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मध्यप्रदेश : जनभावना का सम्मान

मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार की विदाई से संविधान और जनभावना का हुआ। यह जाहिर है कि उनकी सरकार अल्पमत में थी। संसदीय प्रजातंत्र में सँख्याबल महत्वपूर्ण होता है। इसी के आधार पर सत्ता का निर्धारण होता है। लेकिन मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार संख्या और जनविश्वास दोनों से वंचित हो चुके थे। इस सच्चाई को वह समझते थे। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के सहयोग से कुछ दिन और सत्ता सुख लेना चाहते थे। इसीलिए करोना का नाम लेकर छब्बीस मार्च तक विधानसभा स्थगित कर दी गई थी।

इसके बाद कर्नाटक गए कांग्रेस के विधायकों का मसला उठाया गया। यह दिखाने का प्रयास हुआ कि जैसे ये सब कमलनाथ के समर्थक थे। इसके लिए दिग्विजय सिंह भी कर्नाटक में नाटक करने पहुंच गए थे। उनका कहना था कि इनको अगवा किया गया। यदि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी इतने विधायको को कोई अगवा करके दूसरे प्रदेश पहुंचा सकता है, तब तो ऐसी सरकार को शर्मिंदगी और विफलता में ही इस्तीफा देना चाहिए था।

जबकि ये विधायक मीडिया में कह रहे थे कि उनको अगवा नहीं किया गया। वह कमलनाथ के दबाब से बचने के लिए कर्नाटक आये है। किसी ने ठीक कहा कि ये विधायक अगवा नहीं भगवा हो चुके है। मतलब साफ था कि इनका कमलनाथ सरकार से विश्वास उठ चुका था। इसके बाद भी यह सरकार कुर्सी से चिपके रहने को व्याकुल थी। उसने राज्यपाल के निर्देश को नजर अंदाज किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने उसे शक्ति परीक्षण के लिए विवश कर दिया। संख्या के साथ यह सरकार लोकप्रियता भी गंवा चुकी थी। क्योंकि पन्द्रह महीनों में वह अपने वादे पूरे करने का लोगों को यकीन तक नहीं दिला सकी थी।

यही कारण था कि माधव राव सिंधिया सहित कांग्रेस के विधायक ही सरकार से नाराज थे। जबकि सिंधिया विधानसभा चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष थे। उन्हें लगा कि कांग्रेस सरकार वादे पूरे करने में विफल साबित हो रही है। इसके बाद भी उसमें कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। यह सोच कर अंततः सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए थे। कमलनाथ छिदवाडा तक ही सीमित बने रहे। इसके बाहर उनका कोई आधार भी नहीं था। दिग्विजय सिंह अपना स्वार्थ पूरा कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने सिंधिया के करीबियों को किनारे लगाना शुरू कर दिया था।

कमलनाथ भी यही चाहते थे। सरकार से ज्यादा वह गुटबंदी में ही दिलचस्पी लेते रहे।बताया जाता है कि दिग्विजय अपने पुत्र को मध्यप्रदेश की राजनीति में आगे बढाना चाहते थे। इसीलिए वह युवा नेताओ की उपेक्षा कर रहे थे। उनकी इस चाल को हाईकमान भी समझ नहीं सका। इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनने या राज्यसभा में भेजने के दावे को नकार दिया गया।कमलनाथ का पूरा जोर किसी तरह सत्ता में बने रहने पर था। दिग्विजय का पुत्र मोह भी कमलनाथ सरकार की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। वह अपने पुत्र को प्रदेशअध्यक्ष या मुख्यमंत्री में से कोई एक बनाने के लिए गोटियां बिछा रहे थे। सरकार में उनका हस्तक्षेप भी कांग्रेस के एक खेमे को अखर रहा था। इस सरकार को गिरना ही था। यह अंतर्विरोधों से घिर चुकी थी। इसके समाधान में कमलनाथ विफल साबित हुए।

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विधानसभा में शक्ति परीक्षण से उंन्होने बचने का प्रयास किया। इससे भी उनकी सत्ता लोलुपता उजागर हुई। यह जगजाहिर हो गया कि सरकार अल्पमत में आ चुकी है। विधानसभा अध्यक्ष केवल कमलनाथ के इशारों पर समय बिता रहे है। अनन्त सुप्रीम कोर्ट को ही नकेल कसनी पड़ी। यह सही है कि कांग्रेस पार्टी एक सौ चौदह सीट लेकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। जबकि भाजपा को एक सौ नौ सीटों पर सन्तोष करना पड़ा था। लेकिन सच्चाई यह भी है कि कांग्रेस अंतर्कलह को रोकने में विफल रही। उसके विधायक ही सरकार गिराने का मन बना चुके थे। ऐसे में सरकार का जाना तय हो चुका था। अपने बचाव में सरकार की ओर से बचकाने तर्क दिए गए। कहा गया कि अठारह महीने पहले ही सरकार ने विश्वास मत प्राप्त किया है। इस बात का कोई मतलब नहीं होता। अठारह घण्टे में सरकार के विधायक उसका साथ छोड़ दें, तो दी ही विकल्प बचते है।

पहला मुख्यमंत्री अल्पमत के कारण खुद इस्तीफा देना,सत्र बुलाकर बहुमत साबित करें। सरकार की तरफ से कहा गया कि विधायकों को अगवा किया गया है। यदि यह मान भी लें तो यह भी कहा जायेगा कि ऐसी लचर सरकार को सत्ता में रहने का अधिकार ही नहीं है। इसके बाद कमलनाथ सरकार ने राज्यपाल पर हमला बोला। कहा कि राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट का जो आदेश भेजा वह पूरी तरह असंवैधानिक है। जबकि बहुमत पर संशय होने पर राज्यपाल को ऐसा निर्देश देने का अधिकार है। ऐसे तर्क सुप्रीम कोर्ट में नहीं चले।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने कमलनाथ सरकार को फ्लोट टेस्ट कराने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा कि अगर बागी विधायक फ्लोर टेस्ट के लिए विधानसभा आने चाहते हैं तो कर्नाटक और मध्य प्रदेश के डीजीपी उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कराए। यह भी तय किया कि विधानसभा का एकमात्र एजेंडा बहुमत साबित करने का होगा। इसमें किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए।

रिपोर्ट-डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

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