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चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे से…अतिशय क्रोध!

मैं आज जब प्रपंच चबूतरे पर पहुंचा तो चतुरी चाचा कोरोना के बढ़ते संक्रमण पर चिंता जाहिर कर रहे थे। वह मॉस्क न लगाने वालों, दो गज की दूरी न रखने वालों और सरकार के नियमों की अनदेखी करने वालों की खिंचाई कर रहे थे। चबूतरे पर मुंशीजी, बड़के दद्दा व ककुवा बैठे चतुरी चाचा की हां में हां मिला रहे थे। आज कासिम चचा गैरहाजिर थे। मेरे बैठते ही चंदू बिटिया सबके लिए गुनगुना नींबू पानी और काढ़ा लेकर हाजिर हो गई। काढ़ा के साथ बतकही आगे बढ़ी।
हमने मुंशीजी से कासिम चचा की अनुपस्थिति के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि कासिम मास्टर के छोटे साले ने कीटनाशक पीकर जान दे दी है। कल देर शाम पति-पत्नी में झगड़ा हुआ था। मास्टर के साले ने गुस्से में आकर कीटनाशक पी लिया। सब उसे तुरन्त अस्पताल ले गए। परन्तु, वहां डॉक्टरों ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया। साले की आकस्मिक मौत की ख़बर पाते ही मास्टर ससुराल रवाना हो गए थे।

फिर चतुरी चाचा बोले-अतिशय क्रोध बड़ा खराब होता है। आजकल युवाओं में गुस्सा भरा पड़ा है। इस पीढ़ी के लोग जरा सी बात में होश खो देते हैं। उनका बात-बात में टेम्पर लूज हो जाता है। वे गुस्से में आकर कभी अपने घर में तो कभी बाहर बहस और झगड़ा करते हैं। चतुरी चाचा ने आगे कहा, अतिशय क्रोध में ही कोई सामने वाले की हत्या कर देता है। कोई अपनी ही जान से खेल जाता है। कोई बहुमूल्य रिश्ता खत्म कर देता है। कोई अपनी या दूसरे की कीमती वस्तु नष्ट कर देता है। कुलमिलाकर क्रोध से सिर्फ़ और सिर्फ बर्बादी होती है। जब क्रोध का ज्वर उतरता है। तब पता चलता है कि पीछे क्या हो गया। उसे पता ही नहीं होता कि वह गुस्से में क्या कर रहा है।उसका खुद पर से कण्ट्रोल खत्म हो जाता है।दरअसल, अत्याधिक क्रोध प्राणी का बुद्धि-विवेक खत्म कर देता है।

बड़के दद्दा बोले, आज की युवा पीढ़ी का बात-बेबात पर पारा चढ़ जाता है। वह अपनी कल्पना की उड़ान पर रहता है। अधिकतर युवा जिद्दी स्वभाव का होता जा रहा है। वह अपनी कल्पनाजनित बातों पर जिद कर बैठता है। फिर वह किसी की कोई बात नहीं सुनता है। वह कितना भी गलत हो, लेकिन अपने को ही सही-सच्चा साबित करने की कोशिश करता है। जब यह कोशिश नाकाम दिखाई पड़ती है। तब वह कुंठित होकर गुस्से से पागल हो जाता है। इसमें पीढ़ी का अंतर भी अपना काम करता है। इससे उनका और उनके आसपास के लोगों का बड़ा नुकसान होता है।

हमने कहा- इस क्रोध के पीछे सम्भवतः कोई न कोई कुंठा और असुरक्षा होती है। वैसे क्रोध पर विजय पाना असम्भव भी नहीं है। हाँ, इस पर विजय पाना थोड़ा मुश्किल होता है। व्यक्ति को अपने अतिशय क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण पाने का प्रयास करना चाहिए। जब कभी अचानक पारा चढ़ जाए। तब उस व्यक्ति को किसी से बात-बहस नहीं करनी चाहिए। इससे चीजें बिगड़ जाती हैं। व्यक्ति का रिश्ता और छवि दोनों खराब होती हैं। उस वक्त व्यक्ति अपने हाथ, पैर व मुंह को अच्छे से धो ले।फिर बैठकर एक गिलास ठंडा पानी पी ले। पानी का एक घूंट मुंह में भरकर पांच मिनट एकांत में शांत बैठा रहे। फिर थोड़ा इधर-उधर टहले। इससे उसका पारा उतर जाएगा। उसकी बुद्धि-विवेक स्वत: ही कार्य करने लगेगी।

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बड़ी देर से खामोश बैठे ककुवा बोले-पतरकार, तुम तौ लोगन का योगु करावत हौ। यूह उपाय बताव कि कउनु योगु कीन जाय, जिहते गुस्सा कम होय जाय। तुम पंच लरिका बिटियन केरि गुस्सा बताय रहेव। गुस्सा तौ हम बुढ़वन केरे बहुतय आवत हय। हमरे खुदय बात-बात परहिंया झुल्लाहट आय जात हय। हमहूँ उल्टा-सीधा बोलय देइत हय। हम बादिमा पछतावा करित हय। जरा-जरा सी बातन पर गुस्सा करब बड़ा खराबु हय।

हमने कहा-ककुवा, रोज सबेरे टहलने या व्यायाम करने के बाद प्राणायाम किया करिए। इससे बड़ा लाभ होगा। पहले ऊँ शब्द का पांच-सात बार सस्वर उच्चारण किया करो। फिर कपालभाति, अनुलोमविलोम, भ्रामरी, सिंहासन, हस्यासन, तालीवादन और शांति पाठ किया करो। इससे आपका पारा बात-बात पर नहीं चढ़ेगा। इसी के साथ आज की बतकही सम्पन्न हो गई। मैं अगले रविवार को चतुरी चाचा के प्रपंच चबूतरे पर होने वाली पंचायत के साथ हाजिर रहूँगा। तब तक के लिए पँचव राम-राम!

नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान
नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान
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