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ज्ञानवापी मामला : ‘ज्ञान का कुआँ’ न बन जाए कहीं दूसरा ‘विवादित ढाँचा’

‘मस्जिद’और ‘मंदिर’ – इन शब्दों के साथ प्रयोग में लिए जाने वाले ‘ज्ञानवापी’ शब्द का अगर अर्थ ही जान लिया जाए, तो अपने आप ही ये मसला सुलझ सकता है। ‘ज्ञानवापी’ एक संस्कृत शब्द है इसका अर्थ है ‘ज्ञान का कुआं’। संस्कृत भाषा का उद्गम भारत की धरती पर हुआ और इसका प्रयोग सनातनी मान्यताओं के अनुसार, देवताओं के समय से होता आ रहा है। इसलिए अब अगर ये कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा कि ‘ज्ञानवापी’ शब्द का प्रयोग मस्जिद के साथ ही नहीं बल्कि, मस्जिद और मंदिर ये दोनों ही शब्द, ‘ज्ञानवापी’ शब्द के साथ प्रयोग होते हैं।

बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई ज्ञानवापी मस्जिद, आजकल पूरे भारत में चर्चा का विषय बनी हुई है। चर्चा का कारण ये है कि आलमगीर मस्जिद के नाम से भी कही जाने वाली इस मस्जिद का सर्वे वीडियोग्राफी के साथ हो रहा है, जिस वजह से देश में दो धार्मिक समाजों में आपत्तियों का दौर चल निकला है। हालांकि, ये सर्वे अदालत के आदेश पर ही हो रहा है लेकिन, इसके बाद भी हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच, इसे लेकर अपने-अपने तर्क, मान्यताएं और दावे रह-रह कर उठ रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ होने के बाद से ज्ञानवापी मस्जिद का मामला भी लगातार उठ रहा है।

सबसे सामान्य और प्रचलित मान्यता ये है कि इस मस्जिद का निर्माण सन् 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने करवाया था। यह भी कहा जाता है कि इस मस्जिद के बनने से पहले यहां मंदिर हुआ करता था और औरंगजेब ने प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर यह ज्ञानवापी मस्जिद बना दी थी। उसने मंदिर ध्वस्त किया उसके अवशेषों का इस्तेमाल कर इस मस्जिद का निर्माण करवाया। वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण मुगल शहंशाह अकबर के जमाने में यानी 1585 में हुआ। अकबर ने दीन-ए-इलाही नाम से एक मज़हब की शुरुआत की थी और ये मस्जिद उसी धर्म के तहत बनवाई गई थी।

क्या है ‘ज्ञानवापी’ शब्द का अर्थ

मस्जिद और मंदिर के साथ प्रयोग में लिए जाने वाले ‘ज्ञानवापी’ शब्द का अगर अर्थ ही जान लिया जाए, तो अपने आप ही ये मसाला सुलझ सकता है। ‘ज्ञानवापी’ एक संस्कृत शब्द है इसका अर्थ है ‘ज्ञान का कुआं’। संस्कृत भाषा का उद्गम भारत की धरती पर हुआ और इसका प्रयोग सनातनी मान्यताओं के अनुसार, देवताओं के समय से होता आ रहा है। इसलिए अब ये कहा जाए कि तो ग़लत नहीं होगा कि ‘ज्ञानवापी’ शब्द का प्रयोग मस्जिद के साथ नहीं बल्कि, मस्जिद और मंदिर ये दोनों ही शब्द, ‘ज्ञानवापी’ के साथ प्रयोग होते हैं।

मंदिर के पक्ष में किए जा रहे दावे

मंदिर के संबंध में दावा यह है कि यहां प्राचीन काल से भगवान विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थापित है। सम्राट विक्रमादित्य ने इसके आसपास मंदिर का निर्माण किया। इसके बाद अकबर के शासनकाल में उनके दरबार के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल ने इस मंदिर को भव्य रूप दिया लेकिन, औरंगजेब ने अपने शासनकाल में इस मंदिर को तोड़े जाने के आदेश दिए। औरंगजेब के इस आदेश का जिक्र उसी काल में लिखी गई मशहूर किताब मआसिर-ए-आलमगीरी में है। ये किताब अरबी भाषा में साकी मुस्तैद खान ने लिखी है। इसकी ओरिजनल कॉपी आज भी कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल में मौजूद है।

