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भक्तो की आस्था का प्रतीक है आस्तिक देव का मंदिर

रायबरेली। हरचंदपुर क्षेत्र में सर्पों के देवता, स्वामी आस्तिक देव का मंदिर भक्तों की आस्था एवं विश्वास का प्रतीक है। अपनी अलौकिक शक्ति के चलते बाबा का दरबार दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। सर्पदंश से पीड़ित के ठीक होने से लेकर भक्तों की सच्चे मन से मांगी गई मुरादें यहां पूरी होती हैं। जिससे श्रद्धालु बाबा आस्तिक देव के दर्शन को दौड़े चले आते हैं।

आस्तिक देव : सच्चे मन से मांगी गई मुरादें..

लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग पर गंगागंज बाजार से लगभग 5 किलोमीटर दक्षिण में सई नदी के किनारे लालू पुरखास गांव में बाबा आस्तिक देव का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां पर सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति पल भर में ठीक हो जाता है। यही नहीं श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गई मुरादें बाबा जरूर पूरी करते हैं।

स्थानीय लोगो की माने तो बाबा आस्तिक देव के इस पौराणिक स्थल का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। हजारो वर्ष पहले पांडव वंश के राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय द्वारा सर्पों को समाप्त करने के लिए यज्ञ किया गया। जिसमें सर्पो की सभी प्रजातियां नष्ट होने लगी। उस समय स्वामी आस्तीक देव ने सर्पो की रक्षा की। तभी से बाबा आस्तीक देव के प्रभाव से भयंकर विषैले साँपो के विष का प्रभाव नही होता। स्थानीय लोगो के अनुसार बाबा के स्थान पर लगभग सौ वर्ष पहले एक चबूतरा था। बाबा ने गांव के लोगो को स्वप्न में अपने इस स्थान पर होने का आभास कराया था। ग्रामीणों द्वारा तभी से यहा पर पूजा अर्चना शुरू की गई। वर्तमान में चबूतरे की जगह भव्य मन्दिर बन गया। इसके अलावा मंदिर प्रांगण में कई भव्य मन्दिरों का निर्माण पूरा हो चुका हैं।

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सावन में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को होता है विशेष पूजन हवन

बाबा आस्तीक देव के इस पौराणिक स्थल पर वैसे तो वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है। लेकिन सावन महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को विशेष हवन पूजन का आयोजन किया जाता हैं। पूजा की समाप्ति के बाद बाबा के कपाट भक्तो के लिए खोल दिये जाते है। श्रद्धालु सई नदी में स्नान कर गीले वस्त्रों में मन्दिर की परिक्रमा कर बाबा के दर्शन कर मनौती मानते है।

रत्नेश मिश्रा
रत्नेश मिश्रा
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