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बरसाती मेंढक की तरह फुदकते दलबदलू नेता 

      अजय कुमार

लखनऊ। भारतीय राजनीति में दलबदल किसी ‘कैंसर’ से कम नहीं है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो नेता सत्ता की मलाई खाने के लिए मंत्री बनकर किसी सरकार के आम और खास फैसलों का भागीदार बनता है और चुनाव के समय अचानक उसको याद आ जाता है कि जिस सरकार में वह पांच वर्ष तक मंत्री बना बैठा था, वह सरकार तो उसकी आंखों में धूल झोंक रही थी. सरकार न तो दलितों, पिछड़ों और न ही किसानों का ख्याल रख रही थी.

जिस सरकार में वह मंत्री बना बैठा था वह तो सामजिक न्याय की लड़ाई ही नहीं लड़ रही थी.यह विचार मन में आते ही नेताजी हर पांच साल बाद पाला बदल लेते हैं और चुनावी मौसम के वैज्ञानिक की तरह उस पार्टी में कूद कर पहुंच जाते हैं,जिसके खिलाफ वह पांच वर्षो तक जहर उलगते रहे थे.भले इसे कोई नेताजी की बेर्शमी और मौकापरस्ती की पराकाष्ठा समझता हो,परंतु नेताजी को इससे क्या लेना उन्हें तो सिर्फ मंत्री की कुर्सी दिखाई देती है,इस लिए जहां यह कुर्सी दिखती है,वह वहां बरसाती मेंढक की तरह फुदक कर पहुंच जाते हैं.

इसी लिए पहले स्वामी प्रसाद मौर्या जी को बहनजी अच्छी लगती थीं,फिर भाजपा अच्छी लगने लगी और अब समाजवादी पार्टी अच्छी लग रही है. वाह नेता जी…। हाल यह है कि पांच साल के बाद नेताजी को समझ में आता है कि वह जिस पार्टी में थे,वहां दलितों,पिछड़ों और किसानों के साथ न्याय नहीं हो रहा है, उस पर घमंड का आलम यह है कि नेताजी को यही लगता है कि वह जिसके साथ रहते हैं उसकी सरकार बन जाती है. परंतु जब उनकी ही सांसद बेटी संघमित्रा मौर्या ठीक उसी समय जब उनके पिताजी पाल बदल रहे हों, यह कहने लगे कि मैं बदायूं(जहां से लोकसभा सांसद है) और भाजपा छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकती हूं.

मेरी विचारधारा भाजपा के साथ है तो समझा जा सकता है कि राजनीति और नेताओं का स्तर कितना गिर गया है. होना तो यह चाहिए था कि यदि नेताजी स्वामी प्रसाद मौर्या को भगवा पार्टी में इतनी खामियां नजर आ रही थीं तो वह अपनी बेटी से भी कह सकते थे कि वह भी लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर पार्टी से बाहर आ जाए,लेकिन ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि नेताजी दोनों हाथ में लड्डू रखना चाहते हैं. कुल मिलाकर स्वामी प्रसाद मौर्या का भाजपा के खिलाफ दिया गया हालिया बयान कमोबेश पांच वर्षो तक तंदूरी चिकन और बिरयानी गटक लेने के बाद जीव हत्या को पाप बताकर प्लेट सरकाने जैसा ही है.

खैर,यह सिक्के का एक पहलू है, दरअसल दलबदल के हमाम में सभी राजनैतिक दल ‘नंगे’ नजर आते हैं. इसी लिए तो दलबदल रोकने के लिए बनाए गए तमाम कानूनों में हमारे नेता छेद पर छेद करने से बाज नहीं आते हैं. जिस भी पार्टी को लगता है कि कोई नेता उसके लिए वोट बटोरू साबित हो सकता है तो वह बिना उसकी विश्वसनीयता जाचें और उसके सियासी अतीत को अनदेखा करके अपनी पार्टी में शामिल कर लेता है,ऐसे नेता उस दल का तो नुकसान करते हैं जिसने उस पर विश्वास किया था,लेकिन इनकी मौकापरस्ती, इनको खूब फलने-फूलने का मौका देती है. आज जो नजारा यूपी में देखने को मिल रहा है,वैसाही नजारा कुछ समय पूर्व बिहार में भी देखने को मिला था,कुछ नेताओं को जैसे ही लगने लगा कि नीतीश कुमार सरकार की वापसी नहीं होगी और राजद की स्थिति मजबूत है, तो सत्ता दल के कई नेता टूट कर राजद में जा मिले थे।

