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अविस्मरणीय पलः मन्नू भंडारी से मुलाकात

स्मृतियों के झरोखों से झाँक कर देखती हूँ तो असंख्य अनमोल स्मृतियों से अपने आप को भरापूरा महसूस करती हूँ। मुझे याद आता है वह सहज, सरल तथा सौम्य चेहरा जिनसे मेरी मुलाकात 25 मार्च 1984 में उनके निवसा स्थल 103, हौजखास, दिल्ली में हुई। अपने समय की प्रख्यात और आज भी श्रेष्ठ कहानीकार मन्नू भंडारी से मिलना मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है। इस मुलाकात का श्रेय मैं बाबा नागार्जुन को देती हूँ। बात उन दिनों की है जब कहानीकार एवं प्रकाशक अशोक अग्रवाल जी के संभावना प्रकाशन, हापुड़ में साहित्यकारों का जमावड़ा रहता था। मैंने सन् 1981 में एमए हिन्दी में किया और डाॅ. तिलक सिंह के मार्गदर्शन में पीएचडी करने का विचार बनाया। मैं सोच नहीं पा रही थी कि किस विषय पर शोध कार्य करूँ। इसी असमंजस की स्थिति में मैं अशोक अग्रवाल जी के प्रकाशन गयी जहाँ से मैं नवप्रकाशित पुस्तकें ले जाकर पढ़ती थी। वहीं साहित्य की महान विभूति नागार्जुन जी से मुलाकात हुई। इस प्रकाशन से नागार्जुन, त्रिलोचन, प्रभात जोशी, पंकज बिष्ट तथा न जाने कितने साहित्यकारों की रचनायें प्रकाशित हुईं।
सन् 1982 की बात है कि जब मैं अशोक अग्रवाल जी के सम्भावना प्रकाशन में असमंजस तथा द्वन्द्व की स्थिति में बैठी थी। मैं उषा प्रियंवदा पर शोध कार्य करने के बारे में सोच रही थी तभी अशोक अग्रवाल जी ने बाबा नागार्जुन जी से मेरा परिचय कराया। जब मैंने उन्हें पहली बार देखा तो उनका बिम्ब मेरे मन में अंकित हो गया और 36 वर्षों पहले साधारण सी वेशभूषा, बिखरे बाल, चेहरे पर दाढ़ी, पर चेहरे पर झलकता निश्छल हास और ममत्व का भाव आज भी विस्मृत नहीं कर पायी हूँ। उनके मुख से अनायास ही निकला ‘तुम मन्नू भंडारी पर शोध कार्य क्यों नहीं करती?’ तुमने उनका ‘आपका बंटी’ उपन्यास पढ़ा है? मैंने प्रत्युत्तर में कहा कि मैंने पढ़ा नहीं है आकाशवाणी दिल्ली से नाटक के रूप में कई बार सुना है जो मुझे बहुत प्रिय है। बस उसी दिन मन में ठान लिया मन्नू जी पर शोध कार्य करूँगी। इस तरह बाबा नागार्जुन ही मन्नू भंडारी जी से मुलाकात के माध्यम बने। कहते हैं न किसी भी सुकार्य के पीछे किसी न किसी की प्रेरणा होती है। आज जब कक्षा में नागार्जुन की कविता पढ़ाती हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं मेरे आस पास उपस्थित हैं।
कथाकार अशोक अग्रवाल जिनका स्नेह मुझ पर सदैव रहा कभी लक्ष्मीधर मालवीय की ‘रेत की घड़ी’, त्रिलोचन जी की ‘ताप के ताये हुए दिन’, नागार्जुन की ‘एक विप्लव देखा मैंने’, उदय प्रकाश ‘सुनो कारीगर’ कमलादत्त की ‘सलीब पर टँगी मछली’, शेखर जोशी की ‘साथ के लोग’, मृदुला गर्ग का ‘चितकोबरा’ फ्रांस की लेखिका ‘तरूदत्त की डायरी’ (जिसकी मृत्यु मात्र बीस वर्ष की उम्र में हो गयी थी), जापानी कवि केन्जी मीयाजावा की कविताएँ आदि अनेक पुस्तकें प्रदान कर मुझमें साहित्य पढ़ने एवं लिखने की समझ पैदा की। आज उस पुरानी डायरी के पन्नों को खोलती हूँ तो केन्जी मीयाजावा की वे पंक्तियाँ मेरा ध्यान आकृष्ट कर लेती हैं। जिसने अपने अल्प जीवन में साहित्य को बहुत कुछ दिया और ‘अंतिम विदा’ कविता के माध्यम से कुछ यूँ लिखा-

