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स्वतंत्र भारत के प्रति हमारा कर्तव्य

इस साल हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाने जा रहे है, जो देश के हर नागरिक के लिए बहुत ही गर्व की बात है। यूँहीं नहीं मिली थी हमें आज़ादी खून की आहुतियाँ देकर गुलामी की जंजीरों को तोड़ा था हमारे वीर शहीदों ने, वो भी निहत्थे सत्य की राह पर चलकर आंदोलनों द्वारा।
1857 का विद्रोह, नील विद्रोह, जलिया वाला बाग कांड, चौरीचौरा कांड, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, पूर्ण स्‍वराज की मांग, नमक सत्‍याग्रह/दांडी मार्च और आजाद हिंद फौज। इन सारे आंदोलनों में अंग्रेजों ने अत्याचार की सीमाएँ लाँघ दी थी पर मातृभूमि के दीवानों ने सर कटवा लिए पर सर झुकाए नहीं। 75 साल से हम हमारे देश में 15 अगस्त बहुत उत्साह और गौरव के साथ मना रहे है। पर कुछ लोगों को शायद इस आज़ादी की कद्र नहीं, छोटी-छोटी बात पर कभी जात-पात तो कभी धर्म के नाम पर देश को जलाने निकल पड़ते है।
15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी मिली थी। तब से हमारे देश में हर वर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया जाता है। 15 अगस्त के दिन हमारा सर तिरंगे के सामने गर्व से ऊँचा हो जाता है और आज़ादी के रखवालों की शान में हम नतमस्तक भी हो जाते है। भारत दशकों से ब्रिटिश शासन के आधीन था। उस दौरान अंग्रेजों के अत्याचार समय के साथ बढ़ते चले जा रहे थे।
बाल गंगाधर तिलक, शहीद भगत सिंह, महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू, रानी लक्ष्मी बाई और सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के नेतृत्व में, भारत के नागरिकों ने एकजुट होकर अपनी आजादी के लिए संघर्ष किया। जिसमें आम जनता का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। स्वतंत्रता सेनानियों के नेतृत्व द्वारा बहुत से आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत की गई। इन आंदोलनों के कारण कई लोगों को अपने प्राणों की आहुती भी देनी पड़ी, तो कईयों को जेल जाना पड़ा, फिर भी लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ लड़ने की अपनी इस भावना को नहीं छोड़ा। स्वतंत्रता दिवस पर यह हमें उन शहीदों और सहयोगी के बलिदानों की याद दिलाता है। अखंड भारत, स्वच्छ भारत और धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना हम सब देखते है।

कितना बड़ा दिन है आज हम सबके लिए। हम तो आज़ादी के सिर्फ़ किस्से सुनकर बड़े हुए, पर ये आज़ादी का अमृत महोत्सव जो हम मना रहे है महज़ आम बात नहीं। आज़ादी का बीज बोने वालों के कितने सर कटे, कितना लहू बहा, कितने फांसी चढ़े, इतनी कुर्बानियों का नतीजा है। हम तो फल खा रहे है। तो अब हमारा नैतिक फ़र्ज़ है बनता है कि भारत की भूमि को गौरवान्वित रखें। अखंड भारत का सपना आज हर एक भारतवासी के मन में पनपता है पर भारत को उपर उठाने में हम सब कितना योगदान देते है ये सोचनिय बाबत है।

15 अगस्त या 26 जनवरी को मेरा भारत महान, जयहिन्द, वन्दे मातरम्‌ ये सारे नारे लगाने से और देश भक्ति की पोष्ट डाल देने से ही क्या देश के प्रति हमारा कर्तव्य पुरा हो जाता है? अगर ना तो क्यूं ना हर एक व्यक्ति ये प्रण ले की देश को हर लिहाज़ से महान बनायेंगे और शुरुआत खुद से करेंगे, अपने घर से ही करेंगे। पानी की बूँद-बूँद बचाएंगे, बिजली का एक यूनिट रोज बचाएंगे, पान, तंबाकू, गुटखा खाकर ना खुद का सर्वनाश करो ना ही यहाँ वहाँ थूँक कर  देश को गंदा करो।
कचरा इधर-उधर फेंकने की बजाए कचरा पेटी में ही डालें देश की बहोत बड़ी सेवा होगी। भ्रष्टाचार को बंद करो सारे टेक्स इमानदारी से भरो, देशी बनावट की चीजों का ही इस्तेमाल करो बहुत से लोगों को रोज़ी मिलेगी। इस तरहा देश को संपन्न बनायेंगे तो विकास अपने आप दिखेगा,ना की किसी इन्सान को कोसने से। इमानदारी से दिल पर हाथ रखकर खुद से पुछें तब पता चलेगा की क्या इनमें से एक चीज़ का भी योगदान देते है हम? तो फिर हमें क्या हक़ है बोलने का की मेरा भारत महान।
देश का हर एक नागरिक रोज़ का एक रुपया बचाओ और वो बचत देश की ख़ातिर सरहद पर लड़ रहे जवानों के लिये लगाओ, शहीदों के परिवार की परवरिश के लिए लगाओ। सोचिए इतनी आबादी रोज़ का सिर्फ़ एक रुपया इस नेक काम के लिए देंगे तो करोडों रुपये जमा हो जाएंगे जिससे शहीदों के कई परिवार पल जाएंगे। जो कि हमारा परम कर्तव्य है।
भाईचारे की भावना हो तो क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, क्या सिख, क्या ईसाई सारे मिलकर एक हो जाएँ तो किसके हौसले में दम है की भारत को हराए।

इंडिया नहीं भारत बोलना शुरु करो और हर कोई मिलने वाले से hi, hello  नहीं जयहिन्द बोलना शुरु करो। पर कोई एक अकेला ये काम नहीं कर सकता ये काम बहुत कठिन है ,जब पुरा देश एक होकर इस महायज्ञ को सफ़ल बनाने में लगेगा तभी देश के प्रति हमारा कर्तव्य पुरा होगा।

दुनिया के नक़्शे में भारत देश न केवल अपनी परम्पराओं और संस्कृति के नाम से पहचाना जाता है बल्कि विज्ञान, तकनीकी और औधोगिक क्षेत्र में भी भारत कहीं पीछे नहीं है। प्रतिदिन चिरन्तर विकास की ओर अग्रेसर है, इसी कारण कई अन्य देश भारत आकर यहाँ से अपना व्यापार करते है।
क्या नहीं है हमारे भारत में विभिन्न मौसमों और भोगोलिक परिस्थितियों की दष्टि से देखे तो स्वर्ग से सुंदर है, विदेश की यात्रा से पहले अपने देश की यात्रा पहले करनी चाहीए। वह सब यहाँ उपस्थित हैं चाहे वह पर्वतीय श्रृंखला हो, बर्फीले पहाड़ हो, दक्षिण की सुंदरता, मरू भूमि हो, या घने जंगल, गंगा का तट हों या समुद्र के किनारे, या कलकल करती नदियाँ। क्या नहीं है यहाँ ? प्रकृति की कोई ऐसी सौगात नहीं जो भारत देश में न हो।
अनेकताओं में एकता का देश है भारत, प्राचीन समय में सोने की चिड़ीया कहा जाता था हमारे देश को तो क्यूं ना वापस मिल-झुल कर देश को सर्व शक्तिमान बनाएं, बोलो जयहिन्द।
    भावना ठाकर ‘भावु’

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