इतिहास पर एक नज़र

काशी विश्वनाथ मंदिर और उससे सटी ज्ञानवापी मस्जिद को किसने बनवाया, इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए कई अटकलें लगाई जा रही हैं। लेकिन, ठोस ऐतिहासिक जानकारी दुर्लभ है। मान्यता ये है कि काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब ने ध्वस्त कर दिया था और वहां एक मस्जिद का निर्माण किया गया था। ये भी दावा किया जाता है कि चौथी और पांचवीं शताब्दी के बीच, चंद्रगुप्त द्वितीय, जिसे विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है, ने गुप्त साम्राज्य के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। अब अगर, इतिहास के पलट दिए जाएं, तो 635 ईसा पूर्व में, प्रसिद्ध चीनी यात्री हुआन त्सांग के लेखन में मंदिर और वाराणसी का वर्णन मिलता है। इसके बाद, ईसा पूर्व 1194 से 1197 तक, मोहम्मद गोरी के आदेश से मंदिर को काफी हद तक नष्ट कर दिया गया था और पूरे इतिहास में मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण की एक श्रृंखला शुरू हुई।

विध्वंस की इस श्रृंखला में हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया और उनका पुनर्निर्माण किया गया। इस श्रृंखला में ज्ञानवापी मंदिर भी अछूता नहीं रहा। ईसा पूर्व 1669 में, मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश से, मंदिर को अंततः ध्वस्त कर दिया गया और उसके स्थान पर एक ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण किया गया। 1776 और 1978 के बीच, इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने ज्ञानवापी मस्जिद के पास वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया। 1936 में पूरे ज्ञानवापी क्षेत्र में नमाज अदा करने के अधिकार के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जिला न्यायालय में मुकदमा दायर किया गया था। वादी ने सात गवाह पेश किए, जबकि ब्रिटिश सरकार ने पंद्रह गवाह पेश किए।

ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज अदा करने का अधिकार स्पष्ट रूप से 15 अगस्त, 1937 को दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि ज्ञानवापी संकुल में ऐसी नमाज कहीं और नहीं पढ़ी जा सकती। 10 अप्रैल 1942 को उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और अन्य पक्षों की अपील को खारिज कर दिया। पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा और अन्य ने ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और पूजा की स्वतंत्रता के लिए 15 अक्टूबर, 1991 को वाराणसी की अदालत में मुकदमा दायर किया।

1991 से इस मस्जिद को हटाकर मंदिर बनाने की कानूनी लड़ाई चल रही है। पर 2022 मे सर्वे होने बाद ये ज्यादा यह मसला चाचा मे है। दावा किया जा रहा की मस्जिद के वाजुखाने मे 12.8 व्यास का शिवलिंग प्राप्त हुआ है जिसे आक्रमण से बचाने के लिए तत्कालीन मुख्य पुजारी ने ज्ञानवापी कूप मे छुपा दिया गया था।

मौजूदा स्थिति 

अंजुमन इंतजमिया मस्जिद और उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ ने 1998 में हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दायर कर इस आदेश को चुनौती दी थी। 7 मार्च 2000 को पंडित सोमनाथ व्यास का निधन हो गया। पूर्व जिला लोक अभियोजक विजय शंकर रस्तोगी को 11 अक्टूबर, 2018 को मामले में वादी नियुक्त किया गया था। 17 अगस्त 2021 मे शहर की 5 महिलाओं राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, मंजू व्यास, सीता साहू और रेखा पाठक ने वाराणसी सत्र न्यायलय में याचिका दायर की थी और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी का उन्हें नियमित दर्शन पूजन की अनुमति मांगी जिसके बाद मस्जिद मे सर्वे कराया गया।

हिन्दू परंपराओं के अनुसार

1669 मे औरंगजेब ने प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर इस मस्जिद का निर्माण करवाया। मंदिर परिसर के ही शृंगार गौरी, श्री गणेश और हनुमानजी के स्थानों को भी ध्वस्त कर दिया था। मान्यता है की पश्चिमी दीवार जो की पूरी तरह किसी मंदिर के मुख्य द्वार जैसा प्रतीत होता है वो शृंगार गौरी मंदिर का प्रवेश द्वार होगा जिससे बांस-मिट्ठी से बंद कर दिया गया है और मस्जिद के अंदर गर्भगृह होगा। इसी पश्चिमी दीवार के सामने एक चबूतरा है जहां शृंगार गौरी की एक मूर्ति है जो सिंदूर से रंगी है, यह साल मे एक बार चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन हिन्दू पक्ष के द्वारा यह पूजा होती है परंतु 1991 के पहले यह नियमित पूजा होती थी जिसपर तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने रोक लगा दी थी। 2021 मे पांचों महिलाओं का इसी मंदिर मे नियमित पूजा करने के लिए याचिका दायर की थी जिसके सर्वे का आदेश कोर्ट द्वारा किया गया था।

