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भाग्य

      प्रीति सिन्हा

कभी स्वयं से निकलकर मैंने आसमान में उड़ना चाहा था मगर, गलती से पाँव कठोर धरातल पर पड़ गए। असहनीय पीड़ा हुई। मैं सहन न कर पाई और फिर से उड़ना चाहा, किन्तु उस दिन धरा ने नम आँखों से मुझे पुकारा था……”ठहर जाओ! कुछ पल मेरे समीप भी रहो।” ठहर गई मैं। धरातल की प्रत्येक पीड़ा को मैंने सहन किया पल-पल महसूस किया और फिर उन्हें अपने मनरूपी मंजूषा में बंद करती चली गई।

सालों बाद जब मैने उस मंजूषा को खोला तो मेरी आँखें फैल गई। वह सारी पीड़ायें जीवन के छोटे-छोटे टुकड़ों में परिवर्तित हो चुकी थी। मैंने इन टुकडों को नदी का रूप देना चाहा। एक ऐसी नदी जिसमें सहस्त्र जीवन समाहित हो। किन्तु मैं सक्षम कहाँ थी………?

मदद मांगने निकली ….और इस नदी के उद्गम स्त्रोत बने मेरे अग्रज व माँ ने धारा दिया।

आज सुबह से मीटिंग चल रही थी, मगर समस्या का समाधान होने के बदले मामला उलझता जा रहा था। ब्रह्मा जी के माथे पर पसीने की बूंदें थी। भगवान विष्णु गाल पर हाथ रखे चुपचाप कुछ सोच रहे थे। चित्रगुप्त महाराज अपनी लंबी चौड़ी फाइल खोले केलकुलेटर पर कुछ हिसाब-किताब कर रहे थे, परंतु सभी के मुख पर चिंता की लकीरें थी , अचानक चित्रगुप्त महाराज बोले….”इन पृथ्वीवासियों से तो हम तंग आ गए हैं। एक तो पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार इनके भाग्य में सुख है ही नहीं, मगर इनके इस जन्म के कर्मों के अनुसार यह थोड़े बहुत सुख का भागीदार बनते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब भी हम इन्हें सुख देने की कोशिश करते हैं यह मूर्ख लेने से इनकार कर देते हैं।”

चित्रगुप्त महाराज बहुत गुस्से में थे । इधर कुबेर जी , ब्रह्मा जी पर अलग गरज रहे थे…….. “आप इस तरह मुझ से थोड़े-थोड़े पैसे मत मांगा कीजिए, आप जानते हैं, उन्हें अधिक देना नहीं है और कैश पैसे लेकर मैं घूमता नहीं हूँ। हर रोज थोड़ेप-थोड़े पैसे बैंक से निकालते-निकालते मैं परेशान हो गया हूँ।”

सभी चिंतित थे मगर समस्या का समाधान नहीं हो पाया ।

“घर में कुछ नाश्ते का सामान बचा है?” दरवाजे पर खड़े रामकृपाल बाबू ने पूछा।
“नहीं, मगर क्या बात है?” कलावती ने पूछा।
“अरे हाथ में कुछ पैसे आ गए , सोचा कि पन्द्रह दिन का राशन का सामान ले लूँ , तो मैंने रिक्शा कर लिया , बेचारा रिक्शावाला ने धूप में रिक्शा खींचा है। भूखा प्यासा होगा। “रामकृपाल ने बड़ी विनम्रता से कहा।

“अहोभाग्य पूजा करके उठी और इतना बड़ा पुण्य करने का मौका मिला । मैंने अभी नहीं खाया है , मेरा नाश्ता बचा है वही खिला देती हूँ ।” कलावती ने प्रसन्न होकर कहा ।
दोनों पति-पत्नी ने आनंद लेकर भोजन कराया । निश्चिंत थे अभी तो पन्द्रह दिन के राशन है हीं । इधर पति-पत्नी आनंद में थे

