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राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: बहिष्कार को बढ़ावा देने वाली

लखनऊ। अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ, शिक्षक व समाज के कई वर्ग इस बात से बहुत उत्साहित हैं कि लगभग 34 वर्षों के बाद देश को एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 प्राप्त हुई। इसको 30 जुलाई 2020 को जारी किया गया। जब देश कोविड-19 महामारी के कारण आपातकाल जैसी स्थिति में है।

नई शिक्षा नीति पहली नजर में आकर्षक लग रही है, लेकिन जैसे ही इसका विष्लेषण किया जाता है, यह पूरी तरह से अलग परिदृष्य प्रस्तुत करती है।

अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल सिंह द्वारा देश के विभिन्न राज्यों के शिक्षक समूह को शिक्षा नीति और इसके निहितार्थ के बारे में जागरूकता हेतु वेबिनार-श्रृंखला का आयोजन किया। जिसमें उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ भी सम्मलित हुआ अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ देश के 24 राज्यों के लगभग 23 लाख प्राथमिक शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करता है।

शिक्षा नीति-आकर्षक परन्तु समावेशी नहीं

भारत के 20 से अधिक राज्यों में शिक्षक संगठनों व शिक्षकों और छात्रों का आकलन करने के लिए नई संरचनाओं और एजेंसियों का निर्माण करके शिक्षकों और अन्य शिक्षाविदों के मन में ‘अराजकता और भ्रम’ पैदा करने के लिए अपनी चिंता व्यक्त की है। मौजूदा संरचनाओं और प्रणालियों का भविष्य क्या होगा, यह चिंता का विषय है।  श्री सिंह ने प्रस्तावित दस्तावेज में उच्च शिक्षा में विभिन्न पाठ्यक्रमों में ‘प्रवेश और निर्गम नीति’ भविष्य में घटिया कार्यबल को जन्म देगी जो देश की वृद्धि के लिए बहुत हानिकारक है। कुशल श्रमिकों की कमी का भारत की अर्थव्यवस्था और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार नहीं होगा, बल्कि यह एक न्यायसंगत अधिकार होगा।

शिक्षा का अधिकार कानून 2009, जो स्कूल में हर बच्चे का आधार बनता है, अप्रभावी होगा। इससे हमारे समाज में पहले से मौजूद असमानताओं की दूरी और बढ़ जाएगी। शिक्षा में निजी हितधारको की भूमिका को प्रोत्साहित करने से यह आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछडे समूहों के लिए दुर्गम हो जाएगा। यह बिन्दु शिक्षकों और उनके संगठनों द्वारा एक राष्ट्रीय स्तर के वेबिनार में उठाया गया।

कमला कांत त्रिपाठी, महासचिव का यह मानना है कि शिक्षकों की अनुपस्थिति किसी अन्य कारण से नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा गैर-शैक्षणिक कार्यों में उनकी व्यस्तता चिंता का कारण है। सरकार द्वारा छप्म्च्। की एक रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया था कि शिक्षक शिक्षण उद्देश्यों के लिए केवल 19 प्रतिषत समय देने में सक्षम हैं। कक्षाओं की स्वायत्तता, योग्यता और वरिष्ठता आधारित प्रोन्नति लाभ शिक्षकों को प्रेरित करेंगे।

उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ की मांग है कि पूर्व प्राइमरी शिक्षा प्राथमिक शिक्षा से अलग होनी चाहिए और प्री-प्राइमरी के लिए केवल प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती करने से शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने में मदद मिल सकती है। हमारी राय में, हम आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए काम को कम नहीं आंक सकते हैं लेकिन वह प्रशिक्षित शिक्षकांे के विकल्प के रूप में नहीं देखे जाने चाहिए।

