शरद पूर्णिमा: इस बार बन रहा है ऐसा दुर्लभ संयोग,जानिए पूजा विधि

शरद पूर्णिमा के रात की शास्त्रोक्त मान्यता है कि आसमान से धरती पर चांदनी रात में अमृत बरसता है, इसलिए इस झिलमिलाती अमृत बरसाती तारों भरी रात में आरोग्य की कामना की जाती है और इस दिन खीर के साथ निरोगी काया के लिए औषधियां भी वितरित की जाती है। चंद्रमा की छटा इस दिन अपनी सोलह कलाओं के साथ बेहद निराली होती है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने सोलह कलाओं के साथ जबकि श्रीराम ने 12 कलाओं के साथ जन्म लिया था।

खास संयोग
शरद पूर्णिमा पर इस बार विशेष योग का निर्माण हो रहा है। यह अत्यंत दुर्लभ योग 30 साल बाद चंद्रमा और मंगल के आपस में दृष्टि संबंध स्थापित होने से बन रहा है। चंद्रमा-मंगल के इस योग को महालक्ष्मी योग कहते हैं। शरद पूर्णिमा पर मीन राशि में चंद्रमा और कन्या राशि में मंगल रहेगा। मंगल हस्त नक्षत्र में रहेगा, जो चंद्रमा के स्वामित्व वाला नक्षत्र है। इसके साथ ही चंद्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ने से गजकेसरी नाम का एक और शुभ योग का भी निर्माण हो रहा है

शुभ मुहूर्त

  • इस बार शरद पूर्णिमा रविवार 13 अक्‍टूबर 2019 को है।
  • शरद पूर्णिमा का प्रारंभ- 13 अक्‍टूबर को रात बारह बजकर छत्तीस मिनट से
  • शरद पूर्णिमा की समाप्ति – 14 अक्‍टूबर को रात 2 बजकर अड़तीस मिनट पर
  • चंद्रोदय का समय – 13 अक्‍टूबर को पांच बजकर छब्बीस मिनट

पूजा विधि
शरद पूर्णिमा के दिन सूर्योदय के पूर्व उठ जाएं। स्नान आदि से निवृत्त होकर शरद पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लें। घर में देवी-देवता के सामने गाय के घी का दीपक लगाएं। देवी-देवताओं का विध-विधान से पूजन करें। इंद्र और देवी लक्ष्मी की विशेष रूप से पूजा करें। अबीर, गुलाल, कुमकुम, हल्दी मेंहदी, अक्षत, सुगंधित फूल और वस्त्र समर्पित करें। इसके बाद मिष्ठान्न, फल और सूखे मेवों का भोग लगाएं। धूपबत्ती और घी का दीपक जलाएं और आरती उतारें।

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शाम के समय देवी लक्ष्मी का विशेष पूजन करें। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर प्रसाद चढ़ाएं और आरती उतारें। रात्रि 12 बजे बाद घर के सभी सदस्यों के साथ चांदनी में रखी हुई खीर को ग्रहण करें। देवी लक्ष्मी के साथ धन के देवता कुबेर का भी पूजन करें।

कुबेर का मंत्र
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये
धन धान्य समृद्धिं मे देहि दापय दापय स्वाहा।।

चंद्रमा को अर्घ्‍य देने का मंत्र
ॐ चं चंद्रमस्यै नम:
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम ।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणं ।।
ॐ श्रां श्रीं

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