कब अदालत में पहुंचा मामला

यह मामला पिछले 3 दशक से ज्यादा समय से अदालत में चल रहा है. हिंदू पक्ष की ओर से दायर याचिका के मुताबिक अंग्रेजों ने साल 1928 में पूरे मामले का अध्ययन कर ये जमीन हिंदुओं को सौंप दी थी। इस आधार पर यह पक्ष ज्ञानवापी परिसर पर अपना हक मांग रहा है। साल 1991 में सोमनाथ व्यास, रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय ने वादी के तौर पर प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विशेश्वर की ओर से अदालत में मुकदमा दायर किया। इसके बाद मस्जिद कमेटी ने Places of Worship Act, 1991 का हवाला देकर इस दावे को चुनौती दी। 1993 ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे संबंध में स्टे दे दिया और यथास्थिति कायम रही।

श्रृंगार गौरी मंदिर का मामला

ज्ञानवापी मस्जिद का मामला 1991 से अदालत में है, लेकिन मां श्रृंगार गौरी काम मामला महज 7-8 महीने पुराना है। 18 अगस्त, 2021 में वाराणसी की एक अदालत में यहां की 5 महिलाओं ने मां श्रृंगार गौरी के मंदिर में पूजा-अर्चना की मांग की। इस याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने श्रृंगार गौरी मंदिर की मौजूदा स्थिति को जानने के लिए एक कमीशन का गठन किया। इसी कड़ी में कोर्ट ने श्रृंगार गौरी की मूर्ति और ज्ञानवापी परिसर में वीडियोग्राफी कराकर सर्वे रिपोर्ट देने को कहा है। किन्हीं कारणों से दो बार ये वीडियोग्राफी नहीं करवाई जा सकी। इस बार कोर्ट ने 10 मई के पहले सर्वे और वीडियोग्राफी कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है।

मई 2022 ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे

17 अगस्त 2021 मे शहर की 5 महिलाओं राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, मंजू व्यास, सीता साहू और रेखा पाठक ने वाराणसी सत्र न्यायलय में याचिका दायर की थी और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी का उन्हें नियमित दर्शन पूजन की अनुमति मांगी थी जिसकी सुनवाई करते करते अप्रैल 2022 आ गया। 8 अप्रैल 2022 को सत्र न्यायलय ने सिविल जज सीनियर डिविजन ने वकील अजय कुमार मिश्र को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया और मस्जिद मे सर्वे करवाने की अनुमति दी जिसकी रिपोर्ट 17 मई तक दाखिल करने को कहा। जिसपर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई और हाई कोर्ट पहुंचे परंतु न्यायालय ने सर्वे पर रोक से इनकार कर दिया।

6 और 7 मई को लगभग ढाई घंटे कोर्ट कमिश्नर के नेतृत्व मे सर्वे हुआ पर 7 मई को सर्वे टीम को मुस्लिम पक्ष का विरोध देखना पड़ा जिसके कारण उसस दिन सर्वे नहीं हुआ और मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट मे कोर्ट कमिश्नर को हटाने की मांग की पर कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर किया अपितु विशाल सिंह को विशेष कमिश्नर बनाया गया, जो पूरी टीम का नेतृत्व करेंगे। उनके साथ अजय प्रताप सिंह को भी शामिल किया गया और कोर्ट ने आदेश दिया था कि मस्जिद समेत पूरे परिसर का सर्वे होगा। 14 मई को कोर्ट कमिश्नर अजय कुमार मिश्र की अगुवाई में पहले दिन सर्वे हुआ। पहले दिन सुबह 8 बजे से 12 बजे तक सर्वे हुआ।

राउंड-1 में सभी 4 तहखानों के ताले खुलवा कर सर्वे किया गया। अगले दिन 15 मई को दूसरे राउंड का सर्वे हुआ। दूसरे दिन भी चार घंटे सर्वे का काम चला, लेकिन कागजी कार्रवाई के कारण सर्वे टीम डेढ़ घंटे देर से बाहर निकली। राउंड 2 में गुंबदों, नमाज स्थल, वजू स्थल के साथ-साथ पश्चिमी दीवारों की वीडियोग्राफी हुई। मुस्लिम पक्ष ने चौथा ताला खोला। साढ़े तीन फीट के दरवाजे से होकर गुंबद तक का सर्वे हुआ। 16 मई को आखिरी दौर का सर्वे हुआ जहां 2 घंटे में सर्वे का काम पूरा कर लिया गया। इस दौरान हिंदू पक्ष ने ज्ञानवापी में शिवलिंग मिलने का दावा किया। इस दावे के बाद कोर्ट ने शिवलिंग वाली जगह को सील करने का आदेश दिया। कोर्ट के आदेश पर डीएम ने वजु पर पाबंदी लगा दी और अब ज्ञानवापी में सिर्फ 20 लोग ही नमाज पढ़ पाएंगे।

