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महाकुंभ, महा शिवरात्रि और भस्म लपेटे नागा साधु

  दया शंकर चौधरी

महाकुंभ (Maha Kumbh) का पहला शाही स्नान 13 जनवरी को संपन्न हो गया और इसका समापन आज 26 फरवरी को महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के पर्व पर हो रहा है। महाकुंभ को दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन माना गया है। इस आयोजन में विशेष आकर्षक दृश्य नागा साधुओं (Naga Sadhus) की शोभायात्रा होती है, जिसे शाही स्नान के पहले निकाला जाता है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ ही इस शोभायात्रा का गहरा संबंध भगवान शिव की शिव बारात से भी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार जब भगवान शंकर माता पार्वती से विवाह रचाने के लिए कैलाश पर्वत चले तो उनकी बारात बहुत ही भव्य और अलौकिक थी। देवों के देव महादेव की बारात में समस्त ब्रह्मांड और तीनों लोकों के देवी-देवता, साधु-संत, सुर-असुर, गंधर्व, यक्ष-यक्षिणी, तांत्रिक, सभी ग्रह आदि शामिल हुए थे।

नागा साधु नहीं हुए थे शिव बारात में शामिल

जब भगवान शिव माता पार्वती से विवाह रचाकर वापस कैलाश पर्वत लौटे तो नागा साधु शीश झुकाए रास्ते में खड़े थे। जब भगवान शिव की उन पर नजर पड़ी तो वह रोने लगे। इस पर भगवान शिव ने उनसे रोने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि वह भगवान शिव की तपस्या में इतने लीन थे कि वह शिव बारात में शामिल नहीं हो पाए हैं। इसलिए वह बहुत दुखी हैं।

महाकुंभ, महा शिवरात्रि और भस्म लपेटे नागा साधु

नागा साधुओं को शिव ने दिया था वचन

जैसा कि भगवान शिव का अपने भक्तों के प्रति कोमल स्वभाव है। उन्होंने नागा साधुओं को वचन दिया कि जल्दी ही सभी नागा साधुओं को शाही बारात निकालने का मौका मिलेगा, जिसमें स्वयं भगवान शंकर शामिल होंगे। यही कारण है कि नागा साधु महाकुंभ के दौरान भव्य शोभा यात्रा निकालते हैं, जिसे भगवान शिव की बारात का प्रतीक माना जाता है।

नागाओं की शोभायात्रा में शामिल होते हैं भगवान शकंर

ऐसा माना जाता है कि नागा साधुओं को भगवान शिव के सच्चे भक्त माना गया है। इनकी शोभायात्रा शिव की बारात के समान मानी जाती है, जहां शिवगण पूरी भक्ति और उत्साह के साथ चलते हैं। मान्यता है कि नागा साधुओं की इस शोभा यात्रा में भगवान शिव स्वयं शामिल होते हैं।

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नागा साधुओं का भस्म सिर्फ राख नहीं… छिपे होते हैं कई विटामिन, जानिए इसका विज्ञान?

नागा साधु अपने शरीर पर भस्म या राख लगाते हैं, जिसे वे ‘भभूत’ भी कहते हैं। इस परंपरा के पीछे धार्मिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। जानिए नागा साधुओं के भस्म लगाने के महत्व के बारे में…..।

शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं? नागा साधु

नागा साधु कठोर तपस्या और साधना के लिए जाने जाते हैं। वे भगवान शिव के परम भक्त होते हैं और अक्सर महाकुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में देखे जाते हैं। इन साधुओं का जीवन पूरी तरह से सांसारिक सुखों से दूर होता है, लेकिन एक बात जो अक्सर लोगों के मन में उठती है, वह यह है कि ये साधु अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?

दरअसल, भस्म का उपयोग एक धार्मिक प्रतीक के रूप में किया जाता है और यह पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है। भगवान शिव के भक्त होने के कारण, नागा साधु चिता की राख या धूनी की राख अपने शरीर पर लगाते हैं। यह उन्हें नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।

महाकुंभ, महा शिवरात्रि और भस्म लपेटे नागा साधु

भस्म बनाने की प्रक्रिया

भस्म बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। हवन कुंड में पीपल, पाकड़, रसाल, बेलपत्र, केला और गाय के गोबर को जलाकर राख तैयार की जाती है। इस राख को छानकर कच्चे दूध में लड्डू बनाया जाता है। इसे सात बार अग्नि में तपाकर और फिर कच्चे दूध से बुझाया जाता है। यह प्रक्रिया भस्म को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इस भस्म को बाद में नागा साधु अपने शरीर पर लगाते हैं।

भस्म का लाभ

लोग यह सवाल करते हैं कि नागा साधु ठंड के मौसम में बिना कपड़ों के रहते हैं, उन्हें ठंड क्यों नहीं लगती। इसका एक कारण यह है कि भस्म शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है। भस्म शरीर पर एक इंसुलेटर का काम करती है, जिससे साधु ठंड या गर्मी से प्रभावित नहीं होते। इसमें कैल्शियम, पोटैशियम और फास्फोरस जैसे खनिज होते हैं, जो शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करते हैं। भस्म उनके मानसिक और आत्मिक शुद्धिकरण का भी एक तरीका है। इस प्रक्रिया के जरिए नागा साधु अपने आप को ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित और सांसारिक मोह-माया से मुक्त रहते हैं।