बीमारी के कारण

अब शीघ्र ही बुझने वाला है

मेरी जिन्दगी का चिराग

अगली फसल के नाम

अपनी कुर्बानी से मुझे खुशी होगी।

स्मृतियों के वातायन से अनजाने ही ऐसे ही आत्मीयजन एवं अनमोल क्षण याद आते हैं जैसे कोई फ्लैश बैक फिल्म के दृश्य। मन्नू भंडारी जी को स्मरण करते हुए अपने गुरूजी डाॅ. तिलक सिंह से जुड़े क्लास रूम के वे लम्हें याद आ गये। शोध प्रविधि को पढ़ाते हुए पीएचडी करने के लिए प्रेरित करना और उनके मार्गदर्शन में शोध कार्य करना, विवाहोपरान्त शोध कार्य में शिथिलता करने पर डाँटना तथा पिता की तरह शुभचिन्तक बनकर सलाह देना, ऐसी धरोहरें हैं, जो किसी- किसी शिष्य को प्राप्त हो पाती है शायद। आज भी आशीष देते हुए कहते हैं ‘तुम मेरी सबसे नम्बर वन की शिष्य हो।’ मेरा मन अभिभूत हो उठता है।
मन्नू भंडारी जी की कहानियाँ एवं उपन्यास पढ़ते-पढ़ते मैं उनके उस रचना संसार में पहुँच गयी जिन क्षणों में उन्होंने जो महसूस किया होगा और बड़ी सच्चाई से कागजों पर उड़ेल दिया होगा। कहानियों को पढ़ते हुए अनेक प्रश्न उत्तर पाने के लिए मुझे व्याकुल करने लगे। मैंने मन्नू जी को पत्र लिखा- ‘मैं आपसे साक्षात्कार करना चाहती हूँ। ‘एक इंच मुस्कान’ सहयोगी उपन्यास है इसलिए राजेन्द्र यादव जी से भी मिलना चाहती हूँ। मेरे दिनांक 11.02.1984 के पत्र का जवाब दिनांक 28.02.1984 को लिखा और 20 मार्च 84 के बाद मिलने का समय दिया। एक अच्छी शिक्षिका एवं लेखिका होने के नाते पत्र में लिखा- ‘देखो प्रश्नावली के लिखित उत्तरों के चक्कर में रहोगी तो बात न जाने कब के लिए टल जायेगी। ज्यादा अच्छा यही हो कि अपने प्रश्न तैयार कर लाना। मिलेंगे तो बैठकर उन पर विस्तार से बातें कर लेंगे।’ (पत्र का अंश)
वह दिन भी आ गया जब मैं मन्नू भंडारी जी से मिली। जब मैं और मेरे पति उनके निवास स्थल पर पहुँचे तो नयी कहानी के प्रवर्तक तथा ‘हंस’ के सम्पादक राजेन्द्र यादव जी से सर्वप्रथम भेंट हुई। मन्नू जी घर पर नहीं थी वे मिरांडा हाउस काॅलिज से पढ़ाकर नहीं लौटी थीं। उनका घर अत्यंत सुव्यवस्थित था और सजावट भी सुरूचिपूर्ण। मैं अपनी प्रश्नावली और टेप रिकार्डर लिए उनकी प्रतीक्षा करती रही। थोड़ी देर बाद शीतल पवन के झोंके सी मन्नू जी उपस्थित हुई और सौम्य मुस्कान के साथ बोली- ‘कोई असुविधा तो नहीं हुई।’ चाय नाश्ता कराने के उपरान्त बड़ी आत्मीयता से मेरे पास बैठीं। मेरे हर प्रश्न का उत्तर उन्होंने बड़ी बेबाकी से दिया। मैं सोच रही थी कि एक महिला के अन्दर इतने सारे व्यक्तित्व कैसे समाये हैं? सुगृहिणी, शिक्षिका तथा कथाकार…..पत्नी तथा माँ। फिर भी कोई घालमेल नहीं। बिल्कुल एकाग्र चित्त होकर हर प्रश्न का तार्किक ढंग से उत्तर। इसी बीच उनकी बेटी टिंकू से मुलाकात हुई। पुत्री को लेकर वैसी ही चिंता जैसे एक माँ में होती है। मैंने पूछ ही लिया ‘त्रिशुंक’ कहानी की तनु आपकी टिंकू ही तो नहीं है।