टीम ने रिपोर्ट दाखिल करने के लिए और समय मांग जिससे कोर्ट की कारवाई अगले दिन 18 मई तक टल गई। इसी बीच कोर्ट ने अजय मिश्र को कोर्ट कमिश्नर के पद से हटा दिया जिसके कारण 18 मई को न्यायलय मे हड़ताल हुई और उस दिन सुनवाई नहीं हो पाई। 19 मई को अजय मिश्र ने 6 और 7 मई को हुए सर्वे और विशाल सिंह (विशेष कोर्ट कमिश्नर) ने 14 से 16 मई के सर्वे का रिपोर्ट कोर्ट मे दाखिल कर दिया।

प्रथम सर्वे रिपोर्ट (पूर्व कोर्ट कमिश्नर अजय मिश्र के द्वारा)

यह रिपोर्ट 6 और 7 मई का है। ये लगभग 2-3 पन्नों की रिपोर्ट है। इसके मुताबिक, 6 मई को किए गए सर्वे के दौरान बैरिकेडिंग के बाहर उत्तर से पश्चिम दीवार के कोने पर पुराने मंदिरों का मलबा मिला, जिस पर देवीदेवताओं की कलाकृति बनी हुई थी और अन्य शिलापट पट्ट थे, जिन पर कमल की कलाकृति देखी गईं। पत्थरों के भीतर की तरफ कुछ कलाकृतियां आकार में स्पष्ट रूप से कमल और अन्य आकृतियां थीं, उत्तर पश्चिम के कोने पर गिट्टी सीमेन्ट से चबूतरे पर नए निर्माण को देखा जा सकता है। उक्त सभी शिक्षा पट्ट और आकृतियों की वीडियोग्राफी कराई गई। उत्तर से पश्चिम की तरफ चलते हुए मध्य शिला पट्ट पर शेषनाग की कलाकृति, नागफन जैसी आकृति देखी गईं। शिलापट्ट पर सिन्दूरी रंग की उभरी हुई कलाकृति भी थीं।

शिलापट्ट पर देव विग्रह, जिसमें चार मूर्तियों की आकृति बनी है, जिस पर सिन्दूरी रंग लगा हुआ है, चौथी आकृति जो मूर्ति की तरह प्रतीत हो रही है, उस पर सिन्दूर का मौटा लेप लगा हुआ है। शिलापट्ट भूमि पर काफी लंबे समय से पड़े प्रतीत हो रहे हैं। ये प्रथम दृष्टया किसी बड़े भवन के खंडित अंश नजर आते हैं। बैरिकेडिंग के अंदर मस्जिद की पश्चिम दीवार के बीच मलबे का ढेर पड़ा है। ये शिलापट्ट पत्थर भी उन्हीं का हिस्सा नजर आ रहे हैं। इन पर उभरी कुछ कलाकृतियां मस्जिद की पीछे की पश्चिम दीवार पर उभरी कलाकृतियों जैसी दिख रही है। परंतु मुस्लिम पक्ष के विरोध के कारण यह सर्वे रुक गया।

द्वितीय सर्वे रिपोर्ट (विशेष कोर्ट कमिश्नर विशाल सिंह के द्वारा)

यह रिपोर्ट 14 से 16 मई के बीच का है जो मुस्लिम पक्ष के विरोध के बाद हुआ था। ये लगभग 12-14 पन्नों की रिपोर्ट है। अजय कुमार मिश्र की तरह विशाल सिंह की रिपोर्ट में भी मस्जिद परिसर में हिंदु आस्था से जुड़े कई निशान मिलने की बात कही गई है। रिपोर्ट में शिवलिंग बताए जा रहे पत्थर को लेकर भी डिटेल में जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वजूखाने में पानी कम करने पर 2.5 फीट का एक गोलाकार आकृति दिखाई दी, जो शिवलिंग जैसा है। गोलाकार आकृति ऊपर से कटा हुआ डिजाइन का अलग सफेद पत्थर है। जिसके बीच आधे इंच से का छेद है, जिसमें सींक डालने पर 63 सेंटीमीटर गहरा पाया गया। इसे वादी पक्ष ने शिवलिंग बताया तो प्रतिवादी पक्ष ने कहा कि यह फव्वारा है परंतु जब हिंदू पक्षकारों ने सर्वे के दौरान कथित फव्वारे को चला]कर दिखाने को कहा तब मस्जिद कमेटी के मुंशी ने फव्वारा चलाने में असमर्थता जताई।