ऐसी ही भगदड़ बंगाल विधानसभा चुनाव में भी देखी गई। तब भाजपा की स्थिति मजबूत नजर आ रही थी, इसलिए तृणमूल के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया था। जब नतीजे कयासों के विपरीत आए तो यही नेता तमाम बहाने बनाकर तृणमूल कांग्रेस में वापस आने लगे।यही स्थिति अब उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी में शामिल होने वाले नेता जैसे कतार लगा कर खड़े हो गए हैं.

बहरहाल, आज भारतीय जनता पार्टी को झटका देने वाले स्वामी प्रसाद मौर्या और कांग्रेस का दामन छोड़कर सपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले इमरान मसूद की हो रही है तो बीते कल इस जगह पर कोई और खड़ा था और आने वाले कल में यहां कोई और खड़ा नजर आएगा. यह काफी लम्बा सिलसिला है,जो कभी थमने का नाम लेगा,फिलहाल तो ऐसी उम्मीद किसी को नहीं है. कमोवेश ऐसे दलबदलू नेता पूरे देश मेें मिल जाते हैं. नेता तो नेता कभी-कभी तो पूरी की पूरी पार्टी ही चोला बदल लेती है. महाराष्ट्र में शिवसेना इसका सबसे बड़ा और ताजा उदाहरण है, जो विधान सभा का चुनाव तो भाजपा के साथ गठबंधन करके कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ लड़ी थी,लेकिन जब बीजेपी ने  शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया तो ठाकरे ने सत्ता की खातिर अपने विरोधी दल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ मिलकर ही सरकार बना ली और वोटर ठगा सा देखता रह गया. ऐसा ही कारनामा बिहार में नीतिश कुमार भी कर चुके हैं तो एक समय में यूपी में भाजपा-बसपा के गठबंधन वाली सरकार भी इसकी बड़ी मिसाल बन चुकी है.केन्द्र में भी कई बार इसकी बानगी देखने को मिल चुकी है.

मुद्दे पर आते हुए यदि बात चुनाव के समय या चुनाव की घोषणा होते ही राजनेताओं के दल बदल की गहमागहमी की कि जाय तो यह मंजर(नेताओं का चुनाव के समय पाला बदलना) पिछले करीब दो दशक से कुछ अधिक देखने को मिल रहा है। कुछ दलों और नेताओं की यह तो यह फितरत ही बन गई है कि किसी भी चुनाव में जिस राजनीतिक दल का पलड़ा उन्हें भारी दिखता है, उसमें इन नेताओं के घुसने की होड़ सी लग जाती है.पिछले दो लोकसभा चुनावों में भी यही हुआ था, जब आम चुनाव में मौकापरस्त नेताओं को भाजपा का पलड़ा भारी दिखने लगा और कांग्रेस की नैया डूबती जान पड़ने लगी तो कांग्रेस से पलायन कर नेताओं में भाजपा से जुड़ने की होड़ लग गई थी। उसके बाद के तमाम विधानसभा चुनावों में भी ऐसा ही पाला बदल देखा गया.

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इस बार मुकाबला कांटे का नजर आ रहा है,कभी भाजपा का तो कभी समाजवादी पार्टी का पलड़ा भारी लगता है. कहीं समाजवादी पार्टी की चुनावी रैलियों में जुटती भीड़ के सहारे कयास लगाए जाते हैं कि समाजवादी पार्टी की स्थिति मजबूत है तो कहीं बीजेपी का हिन्दुत्व भारी नजर आता है. किसकी सरकार बनेगी इसको लेकर कोई विश्वासपूर्वक कुछ नहीं कह सकता है. ऐसे में कुछ नेता सपा, कांग्रेस और बसपा छोड़कर भाजपा में तो कुछ भाजपाई, बसपाई और कांग्रेस के असंतुष्ट नेता सपा से हाथ मिलाते देखे जा रहे हैं। भाजपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और कांग्रेस के इमरान मसूद के सपा में जा मिलने से प्रदेश के चुनावी गणित में बड़ा उलट-फेर होने की संभावना जताई जा रही है। इनसे पहले ओमप्रकाश राजभर आदि कई नेता, जो पहले भाजपा के साथ थे, अब सपा से जा मिले हैं। अखिलेश ने चाचा शिवपाल यादव को भी अपने साथ मिला लिया है.

