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भारत के साथ आजाद हुए ये देश, लेकिन इन मामलों में………

दया शंकर चौधरी

आजादी के बाद भारत की 75 साल की विकास यात्रा ऐतिहासिक रही है। भारत के साथ या फिर कुछ समय आगे अथवा पीछे स्वतंत्रता पाने वाले छह देशों में से ज्यादातर इस वक्त राजनीतिक अथवा मानवाधिकार संकट झेल रहे हैं। जबकि भारत वैश्विक राजनीति में एक अहम स्थान बना चुका है। विविध संस्कृति व भाषाओं वाले हिन्दुस्तान को पूरी दुनिया सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जानती है, जिसके न सिर्फ अपने पड़ोसियों बल्कि दुनिया के हर छोटे-बड़े देश के साथ बेहतर संबंध हैं।

अगर हम केवल जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय जैसे मानकों पर बात करेंगे तो भारत, चीन व दक्षिण कोरिया जैसे देशों से पीछे नजर आएगा लेकिन अगर आप इसमें समग्र विकास, स्वतंत्रता और पारदर्शिता के पैमानों पर देखें तो भारत इन मुल्कों के मुकाबले कहीं कम नहीं है।

  • पाकिस्तान (14 अगस्त 1947)

वैश्विक, राजनीतिक और आर्थिक संकेतकों के मुताबिक पाकिस्तान एक नाकाम मुल्क: लोकतंत्र महज एक छलावा

भारत से टूटकर नया देश बना पाकिस्तान भी आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है, लेकिन इस इस्लामिक गणतंत्र का इतिहास राजनेताओं और सेना प्रमुखों के बीच होते रहे तख्तापलटों में ही झूलता रहा है, जबकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में हर पांच साल में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव के जरिए सरकारें बनीं। मानवाधिकार, प्रेस स्वतंत्रता, शिक्षा, स्वास्थ्य, बोलने की स्वतंत्रता को लेकर भारत की स्थिति पाकिस्तान की तुलना में कहीं बेहतर है। कारोबार करने के लिए दुनिया के मुल्क पाकिस्तान से ज्यादा भरोसा भारत पर जताते हैं। ईज ऑफ डुइंड बिजनेस इंडेक्स में जहां भारत की रैंक 63 है वहीं पाकिस्तान 108वें स्थान पर है जो कि खराब स्थिति को दर्शाता है।

भारतीयों की औसत उम्र भी पाकिस्तानियों से करीब दो साल ज्यादा है। आतंक को पनाह देने वाला पाकिस्तान आतंकवादियों को वित्तीय सहायता देने की वजह से फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ग्रे सूची में बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, पाकिस्तान की 70 से 90 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। पाकिस्तान एक राष्ट्र के तौर पर विफल हो गया है, क्योंकि सभी वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक संकेतक लगातार पाकिस्तान में खराब सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को दर्शाते हैं। मुश्किल से 8 अरब अमेरिकी डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार और 50 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार घाटे के साथ पाकिस्तान आर्थिक संकट के कगार पर है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महंगाई दर 18 फीसदी, निर्यात 32 अरब डॉलर और और पाकिस्तानी रुपया 245 डॉलर के करीब पहुंच गया है। सफल और असफल मुल्कों के बीच की पतली रेखा तब पार हो जाती है, जब सत्ता पर काबिज अभिजात्य वर्ग देश के सामने आने वाले संकट को नकारता है और उसकी अवहेलना करता है। पाकिस्तान लगभग 22 करोड़ लोगों का मुल्क है, एक परमाणु संपन्न देश है और भू-रणनीतिक शक्ति रखता है, लेकिन अब जो आर्थिक रूप से कमजोर और राजनीतिक रूप से अस्थिर राज्य में परिवर्तित हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कार्य नैतिकता के क्षरण, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, कुशासन और कानून के शासन की अनुपस्थिति ने आर्थिक स्थिति को और खराब करने में योगदान दिया।

सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, शासन और राजनीति को पटरी से उतारने के लिए कुलीन वर्ग को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? क्या सामाजिक पतन के लिए जनता समान रूप से दोषी नहीं है?

आज, पाकिस्तान के बाद स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले कई विकासशील देश अर्थव्यवस्था, शासन, राजनीति और कानून के शासन के मामले में बेहतर हैं। यहां तक कि मलेशिया और सिंगापुर जैसे देश, जो पिछड़े और गरीब थे, अब बेहतर स्थिति में हैं। बांग्लादेश अब अपने आर्थिक प्रदर्शन के कारण पाकिस्तान से काफी बेहतर है। दुर्भाग्य से पाकिस्तान के लिए, ऐसा लगता है कि अंधी सुरंग के अंत तक कोई रोशनी नहीं दिखती है, क्योंकि कुलीन वर्ग वास्तविक मुद्दों के प्रति उदासीन रहता है, जबकि जनता में भ्रष्ट अभिजात वर्ग के खिलाफ रैली करने के लिए जागरूकता और क्षमता दोनों की कमी होती है।

