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बाल ठाकरे की विरासत का सम्मान

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

महाराष्ट्र में ढाई वर्ष बाद बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को सम्मान मिला.भाजपा ने उनके विचारों पर आगे बढ़े एक नाथ शिंदे को मुख्यमन्त्री बनाया है. बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे ने इस विरासत को एनसीपी और कांग्रेस पर न्यौछावर कर दिया था. उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सिद्धांतो का परित्याग कर दिया था. बाल ठाकरे के हिन्दुत्व की बात महाआघाड़ी गठबंधन में करना गुनाह हो गया था.

बाल ठाकरे सेक्यूलर नेताओं के निशाने पर रहते थे. पाकिस्तान, अनुच्छेद 370,अयोध्या जन्म भूमि मंदिर आदि मुद्दो पर उनके विचार स्पष्ट थे. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उद्धव ठाकरे ने इनकी चर्चा पर विराम लगा दिया था. इतना ही नहीं ऐसे अनेक विषयों पर वह सेक्युलर नेताओं की जुगलबन्दी करते थे.

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी राजनीति में वंशवाद का मुखर विरोध करते रहे हैं. उनके अनुसार यह प्रजातंत्र के लिए घातक है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार में भी उन्होंने इसे मुद्दा बनाया था. यहां मतदाताओं ने वंशवाद को नकार दिया. महाराष्ट्र में में एक नई मिसाल कायम हुई है. यहां परिवार से बाहर के व्यक्ति ने राजनीतिक विरासत संभाली है. इसका दूरगामी प्रभाव होगा.भाजपा को छोड़कर कर यहां सभी पार्टियां व्यक्ति या परिवार पर आधारित है.

इन सबके लिए महाराष्ट्र का घटनाक्रम एक सबक है.जेपी नड्डा ने कहा कि भाजपा के मन में कभी मुख्यमंत्री पद की लालसा नहीं थी। विधानसभा चुनाव में स्पष्ट जनादेश नरेंद्र मोदी एवं देवेंद्र फडणवीस को मिला था. उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद के लालच में भाजपा का छोड़कर विपक्ष के साथ सरकार बनाई थी. भाजपा ने महाराष्ट्र की जनता की भलाई के लिए बड़े मन का परिचय देते हुए एकनाथ शिंदे जी का समर्थन करने का निर्णय किया.

देवेन्द्र फडणवीस ने भी बड़े मन दिखाते हुए मंत्रिमंडल में शामिल होने का निर्णय किया है, जो महाराष्ट्र की जनता के प्रति उनके लगाव को दर्शाता है। भाजपा ने ये निर्णय लेकर एक बार फिर साबित कर दिया है कि कोई पद पाना हमारा उद्देश्य नहीं है अपितु नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश और महाराष्ट्र की जनता की सेवा करना हमारा परम लक्ष्य है।

(उपरोक्त, लेखक के निजि विचार हैं…..!!)

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