उधर ब्रह्मा जी सिर पीट रहे थे । बगल से नारद जी गुजर रहे थे , चुटकी लेते हुए पूछे……… “जगतगुरु ,जगत पिता आज किस बच्चे ने नादानी की ?”
अरे क्या कहूँ इन दोनों से मैं तंग आ गया हूँ। इनके घर में भुखमरी थी , तरस आ रहा था । फिर भी मैं असमर्थ था क्योंकि इनके अकाउंट में एक भी पैसे नहीं थे । मगर पति पत्नी के पूजा पाठ की वजह से नारायण प्रसन्न हो गए और मुझे पैसे इन्तजाम करने को कहा , मैंने कर भी दिया , मगर देखो सुख इनके नसीब में ही नहीं है। दोनों हाथ से लूटा रहे हैं। फिर दो दिन बाद कंगाल हो जाएंगे।”
ब्रह्मा जी ने गुस्से में कहा । नारद जी ने किसी प्रकार से ब्रह्मा जी को समझा बुझाकर ठंडा किया।

महेसर पूजा पर बैठा था । दिसंबर की कंपकपाती रात थी । ठंड हड्डियों को छेद रही थी । कई रातों से वह सो नही पाया था । पिता की बीमारी के लिए पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया था । उसी इंतजाम में वह कई दिनों से प्रयासरत था , आज जाकर उसकी मुराद पूरी हुई थी । प्रसन्न मन से वह भगवान के सामने ध्यान लगाए बैठा था। मगर ध्यान कहीं और चला जाता।

कराहने की आवाज…..कोई रो रहा था …..

वह और देर नहीं बैठ पाया। बाहर घुप्प अंधेरा था । एक तो शीतलहर , ऊपर से कोहरा छाया था। उसने कंधे पर शॉल डाला और टॉर्च लिए हुए सिढ़ियों से नीचे उतर गया। वह कुछ ही दूर गया था कि सामने देखा – कुत्ते का छोटा सा बच्चा नाले के पानी से भीग कर ठंढ से अकड गया था । उसी में किसी सवारी ने उसके पैर कुचल दिए थे । महेसर ने उसे गोद में उठा लिया और घर में ले आया । रात भर आग जलाकर उसके पास बैठा रहा । सुबह हुई तो बच्चे को आराम मिला और वह सो गया । महेसर ने जो पैसे पिता की बीमारी के लिए इंतजाम किए थे , उनमें से आधा बच्चे पर और आधा पिता पर खर्च कर दिए ।

