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जीवन की सार्थकता

अपने ग़म को हंसकर भुला देने का हुनर स्वयं हमारे पास ही होता है…ज़रूरत है तो बस आशावादी होकर नकारात्मकता को जड़ से मिटा डालने की। यकीन मानिए, आपकी, अपनी इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय ही एक ऐसा रामबाण है जो कभी आपको हारने और टूटने नहीं देता। परिस्थितियों पर काबू पाकर विजयी होना ही सच्ची मानवीयता है।

कुंठाओं के काले बादलों को अपने अंदर से इस तरह बाहर खदेड़ देना चाहिए कि कभी वो चाहे भी न आपके ऊपर हावी होना तो आपका धैर्य और सब्र आपका साथ इस तरह दे कि आप भूलकर भी उसकी चपेट में न आ सकें। हताश और निराश व्यक्ति खुद तो हारता ही है साथ ही साथ उसकी ये हताशा और निराशा परिवार को भी ले डूबती है।

परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य की ये जिम्मेदारी होती है कि वो बुरे से बुरे वक्त में भी संबल बनकर एक दूसरे के साथ खड़ा रहे। ताकि बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी परिवार की अखंडता, विश्वास और एकता खंडित होकर बिखर न पाए।

व्यक्ति का आशावादी दृष्टिकोण ही परिवार को एक खूबसूरत जीवन जीने की कला सिखाता है, और खुद भी सामर्थ्यवान होकर परिवार की हर छोटी-बड़ी ज़रुरत की पूर्ति पूरी निष्ठा से कर पाता है। ईश्वर की निगाह हम सब पर है। अगर आप पूरे मन से उस सर्वशक्तिमान पर अपना अटूट विश्वास बनाए रखते हैं तो देर सवेर वो आपकी सुनता जरूर है। सुख-दुख तो आना -जाना है। सुख के बाद दुख ,दुख के बाद सुख ये ईश्वर की रची हुई एक माया है, जिसका शिकार हम सबको एक न एक दिन होना ही पड़ता है।

ऊपरवाला अगर कुछ छीनता है तो बदले में देता भी है ‌। वो पालनहार है, दाता है। ईश्वर की रजामंदी मानकर हमें हर हाल में खुद को खुश रखना सीखना चाहिए। हमारा ये जीवन , ये सांसें उस परमपिता परमात्मा की देन है। हमें अपना दुख अपनी सारी चिंताएं परमात्मा को समर्पित कर देनी चाहिए।  व्यर्थ में चिंता करके हम बेकार घुलते रहते हैं , जिससे ईश्वर भी नाराज़ हो जाता है। जितना और जैसा हमारे नसीब में लिखा है उसे सहर्ष स्वीकार कर लेना ही समझदारी है।

ईश्वर को समर्पित रहकर हमें बस अच्छे कर्मों के प्रति संलग्न रहना चाहिए। कभी -कभी हम अपनी परेशानियों अपने दुख में इस तरह आकंठ डूबे जाते हैं कि हमें कमियां तो नज़र आती है पर उसकी बख़्शी हुई रहमत नज़र नहीं आती। हम ज़िंदा है, सांस ले रहे हैं, हमारी काया, हमारे हाथ पैर जब तक सही सलामत हैं हम हर परेशानी से लड़ सकते हैं। कदम कदम पर पेश आती हुई परिक्षाएं ही तो हमें सबल और दृढ़ बनाती है। हमारा दुख किसी दूसरे के लिए सुख साबित होता है। और हमारा सुख दूसरों के लिए दुख, इसी से समझ लीजिए कि ये तो सचमुच ईश्वर का रचा एक खेल है जिसे हर किसी को खेलना भी पड़ता है और जीतना भी पड़ता है।

जीत की कोशिश ही आपको सही मायनों में ज़िन्दगी जीना सिखाती है। हार मानकर बैठ मत जाओ , चलते रहो ,बढ़ते रहो , सत्कर्मों से अपना मार्ग प्रशस्त करते चलो ताकि बाधाएं चोट न पहुंचा सके , दुआएं काम आती रहे‌ ‌। जिसने अपने जीवन में दुआएं कमा ली समझो उसने सबकुछ कमा लिया। रूपया पैसा तो मात्र काग़ज़ी धन है। असली धन तो सुख-शांति और संतोष है। जीवन की सार्थकता खुश रहने और रखने में है। सारी उम्र हाय- हाय , आपा-धापी में बिताकर और सिर खपाकर मिलता भी क्या है।

निराशा  और हताशा एक घुन की तरह है जो मनुष्य को अंदर ही अंदर खोखला कर देती है।जो जीवन पता नहीं कितनी मन्नतों और दुआओं से पाया हो वो निराशाओं की तपती भट्टी में जलाकर खाक करने से बेहतर है सहजता ,सबलता को अपनी बाजुएं बनाकर मेहनत करते हुए कठिनाइयों की मुश्किल से मुश्किल डगर भी पार करते रहो। और अपने अपनों के लिए एक मिसाल बनकर जिओ और इस दुनिया से जाओ‌‌। एक योद्धा कहलाओ न कि एक हारा हुआ और कायर इंसान। वक्त कभी एक सा नहीं रहता, दुख के काले बादल छंटकर एक न एक दिन छंट जाते हैं । उम्मीदों भरी सुनहरी धूप हमारे अंतर्मन पर दस्तक जरूर देती है।

समझदारी इसी में है कि हम समझें – ये सुख -दुख हमारे अपने ही बनाए हुए हैं, इसके लिए ईश्वर या किसी को भी दोषी ठहराना उचित नहीं है। अपने ही दोषों को दुख कहकर दुखी होना , खुद के प्रति एक तरह का अन्याय है। आने वाले हर लम्हें को खुशी -खुशी अपनाकर सबकुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए और हमेशा प्रसन्न रहना चाहिए। कर्ता-धर्ता सब ईश्वर ही है उसे कभी मत बिसराओ। यकीन मानिए ये छोटी-छोटी गूढ़ बातें समझकर और अपनाकर आपका जीवन हमेशा खुशहाल, आल्हादित बीतेगा और सार्थक कहलाएगा।

निधि भार्गव मानवी

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