भस्म और साधना का संबंध

नागा साधु भस्म को सिर्फ शरीर को गर्म रखने के लिए नहीं लगाते, बल्कि यह उनके साधना और तपस्या का हिस्सा भी है। वे मानते हैं कि भस्म शरीर को शुद्ध करती है और आत्मिक शक्ति को बढ़ाती है। यह उन्हें मानसिक शांति, स्थिरता और ध्यान की गहरी स्थिति में मदद करती है। इसके अलावा, भस्म को लगाने से साधु अपने शरीर के सारे भौतिक बंधनों से मुक्त होते हैं और वे पूरी तरह से आत्मा की साधना में लीन हो जाते हैं।

नागा साधुओं का रहन-सहन

नागा साधु अपने शरीर पर भस्म लगाकर निर्वस्त्र रहते हैं और अपने शरीर की रक्षा के लिए चिमटा, चिलम, कमंडल आदि वस्तु और हथियार रखते हैं। उनके पास त्रिशूल, तलवार और भाला होते हैं, जो उन्हें आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं और उनके मस्तक पर त्रिपुंड उनके विशेष रूप को दर्शाते हैं।

राख का विज्ञान, छह घंटे में बैक्टीरिया खत्म

नागा साधुओं को राख लपेटे भीषण ठंड में भी रहते तो सभी ने देखा है। इस राख के पीछे के विज्ञान की हमेशा चर्चा भी होती है। अब रिसर्च में भी राख की ताकत का पता चल गया है।

दशकों पहले घर-घर राख से बर्तन साफ करने और बच्चे के दूध पीते ही राख चटाने की परंपरा के पीछे छुपा हुआ विज्ञान था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राख को अशुद्ध बता कंपनियों द्वारा डिटर्जेंट की ब्रांडिंग के बीच चौचरण सिंह विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग ने चुटकीभर राख की ताकत सिद्ध कर दी है। मात्र छह घंटे में राख ने ई-कोलाई और एस ऑरस बैक्टीरिया को पूरी तरह से खत्म कर दिया।

महाकुंभ, महा शिवरात्रि और भस्म लपेटे नागा साधु

प्रो संजीव कुमार शर्मा के निर्देशन में अभिषेक शर्मा द्वारा विज्ञान की कसौटी पर कसी राख की ताकत को साउथ कोरियन इंटरनेशनल जर्नल ’एडवांसेज इन नैनो साइंस’ और ’नैनो मैटेरियल’ जर्नल ने प्रकाशित किया है। राख पर शोधार्थियों को 2023 में कोरियन एवं 2024 में भारतीय पेटेंट भी मिल गया है। राख ने हानिकारक इन दोनों ही बैक्टिरिया को सामान्य तापमान 37 डिग्री सेल्सियस पर खत्म किया।

प्रो शर्मा के अनुसार लैब में गन्ने की खोई, चीड़ की लकड़ी और अखरोट के छिलके से तैयार राख को लेकर प्रयोग किए गए। उक्त बैक्टीरिया के लिए गन्ने की खोई से प्राप्त राख प्रयुक्त हुई। खोई जलाकर मिली राख को कपड़े में छानकर इन्क्यूबेटर में बैक्टीरिया पर प्रयोग किया। राख में मुख्य रूप से पोटेशियम, सिलिकेट, कॉर्बन एवं मैग्नीशियम होता है। उक्त प्रक्रिया में पोटेशियम सिलिकेट की मौजूदगी में बैक्टीरिया वृद्धि नहीं कर सके और छह घंटे में नष्ट हो गए। प्रोशर्मा के अनुसार सिलिकेट क्षारीय होता है और क्षारीय प्रकृति में कोई वायरस या बैक्टीरिया पनप नहीं सकता।

चुटकीभर राख ने दिए सदियों पुराने जवाब

राख हमारी संस्कृति, आस्था और व्यवहार का हिस्सा रही है। हमारे पूर्वजों की पीढ़ी इसके पीछे के विज्ञान को नहीं समझते थे, ऐसे में उन्होंने इसे परंपरा में शामिल कर लिया। वैज्ञानिकों ने पति लगाया है कि दूध पीने के बाद आधा घंटे में मुंह में बहुत से बैक्टीरिया पनपते हैं। ऐसे में राख चटाने से मुंह की प्रकृति क्षारीय हो जाती है और बैक्टीरिया नहीं पनप पाते थे। दांत साफ करने, बर्तन साफ करने के पीछे भी यही कारण था। एक तो राख में कोई केमिकल नहीं होता। यह पूरी तरह प्राकृतिक है और बैक्टीरिया को प्राकृतिक रूप से खत्म कर देती है। पेड़-पौधों पर भी राख का छिड़काव बैक्टीरिया से बचने के लिए होता था।

साधुओं के भस्म लगाने के पीछे कारण

साधुओं के भस्म लगाने के पीछे भी विज्ञान है। सिलिका में कोई करंट नहीं गुजरता। यह प्रतिरोधक की तरह से काम करती है। ऐसे में साधु, नागा संन्यासी अपने शरीर पर भस्म लगाकर रखते हैं। इससे बाहर से सर्दी या गर्मी शरीर में प्रवेश नहीं करती और शरीर से ऊर्जा बाहर नहीं जा पाती। इस स्थिति में भस्म एक प्रतिरोधी परत की तरह काम करती है जिसमें सर्द या गर्म तापमान का कोई असर शरीर तक नहीं पहुंचता।

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