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केपी सक्सेना सम्मान पर हुए विवाद को लेकर सुभाष चन्दर ने दिया जवाब

रीड पब्लिकेशन, प्रयागराज द्वारा उनकी प्रकाशन योजना के तहत “केपी सक्सेना व्यंग्य सम्मान” हेतु पांडुलिपि या आमंत्रित की गई थी। इस सम्मान हेतु 17 पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई थी, जिन्हें निर्णय को के पास भेजा गया था। निर्णायकों में वरिष्ठ व्यंग्य लेखक सुभाष चंदर, गिरीश पंकज एवं अट्टहास के प्रधान संपादक अनूप श्रीवास्तव शामिल थे।

पुरस्कार की घोषणा विगत 31 जुलाई को की गई थी, जिसमें लखनऊ के व्यंग्यकार पंकज प्रसून को प्रथम एवं कनाडा में रहने वाले धर्मेंद्र जैन को द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था । निर्णय आने के बाद इस पुरस्कार को लेकर विवाद शुरू हो गया इस प्रतियोगिता में शामिल कई प्रतिभागियों ने निर्णायकों पर सवाल उठाये थे। यह कहा गया था कि निर्णायकों ने 100 अंकों में 30 अंक हास्य तत्व के रख कर पक्षपातपूर्ण रवैया तो अपनाकर अपने पसंदीदा प्रतिभागी को विजेता बना दिया।

अब इस बारे में सुभाष चंदर ने फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखते हुए अपना मत रखा है। बिना नाम लिए हुए उन्होंने निर्णय को लेकर विवाद करने वालों पर तीखा व्यंग्य किया है। सुभाष चंदर ने कहा…. “मित्रो, पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया से दूर ही रहा। कुछ दफ्तरी काम थे, कुछ साहित्यिक काम पेंडिंग थे, वे पूरे किए। इस के अलावा कुछ उत्साही युवा लेखकों और उनके चेले चपाटों ने रीड प्रकाशन के एक पुरस्कार को लेकर जो रायता फैलाया था। उससे भी मन दुखी था। मन ही नहीं किया कि फेसबुक पर आया जाए। आत्ममुग्ध और पुरस्कारलोलुप लोगों की एक लॉबी द्वारा आरोप लगाए गए कि हम निर्णायकों अनूप श्रीवास्तव, गिरीश पंकज और मैंने गलत निर्णय लिया। ज्ञातव्य है कि इसमें पंकज प्रसून को प्रथम और महेन्द्र जैन को द्वितीय पुरस्कार घोषित हुआ।”

वैसे ऐसा अक्सर होता था कि जब भी किसी पुरस्कार की घोषणा होती है तो कुछ हार को बर्दाश्त न करने वाले लोग इकट्ठे होकर शोर मचाते ही हैं।इसमें कुछ खास गलत भी नहीं है। पर मज़े की बात इन लोगों में वे लोग भी थे जो कथित तौर पर अपने थे। इनमें कोई भाषा शैली सीखने का प्रयास करता था, तो कोई व्यंग्य की आलोचना के टिप्स लेता था। इनमें दो लोगों को लगातार व्यंग्य के दो पुरस्कार मिले, जिनके चुनाव में मेरा भी हाथ था।एक सज्जन को तो गौरतलब व्यंग्य जैसी योजना में शामिल किया था। जिसमें गोपाल चतुर्वेदी, ज्ञान चतुर्वेदी, हरीश नवल, सुभाष चंदर, आलोक पुराणिक के साथ ये सज्जन भी थे और इन्हें भी हम सब की भांति 10,000 की रॉयल्टी भी मिली थी। इसके अलावा अपनी कृति हिंदी व्यंग्य के इतिहास के संशोधन के समय इन्हे मुख्य व्यंग्यकारों में शामिल किया था। कुछ बड़ी पत्रिकाओं में रिकमेंड भी किया गया। (यह इसलिए बता रहा हूं कि कोई भी तथाकथित चेला या चेली इन सब योजनाओं में शामिल नहीं था)

इस पूरे प्रकरण में पुरस्कार आयोजक रीड प्रकाशन (जिसके स्वामी राजेश श्रीवास्तव स्वयं समर्थ रचनाकार हैं।) से एक छोटी सी गलती जरूर हुई थी कि उसने पुरस्कार का नाम व्यंग्य पुरस्कार की जगह हास्य व्यंग्य पुरस्कार नहीं रखा था। निर्णायकों को भेजे गए पत्र और अंक पत्रों का फॉर्मेट (जिसमें हास्य को सर्वाधिक 30अंक दिए गए थे।) स्पष्ट इंगित करता था कि कि हास्य प्रधान रचनाओं या हास्य मिश्रित व्यंग्यों को लाभ मिले। कदाचित आयोजकों ने सोचा होगा कि स्व केपी सक्सेना के नाम पर पुरस्कार है और केपी दद्दा हास्य मिश्रित व्यंग्य के लिए ही प्रसिद्ध थे तो लोग खुद समझ लेंगे।रीड प्रकाशन के पत्र और अंक पत्र के फॉर्मेट की प्रति ईमेल सहित लगा रहा हूं जो 30 जून 2020 की है। यह उन युवा आलोचक महोदय को भी जवाब है जिन्होंने लिखा कि चूंकि अपने को जब पुरस्कार नहीं मिला तो बाद में फॉर्मेट बदलवा दिया, वह कृपया देख लें कि 30 जून के पत्र में भी यही फॉर्मेट था।

खैर…अब कुछ सवाल आते हैं।

1. क्या पुरस्कार इतनी बड़ी चीज होते हैं कि आप रिश्ते नाते ,किसी का सहयोग, किसी से कुछ सीखने की कृतज्ञता, सदाशयता सब भूल जाएं और सोशल मीडिया पर कुक्कुर रोदन का नज़ारा पेश करें।लोगों से अपना और व्यंग्य का मज़ाक उड़वाए।

