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टाइम कैप्सूल: AMU में 100 साल का इतिहास दफन

दया शंकर चौधरी

गणतंत्र दिवस के अवसर पर इस बार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास को चिरकाल तक सहेजने की कोशिश की गई है। इसके तहत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के 100 साल के इतिहास के दस्तावेज वाले एक टाइम कैप्सूल (काल पात्र) को विश्वविद्यालय परिसर में विक्टोरिया गेट के सामने जमीन में दफन किया गया है। देश के इस बेहतरीन संस्थान के 100 साल के इतिहास को टाइम कैप्सूल में संजोया जाना भावी पीढ़ियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण और लाभदायक है।

जानकारों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर के विक्टोरिया गेट के सामने जमीन में गाड़े गए टाइम कैप्सूल में विश्वविद्यालय के पिछले 100 साल के इतिहास को संजोए सभी ऐतिहासिक दस्तावेज संरक्षित किए गए हैं। बताया जाता है कि इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और सामग्री के मदद से संरक्षित किया गया है, ताकि उन्हें लंबे समय तक संरक्षित किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को इसका फायदा मिल सके।

टाइम कैप्सूल में रखे गए दस्तावेजों में विश्वविद्यालय में अभी तक हुए सभी दीक्षांत समारोह का संक्षिप्त विवरण, वर्ष 1920 के एएमयू एक्ट की प्रति, सर सैयद की किताब और प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर खालिद अहमद निजामी की एल्बम शामिल है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 100 साल पूरे होने के बाद उसके इतिहास को कैप्सूल के माध्यम से संरक्षित किया गया।

 

इसके अलावा हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जारी किए गए डाक टिकट व स्पीच को भी इसमें रखा गया है। यह पूरे डाटा को नाइट्रोजन युक्त चेंबर बनाकर रखा गया है, ऐसी कोशिश की गई है कि सदियों तक इसी रूप में सुरक्षित रहेगा जिससे आगे आने वाली पीढ़ी इससे संबंधित इतिहास की जानकारी ले सकेगी।

यह कैप्सूल विक्टोरिया हॉल के सामने मैदान में दफन किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के पूरे इतिहास को सहेज कर रखा गया है। बताया जाता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने वर्ष 1877 में मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना के वक्त परिसर में गाड़े गए असली टाइम कैप्सूल को बाहर निकलवाने का फैसला किया है। इसके लिए एक समिति गठित की गई है, जो इस प्रक्रिया की निगरानी करेगी।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का संक्षिप्त इतिहास

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से एक है जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में स्थित है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक आवासीय शैक्षणिक संस्थान है। इसकी स्थापना 1920 में सर सैयद अहमद खान द्वारा की गई थी और 1921 में भारतीय संसद के एक अधिनियम के माध्यम से केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की तर्ज पर ब्रिटिश राज के समय बनाया गया पहला उच्च शिक्षण संस्थान था। मूलतः यह मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कालेज था, जिसे महान मुस्लिम समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान द्वारा स्थापित किया गया था। कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं, उर्दू लेखकों और उपमहाद्वीप के विद्वानों ने विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है।

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शिक्षा के पारंपरिक और आधुनिक शाखा में 250 से अधिक पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं। अपने समय के महान समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान ने आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता को महसूस किया और 1875 में एक स्कूल शुरू किया, जो बाद में मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कालेज और अंततः 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। कई विभागों और स्थापित संस्थानों के साथ यह प्रमुख केन्द्रीय विश्वविद्यालय दुनिया के सभी कोनों से, विशेष रूप से अफ्रीका, पश्चिमी एशिया और दक्षिणी पूर्व एशिया के छात्रों को आकर्षित करता है। कुछ पाठ्यक्रमों में सार्क और राष्ट्रमंडल देशों के छात्रों के लिए सीटें आरक्षित हैं। विश्वविद्यालय सभी जाति, पंथ, धर्म या लिंग के छात्रों के लिए खुला है।