“बाप तो बाप बेटा भी वैसा ही निकला । इस परिवार ने तो मुझे पागल कर दिया है । जी में आता है कि भिखारी बना कर इन्हें सड़क पर छोड़ दूँ । ये उसी के लायक हैं । “ब्रह्मा जी गुस्से से पागल हो गए थे ।
“अरे कई रातों से बेटा सो नहीं पाया था सोचा था कि पैसों का इंतजाम कर दूँ तो दो कम से कम चैन की नींद सो तो पाएगा , पिता का भी इलाज कर लेगा और महीने भर घर का खर्च भी ठीक ढंग से चल जाएगा , मगर देखो उस कुत्ते के पिल्ले के पास रात भर बैठा रहा और ऊपर से सारा पैसा भी खर्च कर दिया अब भुगतेगा महीने भर । ”
आसपास के सभी देवताओं ने उनके समर्थन में सिर हिलाया कि ब्रह्मा जी बिल्कुल सही कह रहे हैं ।
कैलाश पर्वत पर भीड़ थी ब्रह्मा , विष्णु और महेश विचार मग्न थे । बहुत देर के बाद विष्णु भगवान ने कहा ……..
“पृथ्वीवासी युग के अनुसार बदल गए हैं ,मगर हमें नहीं बदलना चाहिए । वह हमें पूजते हैं , देवता मानते हैं ।”
“आप समझ नहीं रहे हैं ।” ब्रह्मा जी ने ऊँचे स्वर में कहा ।
“यह घोर कलयुग है हमें बदलना ही होगा जिसे देखो वही लूट – खसोट रहा है । जिसके पास है वह भी और जिसके पास नहीं है वह भी । फिर भी यह कलयुगी हमारी पूजा करते ही हैं , तीर्थ करते हैं , यज्ञ करते हैं । जिसके पास जितना धन है , वह पूजा-पाठ पर उतना ही खर्च करते हैं । दुनिया वाले इसे ही व्यावहारिकता कहते हैं और हमें उन पर मेहरबान होना हीं पड़ता है । फिर यह परिवार व्यवहारिक क्यों नहीं है । यह भीड़ से अलग क्यों हैं ? इनके पास पूजा पाठ के लिए समय और धन दोनों ही कम है , लेकिन दूसरों की मदद के लिए इनके पास समय और धन दोनों ही है । पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार तो इनके भाग्य भिखारियों जैसे हैं , लेकिन इस जन्म के इनके कर्मों के बारे में चित्रगुप्त जी के फाइल में लिखा है कि इन के सभी कार्य पुण्य कर्मों के लिस्ट में आते हैं । इस कारण हमें इन पर मेहरबान होना पड़ता है ।”
ब्रह्मा जी ने फिर से जोर देते हुए कहा ……. “अरे तब का जमाना और था , अब का जमाना और है । यह बात यह समझते ही नहीं।”
रामकृपाल की पत्नी यानि कलावती रसोई घर में व्यस्त थी । उनके घर कुछ मेहमान आये थे जो , सप्ताह बीत गया था , परंतु जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे । नारद जी उधर से गुजर रहे थे , देखा- कलावती के मुख पर शिकन तक नही था । उन्होंने सोचा …….
“चलूँ जरा यह खबर ब्रह्मा जी को सुनाता आऊँ ।”
“आपने उन्हें कितने धन का प्रबंध कर दिया था ? आज एक सप्ताह से उनके घर से लगातार भोजन की खुशबू आ रही है ।”
ब्रह्मा जी चौंक उठे । “क्या कहा आपने ?” “वही जो आप सुन रहे हैं ।” नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा ।
ब्रह्मा जी उबल पड़े ।
“यह कभी अपने बारे में सोचते क्यों नहीं , आखिर चाहते क्या हैं ?”
“हे प्रभु समस्या आपने दिया है तो समाधान भी आप ही करेंगे ।”

महेसर पूजा घर में बैठा सोंच रहा था । दुखी था , मगर अथाह धैर्य के साथ । दो महीने हो गए थे महेसर को घर में बैठे । उसकी नौकरी चली गई थी । आर्थिक समस्याएं बढ़ती जा रही थी । रामकृपाल अक्सर बीमार रहते थे । परंतु जो धैर्य पुत्र के पास था वही धैर्य कलावती के पास भी था । कलावती ने जब से होश संभाला था , जीवन को उसने संघर्ष ही माना था । और उसे संघर्ष हीं मिला दूसरा कुछ नहीं । फिर भी असीम धैर्य और उत्साह के साथ जाने किस आस में जीवन जीती चली जा रही थी ।

नारद जी फिर से एक बार ब्रह्मा जी के पास बैठे थे । “सुना है वह खाने खाने को तरस रहे हैं ।” “किसकी बात कर रहे हैं नारद जी ?” “आपकी उसी विचित्र रचना के बारे में जिसके बारे में सोचकर आप का मुख मलिन है ।”
“मैं किसी के बारे में नहीं सोच रहा हूँ ।” ब्रह्मा जी ने छुपाते हुए कहा ।
नारद जी चले गए थे । ब्रह्मा जी बेचैन थे । “मुझे उनकी मदद करनी ही पड़ेगी मगर , कैसे ?”
“धन उनके छत से बरसा दूँ या फिर एक रात में उन्हें धनी बना दूँ ? किंतु यह तो चमत्कारों का नहीं , विज्ञान का युग है , लोग उन्हें जादूगर या फिर डाकू ना समझने लगे । क्या करूँ उनके भाग्य में तो धन है ही नहीं । परंतु उन्हें छोड़ भी नहीं सकता , मदद तो करनी ही पड़ेगी ।”