लगभग दस मिलियन विदेशी पाकिस्तानी पाकिस्तान को सालाना 30 बिलियन डॉलर से अधिक भेजते हैं। वे अभिजात्य वर्ग के गैर-जिम्मेदार और अविवेकपूर्ण रवैये से निराश हो रहे हैं, जिन्होंने उन्हें हल्के में लिया है और पाकिस्तान के वर्तमान और भविष्य को बचाने के लिए अपने लाभों, विशेषाधिकारों और लाभों का त्याग करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान का कुलीन वर्ग अपने देश की बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर कुलीन और लोकप्रिय धारणाएं यानी अर्थशास्त्र, राजनीति और शासन एक दूसरे के विरोधाभासी हैं। ईंधन, गैस और बिजली सहित आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि 98 प्रतिशत लोगों को प्रभावित कर रही है।

केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग, जो कि आबादी का एक छोटा हिस्सा है, खतरनाक संभावित स्थिति के बारे में कम से कम चिंतित है। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) सौदे के अनुसार उपयोगिताओं की कीमतों में वृद्धि करने का दावा किया है। हालाँकि, यह एक आर्थिक चूक और पेट्रोलियम उत्पादों, बिजली, गैस और खाद्य पदार्थों की भारी कमी पर चिंता बढ़ा रहा है। पाकिस्तान के वित्तीय संस्थानों को नियंत्रित करने वाले कुलीन मूल्य वृद्धि के परिणामों को भुनाने में असमर्थ हैं और इसके बजाय गरीबों को राहत देने के लिए सतही उपाय करते हैं।

इसके अलावा, पाकिस्तानी अभिजात वर्ग ने विदेशों में अपने सुरक्षित ठिकाने स्थापित कर लिए हैं और देश के आर्थिक पतन के बारे में कम से कम चिंतित हैं। यहां यह ध्यान देने की जरूरत है कि देश को आर्थिक पतन और बाद में चूक की ओर ले जाने वाले कुलीन वर्ग के खिलाफ एक दृढ़ स्थिति लेने के लिए जनता की विफलता पर विचार करना चाहिए।

  • श्रीलंका (4 फरवरी, 1948)

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पतन का शिकार एक विफल मुल्क

बहुसंख्यक बौद्ध धर्मावलंवियों वाले इस देश में बौद्ध धर्म का प्रसार तीसरी सदी में तब हुआ जब भारत के मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र ने यहां आगमन किया था। करीब डेढ़ सौ साल लंबे अंग्रेजी शासन से इस देश को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 4 फरवरी, 1948 को पूर्ण स्वतंत्रता मिली। यूएन के मुताबिक, राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता पर बने रहने के लिए हाल में किए गए संविधान संशोधन ने श्रीलंका में लोकतंत्र को कमजोर किया है।

इस समय देश का विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से तीन महीने के आयात का भुगतान करने के लिए पर्याप्त है। व्यापार घाटे को कम करने के लिए टूथब्रश, स्ट्रॉबेरी, सिरका, वेट वाइप्स और चीनी (शुगर) सहित विदेश से आने वाले कई सामान को प्रतिबंधित कर दिया गया है अथवा उसे कड़े लाइसेंस के तहत ला दिया है। फिच रेटिंग्स ने श्रीलंका को सीसीसी श्रेणी में रख दिया है, जो किसी देश के बेहद खराब हालात को दर्शाती है।

  • इंडोनेशिया (17 अगस्त 1945)

कट्टरता बन रही पहचान

यह दुनिया में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, जो चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में दो हजार साल तक एक हिंदू और बौद्ध देशों का समूह रहा, जिसमें हिंदू राजाओं का राज था। यहां आज भी लोगों और स्थानों के नाम अरबी एवं संस्कृत में रखे जाते हैं और पवित्र कुरान को संस्कृत भाषा में भी पढ़ाया जाता है। 17 अगस्त 1945 को इसे इटली से स्वतंत्रता मिली। 17,508 द्वीपों वाले इस देश की जनसंख्या लगभग 40 करोड़ है, जो इसे दुनिया का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश बनाता है। इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्वी एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। कट्टरता यहां की एक बड़ी समस्या है।

हाल ही में देश ने ईश निंदा के कानून का दायरा बढ़ा दिया और उसमें पांच नए प्रावधान जोड़ दिए। यहां किसी भी रूप में धर्म पर उंगली उठाना अपराध है, भले ही आप उसकी बुराइयों की ओर इशारा क्यों न कर रहे हों। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नए नौकरी कानून को लेकर बीते साल यहां हुए एक प्रदर्शन को कवर करने गए 56 पत्रकारों को पीटा गया और उन्हें हिरासत में रखा गया। ईज ऑफ डुइंग बिजनेस इंडेक्स में यह देश भारत से 10 अंक पीछे है। हालांकि अन्य कई सूचकांकों में यह भारत से आगे है।

