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पिछले 9 महीने में आज सबसे ज्यादा कमजोर हुआ भारतीय रुपया, समझें आखिर कैसे कमजोर होता है

कोरोना वायरस महामारी के बढ़ते मामले और अर्थव्यवस्था पर इसके पड़ते असर की वजह से रुपये में कमजोरी देखने को मिल रही है. सोमवार को शुरुआती सत्र में डॉलर के मुकाबले रुपया 75.19 के स्तर पर लुढ़क चुका है. इसके साथ ही प्रति डॉलर रुपये का भाव बीते 8 महीने के निचले स्तर पर चला गया. भारत में कोविड-19 के मामले लगातार ​नये रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहे हैं. सोमवार को देशभर में 1 लाख 68 हजार से ज्यादा मामले आए हैं. विभिन्न राज्यों की सरकारें मौजूदा महामारी को नियंत्रित करने के लिए नाइट कर्फ्यू समेत कई तरह के प्रतिबंध लगा रही हैं.

बढ़ती महंगाई के बीच भारतीय रिज़र्व बैंक बड़े स्तर पर सरकारी बॉन्ड्स खरीद रहा है. हाल ही में आरबीआई द्वारा करीब 1 अरब डॉलर के बॉन्ड खरीदारी की खबरों के बाद रुपये में दबाव देखने को मिला. साथ ही अब संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच आशंका है कि अर्थव्यवस्था में रिकवरी की रफ्तार थम सकती है. चिंता की बात यह भी है कि रुपये में कमजोरी की वजह से अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी की जेब पर भी असर पड़ेगा.

क्या होगा रुपये में कमजोरी का असर?

डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर असर पड़ सकता है. मार्च महीने में तीन दिनों की कटौती के बाद यह लगातार 13 दिनों से स्थिर है. दरअसल, भारत अपनी जरूरत का करीब 84 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है. कमजोर रुपये से इसका आयात महंगा हो जाएगा. इसके बाद तेल कंपनियां पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ा सकती हैं.

अगर तेल कंपनियां डीज़ल के दाम बढ़ाती हैं तो महंगाई भी बढ़ेगी. महंगे डीज़ल की वजह से माल ढुलाई में इजाफा होगा. इसके अलावा, भारत में बड़े पैमाने पर खाद्य तेलों और दालों का भी आयात करता है. ऐसे में रुपये में गिरावट से खाद्य तेल और दाल महंगे हो जाएंगे.

जिन लोगों ने विदेशों में अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए एडमिशन करा रखा है, उनपर भी रुपये की गिरावट से मार पड़ेगी. डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी से उनका खर्च बढ़ जाएगा. पहले की तुलनों में उन्हें विदेश में वस्तुओं और सेवाओं के लिए ज्यादा खर्च बढ़ जाएगा. साथ ही विदेश यात्रा पर भी भारतीयों को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे.

हालांकि, रुपये में गिरावट से भारतीय आईटी कंपनियों को फायदा होगा. दरसअल, विदेशों में इन कंपनियों की कमाई डॉलर के मद में होती है. इस प्रकार रुपये के मुकाबले मजबूत डॉलर से इन कपंनियों की कमाई बढ़ जाएगी. इसके अलावा निर्यातकों को भी फायदा होगा. दूसरी ओर आयातकों को नुकसान होगा.
कैसे डॉलर के मुकाबले रुपये में आता है उतार-चढ़ाव?

रुपये की कीमत पूरी तरह से डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है. साथ ही, इस पर आयात और निर्यात का भी असर पड़ता है. भारत समेत दुनियाभर के देशों के पास दूसरे देशों की मुद्रा भंडार होती है. इसी की मदद से वे आपस में सौदा करते हैं. इसी विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े आरबीआई द्वारा समय-समय पर जारी किया जाता है.

सरल भाषा में समझें तो मान ली​जिए कि भारत और अमेरिका में कोई कारोबार हो रहा है. अमेरिका के पास 70,000 रुपये और भारत के पास 1,000 डॉलर है. अगर आज प्रति डॉलर का भाव 70 रुपये है तो दोनों देशों के पास बराबर रकम है. अब अगर हम अमेरिका से कोई सामाना आयात करते हैं, जिसकी कीमत 7,000 रुपये है तो इसके लिए हमें 100 डॉलर खर्च करने होंगे. इस खर्च के बाद भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में केवल 900 डॉलर बचे हैं. जबकि, अमेरिका के पास 63,000 रुपये बचे हैं. इस प्रकार भारत अमेरिका के पास 63,000 रुपये के अलावा उन्हें अपना 100 डॉलर भी मिल गया. अगर भारत 100 डॉलर का कोई सामान अमेरिका का दे देता है तो भारत की स्थिति ठीक हो जाएगी.

जब बड़े स्तर पर ऐसे ही कारोबार चलता है कि किसी भी देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमजोरी आती है. कुल मिलाकर अगर फिलहाल हम अंतरराष्ट्रीय बाजार से कुछ खरीदना चाहते हैं तो हमें अधिक रुपये खर्च करने होंगे.

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