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स्मृति शेष: संघ समारोह में प्रणव दा

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी विचारों के प्रति दृढ़ थे। उन्हें जो उचित लगता था, उसे कहने और उस पर आचरण का उनमें साहस था। यही कारण था कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से उनका कई बार टकराव भी हुआ। इसी दृढ़ता से उन्होंने आरएसएस के आमंत्रण को स्वीकार किया था। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस नेताओं के विरोध को दरकिनार कर दिया था।

करीब दो वर्ष पहले नागपुर में संघ के समारोह में वह सम्मलित हुए। उनके व्याख्यान को लोग आज भी याद करते है। उस समय के उनके भाषण को सिलसिलेवार रूप में देखें तो लगेगा कि उन्होंने संघ को बेहतर ढंग समझा था। यही कारण है कि उनके और सरसंघचालक मोहन भागवत के विचारों का मूल तत्व एक जैसा थे। वह यह कि भारत और विश्व की समस्याओं का  समाधान भारतीय चिंतन से हो सकता है। उन्होंने संघ के समारोह में उदारता, राष्ट्रवाद,मानव कल्याण, सहिष्णुता,पंथ निरपेक्षता की जो बात उठाई थी। वैसे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नकारात्मक हमलों के बाबजूद इस शाश्वत चिंतन के ध्येय मार्ग पर चल रहा है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नागपुर में  उदार व शाश्वत भारतीय चिंतन से प्रेरित विचार व्यक्त किये थे। भारत बहुलतावादी देश है। ऐसी विविधता विश्व में कहीं नहीं है। ऐसे में हमारे सामने उदार चिंतन के अलावा सौहार्दपूर्ण ढंग से रहने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। दुनिया में ऐसा उदार चिंतन दुर्लभ है। सभ्यताओं का संघर्ष विश्व इतिहास की सच्चाई है,जो कि अपने  तलवार के बल पर अपने मजहब के प्रचार का परिणाम था। हालांकि ऐसे लोगों के बीच भी भारतीय चिंतन वसुधा को कुटुंब मानने का सन्देश देता रहा, सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करता रहा। तब प्रणब मुखर्जी ने जिस पंथनिरपेक्षता की बात कही थी, वह ऐसे ही उदार चिंतन में संभव है।प्रणब मुखर्जी ने संघ संस्थापक डॉ.हेडगेवार को भारत माता का महान सपूत बताया था। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। संघ की स्थापना के बाद भी कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन की व्यवस्था उन्होंने की थी।

जाहिर है कि वह देश को स्वतंत्र कराने के प्रयास में लगे थे। यह प्रयास उन्होंने संघ की स्थापना के बाद भी जारी रखा। केवल तरीका बदला था। संघ के स्वयंसेवक स्वतंत्रता संग्राम को संचालित रखने में सहयोगी बनते थे। कांग्रेस के नेताओ ने संघ के कार्यक्रम में उनके जाने का विरोध किया था। इस विरोध से ही इतिहास के अनेक पृष्ठ नए सिरे से चर्चा में आ गये थे। जब महात्मा गांधी संघ के शिविर में जा सकते है,वहां स्वयं सेवकों से संवाद कर सकते है, उनके शिविरों में भोजन व्यवस्था, रसोई,भोजन वितरण आदि का अध्ययन कर सकते है,तो प्रणब मुखर्जी का वहाँ जाना गलत कैसे हो सकता है।

महात्मा गांधी यह देखकर चकित थे कि संघ के स्वयंसेवको के बीच कोई जाति भेद की भावना ही नहीं थी। कौन बना रहा है,कौन परोस रहा है, कौन साथ में बैठ कर एक पंगत में भोजन कर रहा है, इसका कोई जातिगत विवरण ही नहीं था। यह वह समय था, जब देश में अश्पृश्यता थी। महात्मा गांधी सहित अनेक महापुरुष इसे समाप्त करने का अभियान चला रहे थे। लेकिन यह कार्य संघ के संस्थापक ने इतनी सहजता से कर लिया था। इसे देख कर महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे। डॉ आम्बेडकर भी इस समरसता के विचार को अच्छा मानते थे।

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इस प्रकार इतिहास के अनेक पृष्ठ पलटे गये। आजादी के बाद गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने सरसंघचालक  गुरु गोलवलकर को कश्मीर नरेश से वार्ता हेतु भेजा था। कश्मीर समस्या के समाधान में उन्होंने भी सरदार पटेल के आग्रह पर पूरा सहयोग किया था। कांग्रेस के वर्तमान नेताओं को इतिहास के वह पृष्ठ भी दिखाए गए, जब जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री ने बतौर प्रधानमंत्री संघ के स्वयंसेवको को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राजपथ पर आमंत्रित किया था।

नेहरू बाँसठ और शास्त्री पैसठ के युद्ध में संघ के स्वयं सेवकों के आंतरिक व्यवस्था में सहयोग से प्रभावित थे। संघ के  राष्ट्रभाव से प्रभावित होकर ही उसे गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित किया गया था। यह राष्ट्रभाव की प्रेरणा है जो संघ के स्वयंसेवकों को सेवा कार्यो की ओर ले जाती है। जय प्रकाश नारायण ने यहां तक कहा था कि यदि संघ साम्प्रदायिक है,तो मैं भी साम्प्रदायिक हूं। प्रणब मुखर्जी ने भी इन्हीं बातों को आगे बढ़ाया था। उन्होंने ठीक कहा कि हमारा समाज शुरू से ही खुला था और सिल्क रूट से पूरी दुनिया से जुड़ा था। यूरोप से बहुत पहले ही हम राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुके थे।और हमारा राष्ट्रवाद उनकी तरह संकुचित नहीं था।

यूरोपीय राष्ट्रवाद साझा दुश्मन की अवधारणा पर आधारित है,लेकिन वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा वाले भारत ने पूरी दुनिया को अपना परिवार माना। प्राचीन काल में भारत आने वाले सभी यात्रियों ने इसकी प्रशासनिक दक्षता, ढांचागत सुविधा और व्यवस्थित शहरों की तारीफ की है। सहिष्णुता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। उस समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसी ध्येय मार्ग का उल्लेख किया था।

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

 

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