बाबा की जल्दबाजी ने करवा दी किरकिरी

बाबा रामदेव की दवा को लेकर जिस तरह की बहस और मुकदमेबाजी चल रही है उसके पीछे मुख्य वजह बाबा की जल्दबाजी है। कुछ साथी कोरोनिल मुद्दे पर कल से मेरे मैसेंजर में आकर बहस कर रहे हैं। मुझे कई जगहों पर टैग कर रहे हैं। आपको बता दूं कि आपसे ज्यादा मेरी आयुर्वेद में आस्था है। मुझे अपने देश के आयुर्वेद पर गर्व है इसकी छवि खराब होते नही देख सकता। इसीलिए तर्क पूर्ण तरीके से अपनी बात रखी।

बाबा रामदेव पहले कहते थे कि योग से ही सारे रोग दूर हो जाते हैं, फिर दवाएं बेचने लगे। ठीक है, जब व्यापार मल्टीनेशनल कम्पनियां कर सकती हैं तो बाबा क्यों नहीं। लेकिन जल्दी से इन कम्पनियों को बीट करके नम्बर वह बन जाने के लिए बाबा जी ने कुछ ऐसे काम कर दिए जिससे बड़ी किरकिरी हुई। पुत्रवटी, समलैंगिकता की दवा और भी कई सारे विवाद हुए। 30 सेकेण्ड तक सांस रोक कर कोरोना टेस्ट भी हंसी का पात्र ही बना।

कोरिनिल के मामले में भी यही प्रतिस्पर्द्धा ही घातक हो गई। उन्होंने आयुर्वेदिक दवा का अंग्रेजी नाम रख कर सोचा था कि विश्व भर में इसे बेच लेंगे। वैश्विक मंच पर खुद को साबित करने के लिए पीर रिव्यूड रिसर्च पेपर नाम की एक चीज होती है। जो आपके पास था नहीं। जितनी भी दवाएं आ रही हैं सबके पास अन्तराष्ट्रीय रिसर्च पेपर हैं। बाबा जी चाहते तो ऐसा कर सकते थे,उनके पास 500 वैज्ञानिकों की टीम है लेकिन जल्दबाजी में थे। कुछ दिन पहले ही ग्लेनमार्क ने महंगी फैवी फ़्यू लांच की थी। दिक्कत बाबा की दवा से नही दावे से पैदा हुई। अगर यह वाकई 100 प्रतिशत ठीक कर रही होती तो अब तक डब्ल्यू एच ओ का चेयरमैन हरिद्वार में बैठा होता। पीएम मोदी जी उसी दिन 8 बजे आकर देख को खुशखबरी दे चुके होते। क्वारन्टीन सेंटर बन्द करने की घोषणा हो जाती। योग गुरु विश्व गुरु बन जाये। चिकित्सा का नोबल भी बाबा को मिल जाता। और भारत खरबों डॉलर कमा लेता।

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मेडिकल कम्पनियां अपनी दवाएं ( रिपरपज़्ड) लांच कर रही थी। बाबा ने जल्दबाजी दिखाई निम्स के चेयर मैन तोमर को भी नही पता थी कि वह कोरोनिल का ट्रायल कर रहे थे। राजस्थान सरकार को भी नहीं खबर थी उसके राज्य में इतना ऐतिहासिक कार्य हो रहा है। निम्स सरकार का क्वारन्टीन सेंटर था, जहाँ ट्रायल से पहले भी 100 प्रतिशत रिकवरी रेट था मरीजों का। क्योंकि वहां एसिम्पटमेटिक/ माइल्ड केस ही आते थे। अगर बाबा जी दवा के प्रभावों को लेकर मुतमईन थे तो ट्रायल हेतु अनुभवहीन निम्स को ही क्यों रखा, एम्स को क्यों नहीं। क्योंकि वह ट्रायल का पूरा प्रोटोकॉल फॉलो करते, समय लगता । लेकिन फिर उसकी विश्वसनीयता पर कोई शक भी नही करता। देश स्वीकार कर लेता उत्तराखंड सरकार का लाइसेंस ऑफीसर कह रहा कि बाबा जी ने तो सिर्फ जुकाम बुखार के लिए इम्यूनिटी बूस्टर के लिए लाइसेंस लिया था,हाय ये क्या कर डाला। दो पहिये के लाइसेंस से ट्रक कैसे दौड़ा डाला।

बाबा जी अधीर थे, वो ट्रायल भी ठीक से नही करवा पाए। किट में कोरोना वटी का सीधे इंसानों पर ट्रायल हुआ, श्वास वटी का सिर्फ चूहों पर हुआ, अणुतेल का कम्प्यूटर पर हुआ। सिर्फ भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस करना ही पर्याप्त नही होता। शोध भी पर्याप्त होनी चाहिए। उन्होंने सीटीआरआई ( क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री-इंडिया) से क्लीनिकल ट्रायल की परमिशन मांगी थी, अभी उनको परिणाम भी नहीं बताए गए। वहां से भी नोटिस आ सकती है। गड़बड़ खूब हुई लेकिन इस मुद्दे पर राजनीति शुरू हो गई जो दुःखद है। निम्स और पतंजलि पर बिहार और राजस्थान में एफआईआर दर्ज हो गई। महाराष्ट्र राजस्थान की सरकारों ने इसे अपने यहां ब्लैक लिस्टेड तक कर दिया। सब आयुष अपने स्तर से जांच कर रहा है। सीएसआईआर भी कल को कर सकता है। मैं यही कामना करूंगा कि यह दवा आये लेकिन इम्यूनिटीबूस्टर के रूप में। सब खरीदेंगे। मैं भी ….

पंकज प्रसून,लखनऊ
पंकज प्रसून

 

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