एएमयू की लाइब्रेरी और संग्रहालय

1877 इस्वी में लाइब्रेरी की स्थापना हुई थी। एएमयू की मौलान आजाद लाइब्रेरी में 13.50 लाख पुस्तको के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद है। यहाँ रखी इंडेक्स इस्लामिक्स की कीमत करीब 12 लाख रुपये है। यहाँ फारसी पांडुलिपि का कैटलॉग और साढ़े चार लाख दुर्लभ पुस्तकें, पांडुलिपिया व शोधपत्र ऑनलाइन उपलब्ध हैं। यहाँ अकबर के दरबारी “फैजी” की फारसी में अनुवादित गीता और 400 साल पहले फारसी में अनुवादित महाभारत की पांडुलीपि भी उपलब्ध है। तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र और 1400 साल पुरानी कुरान देखी जा सकती है। यहाँ के संग्रहालय में मुगल शासकों के कुरान लिखे विशेष कुर्ते जिन्हे “रक्षा कवच” कहते है, दर्शनार्थ रखे गये हैं। संग्रहालय में सर सैयद की पुस्तकें व पांडुलिपियां तथा जहांगीर के पेंटर मंसूर नक्काश की अद्भुत पेंटिग भी मौजूद है।

विश्वविद्यालय के पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति

भारतरत्न डॉ. जाकिर हुसैन (1963), खान अब्दुल गफ्फार खान (1983), पद्मविभूषण डॉ. जाकिर हुसैन (1954), हाफिज मुहम्मद इब्राहिम (1967), सैयद बसीर हुसैन जैदी (1976), प्रो. आवेद सिद्दीकी (2006), प्रो. राजा राव (2007), प्रो. एआर किदवई (2010), पद्मभूषण शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह (1964), प्रो. सैयद जुहूर कासिम (1982), प्रो. आले अहमद सुरुर (1985), नसीरुद्दीन शाह (2003), प्रो. इरफान हबीब (2005), कुर्रातुल एन हैदर (2005), जावेद अख्तर (2007), डॉ. अशोक सेठ (2014), पद्मश्री विश्वविद्यालय के 53 महानुभावो को। ज्ञानपीठ कुर्रतुलऐन हैदर (1989), अली सरदार जाफरी (1997), प्रो. शहरयार (2008)।

भारतीय न्याय क्षेत्र में विश्वविद्यालय का योगदान

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बहारुल इस्लाम, जस्टिस सैयद मुर्तजा फजल अली, जस्टिस एस. सगीर अहमद, जस्टिस आर.पी. सेठी, एएमयू से हाईकोर्ट 47 जज।

विश्वविद्यालय के प्रमुख व्यक्तित्व

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान, अली अशरफ फातमी ए एम यू के विद्धार्थी भारत सरकार में पूर्व मानव संसाधन राज्यमंत्री (2004-2009) साहिब सिंह वर्मा, (भाजपा नेता एवं दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, केन्द्रीय श्रम मंत्री), मोहम्मद हामिद अंसारी, भारत के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति। ध्यानचंद, प्रमुख हॉकी खिलाडी मुश्ताक अली, भारत के भूतपूर्व क्रिकेट खिलाडी एवं कप्तान, लाला अमरनाथ, भूतपूर्व क्रिकेट खिलाडी मोहिंदर अमरनाथ के पिता, इरफान हबीब, इतिहासकार, ईश्वरी प्रसाद इतिहासकार।

पियारा सिंह गिल, भौतिकशास्त्री। असरउल हक मजाज, उर्दू कवि, कैफी आजमी, उर्दू कवि’, राही मासूम रजा, लेखक। जावेद अख्तर, गीतकार एवं शायर। के आसिफ, मुगले-आजम फिल्म के निर्देशक। नसीरुद्दीन शाह, फिल्म अभिनेता, अनुभव सिन्हा, हिन्दी फिल्मों के निर्देशक दलीप ताहिल, फिल्म अभिनेता, शाद खान, टी.वी. कलाकार, जैस चौहान अभिनेता।

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