आइए मिट्टी के दीए जला कर दीपोत्सव मनाए

भारतीय संस्कृति में दीपावली का त्यौहार सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार माना जाता है। इसको दीपोत्सव व प्रकाश पर्व भी कहा जाता है। हर भारतवासी के लिए दीपावली का त्यौहार एक नई उमंग ओर उत्साह लेकर आता है। इस पर्व का एक विशेष जुड़ाव मिट्टी का भी है। मानव मात्र को धरती मां की सौंधी महक देने वाली मिट्टी के बने दीयों से जग रोशन होगा। आओ हम सब भारतवासी इस बार हमारी प्राचीन परंपरा के अनुरूप भारत की सौंधी मिट्टी से बने कलात्मक रंग बिरंगे दीपकों से दीपोउत्सव मनाए। तभी सही माएने में दीपोत्सव की सार्थकता होगी।

कोरोना महामारी एवं चीन से चल रहे तनाव का असर मार्किट में भी देखने को मिल रहा है। इस बार चाइनीज लाइट व अन्य समान मार्किट में बहुत कम है। इस बार आमजन का मानस भी देशी रोशनी से दीवाली जगमग करने का है। फलस्वरूप इस बार कुम्भकारो के चेहरे पर खुशी और उत्साह देखने को मिल रहा है। 4-5 वर्ष से चाइनीज समान के मार्किट में आने के बाद कुम्भकारो की दीपावली एक दम फीकी जा रही थी।उनके लिए परिवार की आजीविका चलाना मुश्किल हो रहा था।चाइनीज रंग बिरंगी लाइट व दीपकों की चमक में मिट्टी के दीपक लुप्त से हो गए थे। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से पूरा देश झुझ रहा है। लेकिन इस कोरोना के कारण चाइनीज समान मार्किट में नही आ सका जहा पहले 70% चाइनीज ओर 30% स्वदेशी समान मार्किट में होता था और आज 77% समान स्वदेशी मार्किट में देखने को मिल रहा है।यही कुंभकारों के लिए खुशियों का पैगाम बन गया।

कुम्भकारो का प्राचीन कारोबार जो लुप्त से हो गया वो पुनः मार्किट की पसंद बन रहा है।

इस बार दीवाली कुंभकारों के लिए खुशियां की सौगात लेकर आई है। कुम्भकारों ने भी समय के साथ आधुनिकता की हवा और जनमानस की भावनाओं को समझा। और मिट्टी के दीपको पर अपनी कला को आधुनिक डिजाइनिंग और रंग बिरंगे रंगों में कलात्मक रूप देकर नए जोश और उत्साह से मार्केट में लेकर आए ।मिट्टी के बने इन रंग बिरंगे कलात्मक दीपकों को देख कर एक बारगी कोई नही कह सकता कि ये मिट्टी के दीपक है। इनकी डिजाइन जनमानस को काफी आकर्षित कर रही है। इससे कुंभ कारों के चेहरे पर खुशी झलक रही है। कुंभकार परिवार गत 4 वर्ष से आधुनिकता की मार झेल रहे थे लेकिन इस बार कुंभ कारों ने जनमानस को अपनी ओर काफी हद तक आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं। जनमानस का रुख अपनी प्राचीन परंपरा के अनुरूप मिट्टी से बने दीयों से दीपावली मनाने का मानस बन रहा है। यह कुंभकार वर्ग के लिए बड़े हर्ष का विषय है।

प्राचीनकाल से कुम्भकार मिट्टी को गूथ कर चाक पर चढ़ाकर दीपक और लक्ष्मी,गणेश की मूर्ति, बर्तन तैयार करते थे। और उससे ही अपने परिवार का जीवन यापन करते आ रहे हैं। कुंभकार परिवार के इस कुटीर उद्योग में पूरा परिवार मिलजुल कर कार्य करता है। जैसे ही दीपावली का समय आता है, उसके 1 माह पूर्व से पूरा परिवार एकजुट होकर दीपक, बर्तन आदि बनाने में लग जाते हैं और भारी स्टॉक जमा कर लेते हैं। ताकि दीपावली पर अधिक से अधिक बिक्री कर अधिक से अधिक आय अर्जित कर सके। इस उम्मीद के साथ और उत्साह से पूरा परिवार एकजुट होकर लगा रहता है। यह भी सच है कि कुंभकार दीपावली पर वर्ष में सबसे अधिक आय अर्जित करते थे, लेकिन कुछ वर्षों से आधुनिकता के दौर ने बाजार में रंग-बिरंगे आकर्षक डिजाइनों के चाइनीस लाइट व दीयो ने मिट्टी के दीपको को लुप्त सा कर दिया था।

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बदलते परिवेश में युवा पीढ़ी के साथ-साथ आम आदमी में भी आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा और प्राचीन मिट्टी के दीपक को भूलकर और चाइनीज रंग बिरंगी लाइट,दीयों को अपने प्रतिष्ठानों व घरों पर लगाकर अपनी शान समझते थे। कुंभकार परिवारों को आधुनिकता की ऐसी चोट पड़ी की उनके परिवार की रोजी-रोटी के लाले पड़ गए थे।

युवा कुंभकार मनीष कुमार का कहना है कि हमारे कुटीर उद्योग पर आधुनिकता की गहरी चोट लगी हमारा परिवार हर समय हर सदस्य यही पुश्तैनी कार्य करता आ रहा है। इससे अजित आय से हम सामाजिक, धार्मिक, विवाह आदि सभी कार्य खुशी से संपन्न करते थे। इसके फलस्वरूप परिवार के सदस्यों को अन्य कोई कार्य सीखने की आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई। अब हमने भी जनता के रुख को समझ कर मिट्टी के दीपक को डिजाइनों में और कलर्स में बनाकर मार्केट में लेकर आए हैं और जनता ने मिट्टी के कलात्मक दीपकों को काफी पसंद कर रहे हैं। इस बार पुनः भारतवासी अपनी प्राचीन परंपरा के अनुरूप उत्साह और उमंग से मिट्टी के दीपको से दीपावली पर प्रकाश पर्व मनाएंगे। आइए हम सब मिलकर अपनी प्राचीन परंपरा के अनुसार मिट्टी के दीयों से घर,आंगन को जगमग कर दीपोत्सव मनाए।

डॉ. शम्भू पंवार

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