Gandhi के जीवन की सबसे बडी विफलता

महात्मा गांधी Gandhi के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता पूछी जाए,तो वह यही है कि वे भारत विभाजन के प्रश्न पर मुहम्मद अली जिन्ना को राजी नहीं कर सके। 1944 में जब इस मुद्दे पर गांधी और जिन्ना की बातचीत पूरी तरह विफल होने के कगार पर आ चुकी थी,तब गांधी ने राजनीति के बजाय मानवीय भाईचारे वाले संबंध से काम लेना चाहा था,लेकिन गांधी की वह पहल और अपील भी जिन्ना के कठोर हृदय को पिघला न सकी।

Gandhi के सत्याग्रह का था कट्टर दुश्मन

22 फरवरी,1908 को गांधी Gandhi द्वारा ‘इंडियन ओपिनियन’ में लिखे गए एक लेख से पता चलता है कि हिंदू-मुसलमान के बीच फूट के प्रश्न पर जिन्ना का रवैया संभवतः तब भी कोई प्रेम, सद्भाव और एकता वाला नहीं था। गांधी उस समय दक्षिण अफ्रीका में ही थे और वहां अपने सत्याग्रह आंदोलनों को लेकर प्रसिद्धि पा चुके थे। जिन्ना भी उसी समय से हिंदू-मुस्लिम प्रश्नों में दिलचस्पी ले रहे थे और ‘सत्याग्रह’ जैसे तरीकों को शक की निगाह से देखते थे।

हिन्दू-मुस्लिम एकता का विरोधी था कायदे आजम

गांधी और जिन्ना के परिचय और संबंधों में पहले से ही हिंदू-मुसलमान वाली राजनीति हावी थी। जबकि गांधी चाहते थे कि हिंदू-मुसलमानों के बीच फूट पैदा करने की किसी भी कोशिश का डटकर मुकाबला किया जाए। गांधी ने जिन्ना के व्यक्तित्व को जब ठीक से समझने की कोशिश की, तो उन्हें यह भी लगा था कि अपने सांस्कृतिक संदर्भों और अपनी मातृभाषा से पूरी तरह कटे होने के कारण भी जिन्ना की राजनीतिक परिपक्वता में कमी है।

चार नवंबर, 1917 को गोधरा में गुजरात राजनीतिक परिषद् की बैठक मे गांधी और तिलक के साथ-साथ जिन्ना भी शामिल हुये।गांधी के अनुरोध पर जिन्ना ने सुधारों के लिए कांग्रेस-लीग योजना संबंधी प्रस्ताव अंग्रेजी में न पेश करके गुजराती में पेश किया था।

राष्ट्रवादी मुसलमानों की निष्ठा पर उठाए जा रहे सवाल

आज जिन्ना को फिर से भारतीय राजनीति में इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है। एएमयू में लटकी जिन्ना की किसी महत्वहीन सी फोटो के जरिए राष्ट्रवादी मुसलमानों की निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं या फिर कुछ मूढ़मति मुस्लिमवादी नौजवानों की कट्टरता की वजह से भारत के राष्ट्रवादी मुसलमानों को भी घेरने की कुत्सित चेष्टा की जा रही है।

गांधी ने दो-टूक शब्दों में कहा था- ‘मैं राष्ट्रवादी हूं,लेकिन किसी को खुश करने के विचार से राष्ट्रवादी नहीं हूं, बल्कि इसलिए हूं कि इसके अलावा मैं कुछ और हो ही नहीं सकता और यदि मैं जिन्ना के पास गया हूं तो स्वयं अपने राष्ट्रवादी मुसलमानों और अन्य राष्ट्रवादियों के समान हितों की खातिर गया हूं।

यहाँ यह समझना होगा कि किसी भी ‘हिंदू हित’ या ‘मुस्लिम हित’ को परस्पर-विरोधी बताने या सांप्रदायिक नज़रिए से पेश करने से जिस हित की भयानक दूरगामी क्षति होती है, वह ‘भारतीय हित’ और ‘मानवीय हित’ की ही होती है।

गिरीश अवस्थी

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