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प्रदेश अध्यक्ष सुशील कुमार पाण्डेय ने का कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर देश का एक जिम्मेदार और सक्रिय नागरिक बनाना है, जिससे उन्हें सभ्य कार्यध्यजीविका हासिल करने में मदद मिले, न कि उन्हें यह पता लगाने में कि वे प्रति मिनट कितने शब्दों को पढ़ सकते हैं। हम नीति से ऐसे प्रावधानों को हटाने की मांग करते हैं जो उन्हें एक मशीन में बदल देंगे। हम सहकर्मियों द्वारा मूल्यांकन के विरूद्ध हैं, यह छात्रों में पक्षपात और विद्यालय परिसर में हिंसा की समस्याओं को बढ़ावा देगा और शिक्षकों में भी दरार पैदा करेगा। शिक्षकों के पूर्व-सेवा प्रशिक्षण के लिए, हम दृढ़ता से सुझाव देना चाहते हैं कि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान सरकार के नियंत्रण में होने चाहिए। वर्तमान में वे निजी संस्थाओं द्वारा प्रबंधित हैं और निम्न श्रेणीस्तर के हैं। पूर्व-सेवा कार्यक्रमों के लिए पाठ्यक्रम में मौलिक परिवर्तन बहुत अधिक की आवश्यकता है। शिक्षक बदलते सामाजिक घटनाक्रम से लैस नहीं हैं और शिक्षा छात्रों के लिए अप्रासंगिक हो जाती है। यह ड्रॉपआउट दर बढ़ने का एक प्रमुख कारण है।

महासचिव ने कहा कि हम छब्थ्ज्म में शामिल करने के लिए अपने सुझाव अलग से भेजेंगे, लेकिन मांग करते हैं कि शिक्षकों के लिए कोई भी नीति बनाते समय या उन्हें सीधे प्रभावित करने वाली नीतियों में शिक्षकों और उनके संगठनों से परामर्श किया जाना चाहिए। हमारी राय में, छात्र और शिक्षकों के प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम डिजाइन के लिए जिम्मेदार एजेंसियां होनी चाहिए। स्कूल परिसरों के मूल्यांकन, परीक्षा और प्रबंधन में निजी हितधारकों को प्रोत्साहित करने से शिक्षा का व्यावसायीकरण होगा, जो शिक्षा को एक सामान या ‘वस्तु’ बना देगा। सतत व्यावसायिक विकास में निजी हितधारकों की भूमिका शिक्षण पेशे की भावना में नहीं होगी क्योंकि यह बाजार उन्मुख होगा।

महासचिव, ए.आई.पी.टी.एफ. द्वारा व्यक्त किया गया की ‘हम स्कूल परिसरों की स्थापना की अवधारणा का द्ढ़ता से विरोध करते हैं क्योंकि यह प्रत्येक बच्चे के मौलिक अधिकार के खिलाफ है’, जैसा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में वर्णित है। 1-3 किमी के दायरे में एक प्राथमिक स्कूल की स्थापना सभी के लिए शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करेगी। दूसरी ओर स्कूल कॉम्प्लेक्स जो एक व्यापक श्रेणी है, छात्रों को विद्यालयों से बाहर रहने के लिए बाध्य करेगा।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘एकल शिक्षक स्कूल’ को सरकार द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई हैं जो शिक्षकों की कमी को कम करने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति के बजाय परिसर का हिस्सा बनाया जाएगा। हम एकल शिक्षक स्कूलों के स्थान पर प्रति कक्षा एक शिक्षक की मांग करते हैं।

शिक्षकों और अन्य संसाधनों को साझा करना एक बहुत ही पूर्व-परिपक्व अवधारणा है और यह शिक्षा की बिगड़ती गुणवत्ता को आगे बढ़ाएगा। बच्चों और शिक्षकों के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण के सिद्धान्त के खिलाफ है। इससे काम की परिस्थितियों, प्रोन्नति और शिक्षकों के स्थानांतरण पर भी असर पड़ेगा। संघ यह भी मांग करता है कि स्कूल परिसरों का सामाजिक चेतना केन्द्र के रूप में उपयोग करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि प्रबंधन राजनीतिक समूहों के हाथों में नहीं होना चाहिए और इन परिसरों में कोई भी राजनीतिक गतिविधियां नहीं की जानी चाहिए।

इस बात पर जोर दिया गया कि मिड-डे मील के लिए धनराशि को बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों को पोशण और सुरक्षित भोजन प्रदान करने के लिए अपर्याप्त है और मिड-डे मील वितरण कार्य एक अलग संस्था को सौंपा जाना चाहिए ताकि शिक्षक अपना समय शेक्षणिक कार्यों में समर्पित कर सकें। यह वक्तव्य रामपाल सिंह द्वारा वेबिनार के समापन समारोह में दिया गया था। हमें उम्मीद है कि भारत सरकार कार्यान्वयन के लिए नीति को अंतिम रूप देने से पहले इन सुझावों को शामिल करने पर ध्यान देगी।

शाश्वत तिवारी

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