  • म्यांमार (4 जनवरी 1948)

मानवाधिकार के हालात खराब

म्यांमार में लोकतंत्र की दोबारा स्थापना करने वाली ‘आन सांग सू’ की इन दिनों जेल में बंद हैं। पिछले दिनों एक फरवरी को म्यांमार के सेना प्रमुखों ने ‘सू की’ को पद से हटाकर सरकार का तख्तापलट कर दिया था, जिसके बाद से देश में उथलपुथल मची हुई है। देश के युवा सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं और सेना की ओर से भी लगातार प्रदर्शन को कुचला जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, देश में मानवाधिकार के हालत इतने खराब हैं कि अब तक 2.20 लाख आम लोग लापता हो चुके हैं।

दूसरी ओर, यहां का अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय कई साल से शरण के लिए भारत, बांग्लादेश व अन्य देशों में भटक रहा है। सू की पर आरोप है कि बहुसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए उन्होंने इस समुदाय की बड़ी आबादी का नरसंहार कराया। इस देश को अंग्रेजों से 4 जनवरी 1948 को आजादी मिली थी पर यहां सही मायनों में कभी लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सका। यहां के लोगों की औसत उम्र भारत से करीब तीन साल कम है और मानव विकास सूचकांक के मामले में भी यह भारत से 16 अंक पीछे है।

  • चीन (1 अक्तूबर, 1949)

बोलने की आजादी और निजता का दम घोंटा

दो ध्रुवों में बंटी दुनिया सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ध्रुवीय हो चुकी थी, जिसमें अमेरिका महाशक्ति बनकर उभरा था। चीन ने इस वैश्विक स्थिति को चुनौती दी है। पर अपनी विकास यात्रा में तेजी से आगे बढ़ने के लिए चीन ने लगभग सभी मानव सूचकांकों को एक किनारे लगा दिया है। मीडिया को स्वतंत्रता की विश्व रैंकिंग में जहां चीन 177वें पायदान पर है, वहीं, भारत को 142वीं रैंक मिली है। यानी भारत का मीडिया चीन के मुकाबले ज़्यादा स्वतंत्र है। चीन का मानवाधिकार में रिकॉर्ड बेहद खराब है, जहां नागरिकों की हर तरह के ‘डिजिटल डाटा’ के ज़रिए निगरानी की जाती है।

9:9:6 यानी सुबह 9 से रात 9 बजे तक की सप्ताह में छह दिन की नौकरी से त्रस्त हुई चीनी जनता ने ”लाइ फ्लैट” यानी कुछ नहीं करना अभियान छेड़ दिया है। लोग बड़े-बड़े पदों से इस्तीफा दे रहे हैं। कई ब्लॉगर्स कहते हैं कि चीन में कामगारों की हालत आधुनिक जमाने के गुलामों जैसी हो गई है। इस विरोध को दबाने के लिए चीनी सरकार ने ऐसी सभी प्रतीकों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिनपर ‘लाइ फ्लैट’ लिखा है। चीन में प्रेस और सोशल मीडिया पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में हैं, जिससे लोगों को बोलने की आजादी नहीं है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता वाला यह देश 1 अक्तूबर, 1949 को ब्रिटेन से आजाद हुआ था, जिसने उसे अर्धउपनिवेश बना रखा था।

  • दक्षिण कोरिया (15 अगस्त 1945)

तरक्की की नई इबारत

कोरियाई युद्ध की विभीषिका झेल चुका दक्षिण कोरिया वर्तमान में एक विकसित देश है जो 15 अगस्त 1945 को जापान से आजाद होकर तीन साल बाद इसी तारीख को गणराज्य बना था। दक्षिण कोरिया और उसके प्रतिद्वंदी उत्तरी कोरिया के बीच 1950 में कोरियाई प्रायद्वीप पर पूरा दावा करने को लेकर लंबा युद्ध चला। इसी साल गणराज्य बने भारत के कर्नल(स्वर्गीय) एजी. रंगराज ने पैराशूट फील्ड एंबुलेंस सेवा के जरिए युद्ध सैनिकों की मदद की थी। इस सेवा के लिए युद्ध के 70 साल पूरे होने पर दक्षिण कोरियाई सरकार ने उन्हें देश के सबसे बड़े युद्ध सम्मान ”वॉर हीरो” सम्मान भी दिया।

गौरतलब है कि दोनों कोरियाओं की सीमा विश्व की सबसे अधिक सैन्य जमावड़े वाली सीमा है। साथ ही आधिकारिक रूप से आज तक ये युद्ध जारी है जो इस देश की स्थिति को संवेदनशील बनाती है। हालांकि 500 विश्वविद्यालयों वाले इस देश ने शिक्षा के क्षेत्र में तरक्की की और यहां दुनियाभर से लोग पढ़ने आते हैं।

(लेखक लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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