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गांव की महिलाओं का भी साहस कम नहीं 

महाराष्ट्र के जिला थाणे के एक गांव की रहने वाली संगीता कुछ सालों पहले मात्र एक गृहिणी थों। सन् 2015 में उन्होंने कुछ नया करने की उम्मीद से बेफ रिसर्च डेवलपमेंट फाउंडेशन में अपना नाम लिखवाया। जहां उन्हें खेती संबंधी तमाम टेक्निक की जानकारी प्राप्त हुई। यह भी सीखा कि फसल को किस तरह कीड़े से बचाया जाए। इसके साथ ही संगीता एसआरएस टेक्निक से सौ किलोग्राम के बदले 250 किलोग्राम अनाज प्राप्त करना शुरू किया। धीरे-धीरे संगीता अगलबगल के किसानों का भी मार्गदर्शन करने लगीं। धीरे-धीरे उनका नाम कृषि विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। संगीता की सलाह से अनेक किसान अधिक अन्न उगाने लगे। यही नहीं, फसल में भी विविधता ले आए। वहां के गांवों के लोग फूलों की खेती करने लगे। संगीता खेती के साथसाथ मुर्गी पालन का भी काम करती हैं। खेती में नुकसान उठाने वाली महिलाएं संगीता के प्रयास से अब अच्छीखासी कमाई कर आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुकी हैं।
तमिलनाडु के कांचीपुरम की शांता परिवार की गरीबी से त्रस्त थी। रोजगार के लिए वह भटक रही थी, तभी उसे स्वयं समूह की जानकारी मिली। दो साल तक वह किसी ठोस काम की तलाश में दौड़ती रही। काफी परिश्रम कर के गांव की 20 महिलाओं को इकट्ठा कर के पशुपालन एवं दूध बेचना शुरू किया। इस ग्रुप को एक कंपनी की ओर से पैकेजिंग का काम मिला। इनकी ईमानदारी और लगन देख खर कंपनी की ओर से इन्हें बड़े आर्डर मिलने लगे। शांता की मेहनत की वजह से अनेक महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं, जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं और परिवार का सहारा बनी हुई हैं।
गुजरात के जिला बनासकांठा के गांव नगानां की रहने वाली नवलबेन ने 2020 में 1.10 करोड़ रुपए का दूध बेच कर रिकार्ड बनाया है। 63 वर्षीया नवलबेन के पास 80 भैंसें और 45 गाएं हैं। इनकी चारों संतानें शहर में रहती हैं और वह अकेली अपने इस व्यवसाय को संभालती हैं। नवलबेन जैसी गुजरात के गांवों में10 मिलियोनर महिलाएं हैं, जो दूध बेच कर लाखों रुपए कमाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ये महिलाएं ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हैं। मेहनत, अपनी सूझबूझ और परंपरागत कौशल के बल पर इन्होंने अपने व्यवसाय को विकसित किया है। ये दूध दुहती हैं, नापती हैं, भरती हैं और समय से टैम्पो पर केन चढ़ा कर डेयरी भेजती हैं। पुरुष प्रधान समाज के प्रभुत्व को तोड़ना इनके लिए आसान नहीं था। परंतु सिर पर पल्लू रख कर रीतिरिवाजों को निभाते हुए खुद को ही नहीं, अन्य महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़ा किया है।
बिहार की अनीता देवी मशरूम लेडी के रूप में जानी जाती हैं। एक एनजीओ की मदद से मशरूम की खेती करना सीखा और ‘माधो परफार्मर’ कंपनी की स्थापना कर आज लाखों रुपए कमा रही हैं। इसी तरह बिहार के ही जिला मुजफ्फरपुर की ही रहने वाली राजकुमारी देवी, जो आज किसान चाची के नाम से मशहूर हैं, बिहार में ही नहीं, पूरे देश में मशहूर है। दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले ट्रेड फेयर में जब उनका स्टाल लगता है तो लाइन लगा कर लोग उनका अचार और मुरब्बा खरीदते हैं। वह अपनी पैदावार बाजार में बेचने के बजाय अचार या आटा बना कर बेचती हैं।
