत रत्न स्व0 अटल बिहारी बाजपेयी जी को सत्ता सौपी वे आज की प्रदुषित राजनीति में अब शायद ही दिखे। आज उन्हीं के रोपित किए पेड़ इतने विशाल और शक्तिशाली हो गये है कि खुद उन्हें ही हाशिये पर रखकर इनकी अघोषित उपेक्षा कर रहे हैं। तमाम झंझावतो के इतर एक उम्मीद थी कि ये “दिया” अपनी राजनीति के अवशान के दिनो में शायद इस विशाल भारत के राष्ट्रपति की गरिमा को प्राप्त कर अपने जीवन के बचे-खुचे युग को एक गरिमा के साथ जी कर अलविदा कहेगा। लेकिन अब हालात और परिस्थितियो ने कुछ एैसी करवट ले ली है,जिसे देख लग रहा कि अब शायद इस उम्मीद के आखिरी चेहरे पर चादर पड़ गई है। जिसके बाद राजनीति के कमरे की सारी झिर्री भी बंद हो जाती है और इच्छाओं के सारे पदचाप मौन हो जाते हैं।” जिन लोगों ने आडवाणी जी के साथ तब जय श्री राम कहा था आज सभी उन्हें छोड़कर चले गए!और उनके होंठो पे महात्मा गाँधी के उस आखिरी अनूगुंज की तरह रह गया है सिर्फ…..#हे राम”

रंगनाथ द्विवेदी
रंगनाथ द्विवेदी

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