कलावती बुझे हुए चूल्हे के पास चुपचाप बैठी थी । रामकृपाल सो रहे थे । महेसर पैसे के इंतजाम में बाहर निकला था । तेज बारिश हो रही थी । महेसर ने एक दो जगह उधार मांगा मगर , नहीं मिला । तेज बारिश के कारण बहुत दूर नही जा सका , निराश होकर घर लौट आया । कलावती आकर महेसर के पास बैठ गई । बोली ……. “धैर्य रखो पुत्र मेरा चूल्हा जीवन में हर दिन जला है आज भी जलेगा ।”
महेसर कुछ नहीं बोला चुपचाप माँ का मुख देखता रहा । अचानक महेसर अपनी किताबों की अलमारी के पास गया और बोला…….. “माँ बेकार में ये फालतू पड़े हैं सोच रहा हूँ इन्हें बेच दूँ शायद कुछ पैसे मिल जाएं ।”
कलावती ने महेसर का हाथ पकड़ लिया । “नहीं पुत्र यह तुम्हारी अमूल्य निधि है इसे मत बेचो ।” “तब मैं क्या करूँ माँ ?”
महेसर किताबों को उलटने पलटने लगा । बेचैन था वह । अलमारी में बहुत सारे फालतू कागज पड़े थे । महेसर निकालकर उन्हे फेकने लगा । कलावती उन्हे उठाकर कुडेदान में डालने जा रही थी , तभी एक डायरी दिखाई पड़ी । कलावती उसे ध्यान से देखने लगी और अचानक आवाक रह गई । तभी महेसर पास आया ।
“क्या बात है माँ ।” वह भी ध्यान से देखने लगा “यह क्या माँ सौ रुपए का नोट यह कहाँ से आया ।”
कलावती ने आसमान की तरफ उंगली से इशारा किया । महेसर के चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ गई । “लगता है माँ , मैं ही कभी रखकर भूल गया था।

