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प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का स्मरण

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम ने ईस्ट इंडिया के पैर उखाड़ दिए थे। अंग्रेजों ने इसे कुछ राजाओं के विद्रोह व ग़दर का नाम दिया था। लेकिन भारतीयों के संग्राम ने उन्हें भी भयभीत कर दिया था। यह बात अलग है कि बांटों और राज करो की उनकी नीति अंततः कारगर हुई। इस बात को अंगेज शासकों ने भी स्वीकार किया था। इस बात का उल्लेख उनकी रिपोर्ट में भी किया गया था।

इसके अनुसार बांटों और राज करो की नीति सफल ना होती तो उन्हें 1857 में ही भारत को छोड़ना पड़ता। इसकी नौबत भी तब आती जब भारत में रहने वाले अंग्रेज जीवित रहते। वीर सावरकर ने पहली बात इस संग्राम के भारतीय दृष्टिकोण से तर्कसंगत विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि यह सच्चे अर्थों में देश का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम था।

यह कुछ राजाओं का विद्रोह मात्र नहीं था। बल्कि, यह देश को स्वतन्त्र कराने का संग्राम था। इसमें स्वदेशी शासन को कायम रखने का जज्बा था। इसमें देशप्रेम और राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण का भाव था। किंतु बांटों और राज करो की कुटिल चाल के कारण स्वतन्त्रता के लक्ष्य को हासिल करने में सफलता नहीं मिली। फिर भी इस संग्राम के नायकों ने भावी पीढ़ी को स्वतन्त्रता व स्वदेशी का मार्ग दिखा दिया है। उनके यह बलिदान व्यर्थ नहीं हुआ।

10 मई,1857 को मेरठ जनपद से प्रथम स्वातंत्र्य समर की शुरूआत हुई थी। पश्चिम बंगाल की बैरकपुर छावनी में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल मंगल पांडेय ने फूंका था। उसका असर मेरठ में भी हुआ था। मेरठ के सदर बाजार में सर्वप्रथम क्रांति की ज्वाला प्रस्फुटित हुई थी। उस समय धनसिंह सदर कोतवाल थे। उनकी टीम ने ब्रिटिश नौकरी को दरकिनार करते हुए क्रांतिकारियों के सहयोग किया था।

इससे संग्राम को बल मिला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शहीद स्मारक स्थित अमर जवान ज्योति व मंगल पांडेय की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।।उन्होंने वहां मल्टीपर्पज हॉल का लोकार्पण भी किया। राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय को गत वर्ष तकनीकी रूप में विकसित किया गया है। इसमें स्वाभिमान।स्वराज,संघर्षसंग्राम व संकल्प वीथिका में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास परिलक्षित है।

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