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2. यदि आप यह मानते हैं कि पुरस्कार को लेकर अगर किसी तरह की विसंगति होगी तो हम विरोध करेंगे ही । तो आपसे पूछना चाहूंगा उस समय आप और आपके चेले चपाटे कहां सो गए थे जब व्यंग्य में कूड़े के सबसे बड़े उत्पादक को व्यंग्य के पुरस्कार दिये गए ।अब आप यह तो नहीं कह सकते कि आप को पता नहीं था।उस समय तो बस व्यक्तिगत बातचीत में – हे भगवान! बहुत बुरा हुआ ,यह तो अन्याय है वगैरह का आलाप करके ही चुप हो गए थे।क्योंकि तब आप में से कुछ को उनसे काम मिलने की संभावना थी या उनके किसी कार्यक्रम में भागीदारी का आमंत्रण चाहिए था।विरोध कैसे करते। मतलब आपका विरोध उस समय के लिए आरक्षित है जब पुरस्कार आपको या आपके किसी चेले चपाटे को नहीं मिलता है। वरना आप चुप रहेंगे ?

क्या था मामला…. http://व्यंग्यकार पंकज प्रसून को मिलेगा ‘केपी सक्सेना व्यंग्य सम्मान ‘2020’ https://samarsaleel.com/satirist-pankaj-prasoon-to-receive-kp-saxena-satire-award-2020/125229

3. एक सरोकारों को समर्पित सज्जन जो इस प्रकरण के केंद्र में थे ( मैं..मैं.और केवल मैं के उपासक इन श्रीमान को परसाई की रचनाएं भी कमज़ोर लगती हैं और शरद जी की भी ज्ञान से लेकर आलोक तक कहीं तक भी उन्हें अपने सामने कोई नहीं लगता। इसी कारण इन सज्जन को मुझे कहने पड़ा था कि कृपया मुझसे दूर रहें, मुझे फोन न किया करें।उन्हें भी बदला लेने का अच्छा मौका मिला।) वैसे उनकी पुरस्कारलोलुपता के अलग खेल देखने को मिले ।वह जितने प्रेम से आर एस एस की संस्था से व्यंग्य का पुरस्कार लेते हैं उतना ही वामपंथी संस्था से ।पुरस्कार के मामले में वह सरोकार या विचारधारा को बीच में नहीं लाते। यही नहीं वह किसी एक संस्था का के पी स्मृति सम्मान ले चुके हैं,अब उन्हें दूसरी संस्था का भी चाहिए था। क्यों भाई सारे पुरस्कार आपको ही चाहिएं ,नहीं मिले तो आप आरोप लगाएंगे।

4. त्रिपाठी,त्रिवेदी,तिवारी गुट के संयोजक एक युवा आलोचक महोदय ने लिखा कि पुरस्कार अपने को दिलाना था इसलिए बाद में फॉर्मेट बदल दिया। उनके लिए रीड प्रकाशन के ईमेल का स्क्रीनशॉट संलग्न है। यह उन युवा आलोचक महोदय को भी जवाब है, वह कृपया देख लें कि 30 जून के पत्र में भी यही फॉर्मेट था।

5. हास्य को लेकर इन लोगों ने एक अलग सा वितंडावाद फैलाया। हास्य लेखन को भड़ैती और मसखरेपन का नाम दिया गया।यह पढ़कर लगा कि हास्यलेखन कोई बहुत ही पोचा सा, निकृष्ट टाइप का कर्म है। उसका लिखना भी कोई लिखना है पांचू ! यहां एक बात कहना चाहूंगा कि बकौल श्रीनारायण चतुर्वेदी हास्य लिखना हवा में गांठ बांधने जैसा है। परसाई, ने इंस्पेक्टर मातादीन चंद पर से लेकर रानी नागफनी की कहानी तक में हास्य का प्रयोग किया है। शरद जोशी से लेकर ज्ञान चतुर्वेदी तक सबने हास्य लिखा है और जमकर लिखा है।शरदजी की पचासों रचनाएं हास्य केंद्रित है।रवीन्द्रनाथ त्यागी की 80 प्रतिशत से भी अधिक रचनाएं नफीस हास्य या विट संपन्न गद्य का उदाहरण हैं। खुद केपी सक्सेना को हास्य मिश्रित व्यंग्य के लिए जाना जाता था।ज्ञान जी का बारामासी व्यंग्य से अधिक अपने श्रेष्ठ हास्य के कारण जाना जाता है। शादी नृत्य निर्देशिका जैसी उनकी अनेक रचनाएं हास्य रचनाएं ही हैं।

6. एक और बात कि अगर आयोजक निर्णायकों को एक पत्र का कोई फॉर्मेट देता है तो आप उससे अलग हटकर नम्बर कैसे दे सकते हैं ।ये मसला कोई सुलझा सके तो बताना।

कुल मिलाकर कहना यह है मान्यवर कि मामला सिर्फ ये है कि आपको पुरस्कार नहीं मिला,आपकी आत्म मुग्ध छवि को धक्का लगा,आपको लगा कि आपके अलावा पुरस्कार लेने का अधिकार किसको है।इसी सोच के साथ आपने ये सब सस्ती हरकतें की।पर इसके लिए आपको अपने किसी युवा साथी को अपमानित करने का अधिकार नहीं मिल जाता ,निर्णायकों को गलत साबित करने की छूट नहीं मिल जाती। और हां…रही बात मेरी ..तो सुनो मैं ऐसे ही रहूंगा .. मै बदलने वाला नहीं हूं।इसी तरह आईने की आंखों में आंखें डालकर खड़ा रहूंगा…।

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