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मेरे राम

मेरे राम

राम जी! मैं आपका शिव आप से यह पूछना है
मैं अयोध्या जा रहा हूं चल रहे हो आप भी क्या

बहुप्रतीक्षित आपके प्रासाद का है भूमिपूजन
ये अपर्णा कह रही है आप से भी पूछ लूँ क्या

यहां तो कोहराम है हे राम अब मैं क्या बताऊँ
बैल मेरा एक है और सब अड़े हैं

कार्तिके लड़ते हैं माँ से कह रहे मैं भी चलूंगा
और लम्बोदर किलक कर द्वार के बाहर खड़े हैं

भूत सब उन्मत्त हैं श्रृंगार करके
रुद्रगण भी साथ चलना चाहते हैं
क्या कहूं कैलाश में ताला लगा कर
सब अयोध्या को निकलना चाहते हैं

सब चलेंगे ये सभी परिवारियों की टेक है
क्या करूँ कैसे करूँ प्रभु बैल मेरा एक है

सुनो शिव,ऐसा करो अब एक नव स्यंदन बनालो
बढ़ गया है कुल अगर तो आप वाहन भी बढ़ा लो!

हंस दिए,श्रीराम बोले मेरा भी परिवार पूरा जा रहा है
कर दिया है इंद्र से मैंने निवेदन
स्वर्ग से अतिशीघ्र पुष्पक आ रहा है

हम उधर ही आ रहे हैं आप सब तैयार मिलना
आपका कुनबा बड़ा है किये साज सम्हार मिलना

शंभु ने जब ये सुना तो कह उठे
प्रभु सर्वहित निष्काम हो
जानता था आप ऐसा ही करोगे
राम थे प्रभु आज भी तुम राम हो

हे उमा,सुनती हो अब कुछ वेग हो कुछ शीघ्रता
राम के परिवार संग हम भी चलेंगे हो त्वरा

सब सुने! जो चाहता है वो अयोध्या जा रहा है
शीघ्र सब तैयार हों अतिशीघ्र पुष्पक आ रहा है

ये सुना, तो भूत और बेताल सब हहरा उठे
अत्यधिक हर्षित गजानन सूंड को लहरा उठे

तब समेकित हो सभी उतुंग पर फिर आ गए
रोमहर्षित श्रंग के सब पुंग पर फिर आ गए

शंभु पर्वत से ये बोले अब प्रतीक्षा आप करना
जा रहे हम सब सो अब अपनी सुरक्षा आप करना

आ गया पुष्पक अचानक सब उधर को बढ़ गए
बाद में कैलाश भी नर रूप धर कर चढ़ गए

शंभु! देखो पुण्य भारत भूमि की बांकी छटा
है कहीं पर वृष्टि छाई है कहीं काली घटा

सुन रहे हो शीशशायनि गंग की उत्ताल धुन
दीर्घकर्णा ए गजानन! गंग का संगीत सुन

हे भवानीपति निहारो गोमती की धार निर्मल
और लो देखो-सुनो सरयू का अद्भुत नाद कलकल

और ये मेरा भवन मेरा वही साकेत प्यारा
सात लोकों सात स्वर्गों से मेरा प्रासाद न्यारा

वो मेरा आंगन जहां मैं नित्य सोता जागता था
हे भुसुण्डी! याद है मैं पूप लेकर भागता था

तात पुष्पक! है निवेदन मन की उत्कंठा निहारो
अब गगन को छोड़ दो इस पुण्य धरती पर उतारो

राम उतरे और मृदा को शीश पर झट ले लिया
जानकी ने भगनियों संग सिर पे घूँघट ले लिया

एक पल को एक क्षण में एक मन्वन्तर बनाने
चल दिये श्रीराम भी,,श्रीराम का उत्सव मनाने

राम के सब इष्ट त्रेता के बदल कर भेष आये
रामभक्तों को अकेले राम ही पहचान पाए

देख कर सबको स्वयं श्रीराम हरषाने लगे
और उनके नाम सबको स्वयं बतलाने लगे

शम्भु! देखो वीथिका में बेर स्त्री बेचती है
मैं गया पहचान मेरी लाडली शबरी वही है

और ये जो रास्तों पर जल पलेवा कर रहे हैं
ये हैं केवट और गुह जो कारसेवा कर रहे हैं

मार्ग में जो नृत्य करता जा रहा है मग्न तन मन
जानकी! देखो यही तो है मेरा प्यारा सुतीक्षन

देखना निर्माण में जो हैं लगाए निज लगन ये
शिष्य ऋषियों के ही तो आए हैं न,प्यारे लखन! ये

और त्रेता के ही तो सब सन्त मुझ को दिख रहे हैं
एक रामायन पुनः सब लोग मिलकर लिख रहे हैं

वो जो कुछ आत्माओं का एकत्र जमघट है क्षितिज पर
प्राणदानी कारसेवक हैं हुए बलिदान मुझ पर

वो जो दो आत्मा खड़े हैं नैन जिनके झील हैं
बन्धु कोठारी मगर त्रेता के वे नल नील हैं

राम के हित राज्य देकर हर्षयुत गदगद है जो
सर्वथा ‘कल्यान’ हो,,मेरा वही अंगद है वो

‘भारती, प्रज्ञा’ की जो प्रस्तुत बनी पहचान हैं
वो ‘अहल्या,सिंहिका’ हैं, काल का वरदान हैं

न्याय के हित जो लड़े सुग्रीव हैं बलग्रीव हैं
सत्य कहता रुद्र! वे प्रासाद की शुभ नींव हैं

वो जो एक ‘खल्वाट’ लवकुश देखते, हो वृद्ध हैं
वो परमप्रिय राम के जर्जर-जटायू गृद्ध हैं

और वो जो नृत्य करते और भगवा ध्वजा गहे हैं
ये सभी मेरे परमप्रिय,,राम सेना में रहे हैं

शंभु बोले और ये जो लोग शंका में दहे हैं
राम बोले छोड़िए,,वो लोग लंका में रहे हैं

आप तो इस ओर देखो राम भक्तों का घराना
ये न हारे हैं,,नहीं संभव कभी इनको हराना

जिसके दल का लोकतांत्रिक आज और ‘कल राज’ है
वो मेरा त्रेता का प्यारा भक्त भल्लुक राज है

वो जो योगी वेश में,,कह राम मुस्काने लगे
देख कर हनुमान उनको लूम लहराने लगे

और फिर करुणाअयन के नयन भर आने लगे
देखकर ‘जजमान’ को वे मौन हो जाने लगे

दृग पटल थे बन्द आंसू ओष्ठ चिपकाने लगे
बोलना तो चाहते थे शब्द थर्राने लगे

पलटकर देखा तो लछमन शत्रुहन सब थे वहीं
भरत को ढूंढा बहुत पर वे नहीं दीखे कहीं

और इधर श्री राम जय के नाद गूंजे जा रहे थे
दो खड़ाऊं रख के सिंघासन पे पूजे जा रहे थे

‘मुख्य होता’ आंसुओं से वो खड़ाऊं धो रहा था
लौट कर आया दुबारा राम भी तो रो रहा था।।

✍️अजय अंजाम, औरैया
9410463211

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