1993 में आए लातूर के भूकंप के बाद प्रेमा नाम की सीधीसादी गृहिणी ने कुछ लोगों के सपोर्ट से महिलाओं के पुनर्वास का काम शुरू किया। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत उन्होंने 1300 गांवों की जोड़ा और उनके घर बनवाए। आफकोर्स सरकारी दिक्कतें, लोगों का विश्वास जीतना और आर्थिक मैनेजमेंट, यह काम आसान नहीं था। पर उन्होंने हिम्मत हारे बिना रात-दिन काम किया। इसके बाद प्रेमा ने स्वयं शिक्षा प्रयोग कार्यक्रम शुरू किया। जिसके अंतर्गत महिलाओं को आर्ट-क्राफ्ट, खेती और होम फूड आदि की ट्रेनिंग देना शुरू किया। परिणाम स्वरूप वहां के गांवों की महिलाओं के जीवन में काफी सुधार आया है।
उड़ीसा की गीता जोसेफ ने गांव की महिलाओं की कला को प्रोत्साहित करने के लिए अपना ब्रांड शुरू किया। वह लुप्त हो रही कला को प्रोत्साहित करती हैं। अभी जल्दी गीता के साथ उड़ीसा के पत्तांचित्र और ब्रोंज कास्टिंग के अनेक कलाकारों ने काम कर के मजबूत हो रहे हैं। तमिलनाडु की पोलियोग्रस्त गुणवंती चौधरी किवलिंग आर्ट में माहिर थीं। आर्थिक रूप से समृद्ध होने के लिए उन्होंने स्क्रेप पेपर से आर्टपीस बना कर बेचना शुरू किया। किसी कलापारखी की नजर में गुणवंती आ गई और उसने उसकी कला को शहरी प्लेटफार्म पर पहुंचाया। बस, उसी के बाद गुणवंती की दिनोंदिन खिलती गई। आज गुनो’ज किवलिंग नाम से उसका अपना ब्रांड है और उस पर वालमार्ट, ग्रीटिंग कार्ड, मीनिएचर और ज्वेलरी के अलावा अन्य चीजें बनती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अब तक वह दो हजार लोगों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं। 2015 में ब्रिटिश काउंसिल में एक सक्सेसफुल बिजनेस वुमन के रूप में उन्हें बुलाया जा चुका है। वह यूके बेस्ड किवलिंग ग्रुप की गाइड भी हैं। साल में 30 लाख की कमाई करने वाली गोदावरी अक्षाकांदिली ने बाजार में पेपरलैम्प देखा।
उसे देख कर उनके मन में आया कि इसे तो वह भी बना सकती हैं। पति की नौकरी छूट गई तो गोदावरी ने पेपर आर्ट शुरू किया। माउथ पब्लिसिटी से उन्हें काम मिलने लगा। मांग बढ़ने पर गोदावरी ने बैंक से लोन ले कर पेपरलैम्प की मैन्युफैक्चरिंग बड़े पैमाने पर शुरू किया। आज वह आर्ट की अनेक चीजें बना कर महिला शक्ति अवार्ड प्राप्त कर चुकी हैं। गुजरात की पबीबेन रबारी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अपना एंटरप्राइज चलाती हैं। जहां बैग्स, फाइल्स, कुशन कवरबेडशीट जैसी अनेक चीजें तैयार होती हैं। पबीबेन कढ़ाई के काम के लिए प्रख्यात हैं। उन्होंने एम्ब्रायडरी के लिए हरी जरी की खोज की है। वह जानकीदेवी बजाज अवार्ड प्राप्त कर चुकी हैं। ये महिलाएं न किसी मल्टीनेशनल कंपनी के साथ जुड़ी हैं न ही इनके पास मैनेजमेंट की कोई डिग्री है। इन्होंने अपनी हिम्मत द्वारा सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का स्तंभ खड़ा किया है। जिस पर गांवों की तमाम महिलाएं अपने सपने की इमारत खड़ी करने के लिए आसानी से आगे आ सकेंगीं। इनके द्वारा उठाए गए कदम आगे दुनिया की बड़ी से बड़ी जीत छोटी है।
वीरेन्द्र बहादुर सिंह

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