लब्बोलुआब यह है कि किसी भी चुनाव के वक्त नेताओं के पालाबदल से स्पष्ट हो गया है कि राजनीति में सिद्धांतों और विचारधारा का कोई मतलब नहीं रह गया है। नेता साम-दान-दंड-भेद किसी भी तरह इस या उस दल से सत्ता में बने रहना चाहते हैं तो सत्ता के लिए राजनैतिक दल भी इनका सहारा लेने या टिकट देने से परहेज नहीं करते हैं. इससे कुछ राजनीतिक दलों को सत्ता भले हासिल हो जाए,लेकिन लम्बे समय में वैचारिक रूप से पार्टी को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है. दलबदलुओं को महत्व देने से पार्टी के कर्मठ और प्रतिबद्ध नेताओं का मनोबल गिरता है जो लम्बे समय तक पार्टी के प्रति वफादार रहते है. इसमें कोई बुराई नहीं है कि राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए ही संघर्ष करते और उनके द्वारा अपने-अपने तरीके से चुनावी समीकरण साधने का प्रयास भी किया जाता है।

मगर ऐसा करते समय किसी दल या नेता को यह नहीं भूलना चाहिए कि अंत में उसे जनता का ही विश्वास जीतना होता है. इस तरह कुछ नेताओं के दलबदल या किसी पार्टी के विपरीत विचारधारा वाली पार्टी के साथ गठजोड़ से मतदाता काफी आहत होता हैं। मतदाता जिन मुद्दों और परेशानियों के मद्देनजर मतदान करता है,वह गौड़ हो जाते है। ऐसे में कोई मतदाता जिस पार्टी को नकारने का मन बनाता है, अगर उसी दल के नेता जीतने वाली पार्टी में आकर चुनाव जीत जाता है, तो यह एक तरह से मतदाता के साथ धोखाधड़ी ही कही जाएगी। फिर दूसरे दलों से आए नेताओं को तरजीह देकर चुनाव जीतने का गणित हल करने वाली पार्टियां आखिरकार अपने सैकड़ों कर्मठ और प्रतिबद्ध नेताओं की मेहनत पर भी पानी फेर देती हैं, जिन्होंने वर्षों उसका जनाधार बनाने के लिए संघर्ष किया होता है? इसे किसी भी रूप में लोकतांत्रिक तरीका नहीं कहा जा सकता

राजनैतिक दलों इसमें भी खासकर राष्ट्रीय दलों को यह बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती. यह संभव है कि चुनावी राजनीति के गणित में पार्टी जनादेश खो बैठे लेकिन विचारधारा और समर्पित कार्यकर्ता के अभाव में संगठन अपना जनाधार खो सकती है.हाल के दिनों में यह भी देखा गया है कि दूसरे दलों से आए नेता भाजपा में आने के बाद मुसलमानों के खिलाफ अनाप शनाप बयान देते है. ऐसा वो हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित करने के लिए करते हैं .ऐसा करके वो हिंदुत्व की विचारधारा को नकारात्मक बनाने का ही काम कर रहे होते हैं. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि समय के साथ यदि किसी नेता या दल का  परिवर्तन होता भी ही है तो ऐसा होना चाहिए जैसे आदिकाल में रत्नाकर डाकू का हुआ था. वाल्मीकि जीवन गाथा के अनुसार वाल्मिकी जी ऋषि मुनि बनने से पूर्व एक कुख्यात डाकू थे. तपस्या के फलस्वरूप ही वह वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामायण जैसे महान ग्रंथ की महान रचना की थी.

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