ब्रह्मा जी के मन में फिर से द्वन्द चल रहा था । “स्वयं तो खाने को नहीं है और चार-चार कुत्तों का निर्वाह किया जा रहा है और साथ ही चिड़ियों को सुबह शाम दाना खिलाया जा रहा है ।”
बगल में नारद जी खड़े मुस्कुरा रहे थे । “इंसान के लिए भगवान को कभी इतना परेशान होते नहीं देखा था ।” नारद जी ने वार किया ।
“आप ऐसा कैसे कह सकते हैं हम तो प्रारंभ से हीं इंसानों के लिए परेशान होते रहे हैं । “ब्रह्मा जी ने जवाब दिया।
“ऐसा मैं नहीं मानता अगर परेशान होते तो इस प्रकार इंसानों को कष्ट भोगते नहीं देखते ।” नारद जी ने कहा ।
“यह सब उनके पिछले जन्मों के कर्मों का भोग है ।” ब्रह्मा जी ने कहा ।
“यही तो बात है ब्रह्मा जी , मनुष्य न अपना पिछला जन्म देखता है , न अगला जन्म देखता है । इस विश्वास पर जीवन जीता है कि इस जन्म में पुण्य करूंगा तो अगला जन्म सफल होगा । आपने यह विचित्र नियम क्यों बनाएं । पिछले जन्म की सजा इस जन्म में और इस जन्म की सजा अगले जन्म में , इससे लाभ क्या है ? जब मनुष्य को न पिछला जन्म याद रहता है , न अगले जन्म के बारे में वह कुछ जानता है , फिर वह अपने आप को कैसे सुधारेगा , जबकि वह जानता ही नहीं कि उसने क्या गलत किया है ।” नारदजी ने कहा।
ब्रह्मा जी कुछ नही बोले ।
नारद जी ने फिर कहा ……..आज इस दुनिया की जो हालत है वह सिर्फ आप लोगों के बनाए नियमों के कारण ही हैं । अब इस रामकृपाल के परिवार को ही देखिए ना ईमानदारी , आदर्श और पवित्रता का प्रतीक है यह परिवार । मगर सुख के नाम पर इनके पास है क्या ? किसी तरह घिसट कर जीवन जी रहे हैं । दुख इसलिए हैं कि पिछले जन्म में इन्होंने पाप किये हैं मगर , ये बेचारे क्या जाने ये तो इसी जन्म में अपनी गलतियों को तलाश कर रहे हैं । और तलाश में हीं शायद पूरी जिंदगी निकल जाए । अब आप बताइए कोई मनुष्य इनसे कभी सीख लेना चाहेगा ? यहाँ तो मन में एक अलग ही भावना उपजेगी कि ईमानदारी और आदर्श से कुछ नहीं मिलने वाला है । इससे तो अच्छा जितना हो सके पाप करो कम से कम इस जीवन में तो सुख मिलेगा ।” कहते हुए नारद जी मुस्कुराए ।
ब्रह्मा जी चुप थे ।
आप कहते हैं कि यह कलयुग है मगर इस कलयुग को बनाने वाले तो आप ही हैं , आपके नियम कानून हैं । आज एक मनुष्य दूसरे का भला कर रहा है तो आप उस पर गुस्सा कर रहे हैं , उसे मुर्ख घोषित कर रहे हैं । यही मानसिकता आज मनुष्य की हो गई है इस प्रकार के व्यक्ति को समाज में असफल , मूर्ख , गरीब के नाम से जाना जाता है ।”
थोड़ी देर के लिए नारद जी चुप हो गए फिर बोले….. “कहते हैं कि हर मनुष्य में ईश्वर है वह आप ही के अंश हैं , फिर तो यह मनुष्य नहीं आप ही बोलते हैं । एक तरह मनुष्य को उच्च कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं दूसरी तरफ उसे धिक्कारते हैं ।”
ब्रह्मा जी ने फिर कुछ नहीं कहा , सिर्फ नारद जी के सहमति में सिर हिलाये नारद जी ने फिर कहा ……

“मैं सिर्फ यह आपके लिए नहीं कह रहा हूँ , मैं यह संदेश दे रहा हूँ उन पिताओं के लिए जो परिवार संभालते हैं , उन नेताओं के लिए जो देश चलाते हैं , उन गुरुओं के लिए जो शिष्य को आकार देते हैं , उन महापुरुषों के लिए जो संदेश छोड़ जाते हैं मगर ,उसके लिए यह नहीं बताते कि उस पर अमल करने के सही रास्ते क्या हैं ? अमल कैसे किए जाएं ? कितने समय तक किए जाएं ? जिसके कारण फिर कहीं ना कहीं गलतियां हो जाती हैं और यह पूरे समूह को इस प्रकार प्रभावित करती है कि एक युग परिवर्तन हो जाता है और यही लोग उस युग का नाम देते हैं । कभी द्वापर ,कभी त्रेता , कभी सतयुग , तो कभी कलयुग ।”

नारद जी थोडी देर के लिए चुप हो गए । अचानक उत्तेजित होते हुए बोले ………
सच पूछिए तो कभी कोई युग परिवर्तन नहीं हुआ है । हर युग में वही कहानी दोहराई गई है । अलग-अलग तरीके से । आज आप इतना परेशान है , मगर इस परेशानी का कारण आप स्वयं हैं । एक समूह को कभी दोष नहीं दिया जा सकता । दोष उस समूह को आकार देने वाले उस पिता में है , उस विधाता में है उस गुरु में है । ”
ब्रह्मा जी ने मुड़कर नारद जी की ओर देखा , वह जा चुके थे……….।

 

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