फव्वारे पर मस्जिद कमेटी ने गोल-मोल जवाब दिया। पहले 20 साल और फिर 12 साल से इसके बंद होने की बात कही गई। कथित फव्वारे में पाइप जाने की कोई जगह नहीं मिली है। रिपोर्ट में तहखाने के अंदर मिले साक्ष्यों का जिक्र करते हुए कहा है कि दरवाजे से सटे लगभग 2 फीट बाद दीवार पर जमीन से लगभग 3 फीट ऊपर पान के पत्ते के आकार की फूल की आकृति बनी थी, जिसकी संख्या 6 थी। तहखाने में 4 दरवाजे थे, उसके स्थान पर नई ईंट लगाकर उक्त दरावों को बंद कर दिया गया था। तहखाने में 4-4 पुराने खम्भे पुराने तरीके के थे, जिसकी ऊंचाई 8-8 फीट थी। नीचे से ऊपर तक घंटी, कलश, फूल के आकृति पिलर के चारों तरफ बने थे। बीच में 02-02 नए पिलर नए ईंट से बनाए गए थे, जिसकी वीडियोग्राफी कराई गई है।

एक खम्भे पर पुरातन हिंदी भाषा में सात लाइनें खुदी हुईं, जो पढ़ने योग्य नहीं थी। लगभग 2 फीट की दफती का भगवान का फोटो दरवाजे के बाएं तरफ दीवार के पास जमीन पर पड़ा हुआ था जो मिट्टी से सना हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक अन्य तहखाने में पश्चिमी दीवार पर हाथी के सूंड की टूटी हुई कलाकृतियां और दीवार के पत्थरों पर स्वास्तिक और त्रिशूल और पान के चिन्ह और उसकी कलाकृतियां बहुत अधिक भाग में खुदी हैं। इसके साथ ही घंटियां जैसी कलाकृतियां भी खुदी हैं। ये सब कलाकृतियां प्राचीन भारतीय मंदिर शैली के रूप में प्रतीत होती है, जो काफी पुरानी है, जिसमें कुछ कलाकृतियां टूट गई हैं।

सर्वे के बाद की स्थिति

जिस दिन सर्वे रिपोर्ट दाखिल की गई थी उसी दिन सुप्रीम कोर्ट मे भी सुनवाई हो रही थी और सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी सत्र न्यायालय के सुनवाई पर रोक लगा डी और सुनवाई 20 मई तक टल गई। 20 मई को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया की मामले की फिलहाल सुनाई वाराणसी सत्र न्यायलय ही करे और 17 मई का आदेश जो था की शिवलिंग की सुरक्षा की और नमाज़ मे कोई बाधा न आए वो 8 हफ्ते तक प्रभावी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट मे मामले की अगली सुनवाई गर्मी के छुट्टी के बाद जुलाई के दूसरे हफ्ते होगी।

स्थायी हल खोजा जाना ज़रूरी

धार्मिक विवाद अत्यधिक संवेदनशील विषय है। इसको या तो यहीं छोड़ दिया जाए, जैसा पिछले सात दशकों में हुआ या फिर दोनों पक्ष अपनी भावनाओं पर काबू रखकर तथ्यपरक इतिहास और भौतिक सत्यापन तथा वैज्ञानिक आधार पर संसदीय विधि से इसका स्थायी समाधान खोज लें। यह सच है कि विभिन्न कालखंडों में हिंदुओं का व्यापक धर्मांतरण और मंदिर तथा दूसरे संस्थान तोड़कर उनकी जगह मस्जिदें खड़ी करने की नीति विवाद का विषय रही है, जिसका प्रमाण दस्तावेज़ सम्बन्धी पुस्तकें और इमारतें ख़ुद दे रही हैं। ऐसी स्थिति में बार-बार अदालत में जाकर इन विवादों को लंबा खींचने से अच्छा है कि दोनों पक्ष किसी अंतिम समझौते पर पहुँच जाएं और ऐसा क़ानून बन जाए, ताकि विवादों का पटापेक्ष हो जाए।

 

 

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