लुप्त होती ‘माटी कला’ को बचाने में जुटे हैं सहगल

खुश होने की बात तो है ही कि आदि काल से चली आ रही इस अद्भुत कला को दोबारा जिंदगी मिल रही है। लखनऊ में आयोजित हुए ‘माटी कला मेला’ को निश्चित तौर पर एक नई जिंदगी देने वाला ही कहा जाएगा। यह एक ऐसा शिल्प मेला साबित हुआ, जहां शिल्पकारों को मान- सम्मान मिला, अच्छा रोजगार मिला और बात यही खत्म नहीं होती, कोरोना महामारी के कारण पिछले कई महीनो से आर्थिक तंगी झेल रहे इन मिट्टी के जादूगरों (शिल्पकारों) को इस दिवाली के पावन मौके पर इस मेले के आयोजन से इस क्षेत्र में असीम संभावनाओं को देखने का हौसला भी मिला है।

इस मेले में 30 स्थानों पर 500 से ज्यादा उत्पाद मौजूद थे कुल मिला कर 50 लाख से ज्यादा की बिक्री हुई। यहाँ सिर्फ गोरखपुर के तीन शिल्पकारो ने 24 लाख से ज्यादा के उत्पाद बेचे। शिल्पकारों की माने तो उम्मीद से ज्यादा लोगों ने यहां मौजूद उत्पादों, खासकर मिट्टी से बने उत्पादों में बहुत रुचि दिखाई।

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मेले में स्थिति यह थी कि खरीदार तो थे, लेकिन बेचने के लिए उत्पाद नहीं बचे थे। आईएएस नवनीत सहगल की कुछ नया करने की एक बेहतर सोच व दिन- रात की कोशिशों ने इस मेले के रूप में कई नए आयाम भी स्थापित किये। इस मेले ने जहाँ एक ऒर चीन को जोर का झटका दिया, वही इस दिवाली लोगों ने अपनी माटी के लक्ष्मी- गणेश को ज्यादा पसंद किया और साथ ही साथ इसी कड़ी में आत्मनिर्भर भारत की ओर भी एक कदम आगे बढ़ाया।

इस माटी कला के पुनर्जीवन के पीछे योगी सरकार की स्पष्ट मंशा के साथ- साथ आईएएस नवनीत सहगल का एक शानदार विजन भी साफ देखने को मिला।

शाश्वत तिवारी
शाश्वत तिवारी
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