मन्नू जी ने बड़ी सरलता से कहा यह कहानी मैंने अपने और टिंकू के द्वन्द्व को लेकर ही लिखी है। पुरानी पीढ़ी और नयी पीढ़ी का मूल्य संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता चाहे हम कितने आधुनिक हो जायें। मन्नू जी से की गयी बातचीत टेपरिकार्डर में कैद करके घर चली आयी। ‘एक इंच मुस्कान’ उपन्यास के बारे में मैंने पत्र लिखकर कुछ प्रश्न किए। उस पत्र का जवाब आक्रोश भरा था। आत्मकथा को पढ़ा तो मुझे लिखे गये उस आक्रोश भरे पत्र का उत्तर भी मिल गया। वह पत्र जिसमें मैंने अत्यंत व्यक्तिगत प्रश्न पूछ लिया था- ‘एक इंच मुस्कान’ उपन्यास आपके स्वयं के जीवन पर लिखा गया उपन्यास तो नहीं। इसके नायक और नायिका लेखक और लेखिका हैं और ‘अमला जैसी प्रशंसिकाएं आपके दाम्पत्य जीवन में कटुता का कारण तो नहीं बनी। मन्नू भंडारी जी का आक्रोश एवं दुख से भरा पत्र आया कि ‘तुम्हारे प्रश्न ने मुझे कई दिन तक सोने नहीं दिया। तुम्हें ऐसे प्रश्न नहीं करने चाहिए थे।’ आज सोचती हूँ तो मुझे यह अपना बचपन लगता है। मुझे किसी की भी भावनाओं को चोट पहुँचाने का कोई हक नहीं है।
मन्नू जी अत्यन्त भावुक, संवेदनशील, उदारमना, निश्छल तथा स्पष्टवादी महिला हैं इसलिए किसी भी प्रकार का दोहरा व्यवहार और छलावा उन्हें आहत करता है। मन्नू जी के रचे उपन्यासों में ‘आपका बंटी’ के अजय, शकुन, बंटी, ‘स्वामी’ के मिली, अमर, घनश्याम, ‘‘एक इंच मुस्कान’ के अमला, अमर, रंजना, ‘महाभोज’ के बिसू, बिन्दा, दा साहब, सुकुल बाबू, सम्पादक दत्ता बाबू, एसपी सक्सेना, डीआईजी सिन्हा जैसे किरदार आज भी हमारे आस-पास घूमते प्रतीत होते हैं। ‘मजबूरी’ की अम्माँ, ‘अकेली’ की बुआ, ‘कील और कसक’ की रानी, ‘क्षय’ की कुंती, ‘बंद दराजों का साथ’ की मंजरी, ‘दरार भरने की दरार’ की श्रुति, ‘सजा’ के दिनेश और ‘शायद’ का राखाल तथा नई नौकरी की ‘रमा’ ऐसे जीवंत पात्र हैं जो हमें हर पल झकझोरते हैं। ‘यही सच है’ कहानी पर बनी फिल्म ‘रजनीगंधा’ तथा स्वामी उपन्यास पर बनी फिल्मों को आज भी कोई भूल नहीं पाया। टीवी पर धारावाहिक रजनी की पटकथा लिखने वाली मन्नू भंडारी ही थी।
मन्नू जी का कथा साहित्य कल्पना के पंखों की उड़ान नहीं, कठोर जीवन की पहचान है। अनुभवों की सच्चाई है। उन्होंने आधुनिक जीवन की त्रासदियों को बड़ी सहजता तथा संजीदगी से पन्नों पर उकेरा है। ‘बंद दराजों का साथ’ कहानी की यह पंक्ति वर्तमान जीवन की सच्चाई है कि ‘आज जिन्दगी का हर पहलू, हर स्थिति और हर सम्बंध एक समाधान हीन समस्या होकर ही आती है जिसे सुलझाया नहीं जा सकता, केवल भोगा ही जा सकता है। मन्नू भंडारी ने भी अपने जीवन में बहुत कुछ जिया है भोगा है। आज वे अस्वस्थ है। फोन पर बात हुई तो उनके सिर में बहुत पीड़ा है। वे बहुत कुछ लिखना चाहती है परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण अब असमर्थ हैं। उन्होंने साहित्य जगत को जो कुछ दिया है वह अविस्मरणीय है। ऐसी महान विभूति के साथ बिताये इन अनमोल क्षणों को इन पन्नों पर उतारने का प्रयास किया है यह तो पाठकगण ही बतायेंगे कि मैं कितनी सफल रही।
    डाॅ. बीना रानी गुप्ता

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