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कांशीराम परिनिर्वाण दिवस: कांशीराम के बिना कहां पहुंची बसपा?

   दया शंकर चौधरी

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर श्रद्धासुमन अर्पित किया। उन्होंने कहा कि कांशीराम की पुण्यतिथि पर नमन व अपार श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए बीएसपी कार्यकर्ताओं को संदेश भी दिया है।

कांशीराम की पुण्यतिथि पर मायावती ने ट्वीट कर लिखा, “बहुजन समाज को राजनीतिक शक्ति में उत्थान कर उन्हें यहां हुकमरान समाज बनाने के लिए बामसेफ, डीएस4 एवं बहुजन समाज पार्टी के जन्मदाता व संस्थापक मान्यवर कांशीराम को आज उनकी पुण्यतिथि पर नमन् व अपार श्रद्धा-सुमन अर्पित। उन्हें नमन कर रहे उनके सभी अनुयाइयों का तहेदिल से आभार।” आज से ठीक एक साल पहले 9 अक्टूबर 2021 को मायावती ने कांशीराम की 15वीं पुण्यतिथि के अवसर पर कांशीराम स्मारक स्थल पर आयोजित रैली में बसपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने मान्यवर कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग भी की थी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि चुनाव आयोग को किसी भी राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के छह महीने पहले होने वाले प्री-पोल सर्वे पर पूर्णत: रोक लगानी चाहिए। ऐसा करके सत्तारूढ़ दल के पक्ष में माहौल बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में वह आयोग को पत्र भी लिखेंगी।

देश की आजादी के बाद भारतीय राजनीति में दलित वंचित और अछूत समाज को रेखांकित करने वाले मान्यवर कांसी राम का देहांत आज से सोलह वर्ष पूर्व 09 अक्टूबर 2006 को हो गया था। क्या यह सिर्फ संयोग है कि इस समय उनकी राजनैतिक उत्तराधिकारी मायावती और बहुजन समाज पार्टी सबसे कठिन दौर से गुजर रही है या इसके पीछे कांशीराम का न होना भी एक कारण है? मायावती को भी शायद इस समय कांशीराम की बहुत जरूरत है। तभी तो वे उनके निर्वाण दिवस पर लखनऊ में ‘विशाल रैली’ करती रही हैं। किन्तु इस बार उन्होंने ट्विट संदेश में उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पूरे दलित समाज को एकता का संदेश देने और अपना एकछत्र नेतृत्व दिखाने की आज उन्हें बड़ी जरूरत है। बताते चलें कि कांशी राम के कई पुराने साथी और बसपा को खड़ा करने में भागीदार रहे प्रमुख नेता-कार्यकर्ता इस बीच बसपा छोड़ चुके हैं या हाशिए पर हैं।

पिछले दिनों आर के चौधरी और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे पुराने नेताओं ने पार्टी छोड़ी है। पार्टी को अलविदा कहने वालों में कई विधायक, सांसद और पूर्व सांसद भी हैं। सभी ने मायावती पर अम्बेडकर और कांशी राम के मिशन की अनदेखी करने और टिकट बंटवारे में भारी गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। पार्टी छोड़ कर जाने वालों ने उन्हें ‘दलित की बेटी’ की बजाय ‘दौलत की बेटी’ तक कहा है। ये आरोप मायावती के लिए नए नहीं हैं और पार्टी छोड़ कर जाने वालों का आरोप लगाना भी अजूबा नहीं है। लेकिन यह देखना उल्लेखनीय होगा कि क्या कांशीराम के बिना बसपा उनके मिशन से भटक गई है? आक्रामक नेतृत्व की क्षमता देख कर जिस मायावती को कांशीराम ने अपना वारिस घोषित किया था और उम्मीद की थी कि वे उनके अधूरे कामों को आगे पूरा करेंगी, क्या वह मायावती अब बदल गई हैं?

कांशीराम के निधन के बाद मायावती ने उनके बहुजन को सर्वजन में बदल दिया था। एक सच तो यह है कि कांशीराम के निधन के अगले ही वर्ष, 2007 के विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की विधान सभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करके मायावती ने कांशीराम का एक बड़ा स्वप्न साकार कर दिखाया था। कांशी राम बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज होने को वह कुंजी मानते थे जिससे दलितों की मुक्ति का ताला खुलता है। विरोधाभास यह कि मायावती ने यह ‘कुंजी’ उस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के जरिए हासिल की जिसमें सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों का साथ लिया गया और नारे बदले गए। इस ‘सोशल इंजीनियरिंग’ से मायावती ने कांशीराम के ‘बहुजन’ को ‘सर्वजन’ में बदल दिया था। इसके साथ ही उन्होंने अपनी भाषा और व्यवहार की आक्रामकता बहुत कम कर दी थी ताकि सवर्ण समाज अपमानित महसूस नहीं करे। उनकी बहुमत वाली सरकार में सवर्णों को महत्वपूर्ण भागीदारी दी गई। इससे दलित समाज में बेचैनी फैली। 2012 तथा 2022 के विधान सभा चुनाव और 2014 के लोक सभा चुनाव में बसपा की पराजय के लिए इस प्रयोग को भी जिम्मेदार ठहराया गया।सवाल उठता है कि क्या यह कांशीराम के दिखाए रास्ते से विचलन था? क्या कांशीराम अपने रहते इस सोशल इंजीनियरिंग की इजाजत देते? बावजूद इसके दलित समाज और राजनीति पर शोध करने वाले समाज विज्ञानी कहते हैं कि मायावती का ‘सर्वजन’ वास्तव में कांशीराम के प्रयोगों का ही नतीजा था।

कांशीराम के ‘भागीदारी’ सिद्धांत में सभी जातियों और समुदायों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देना शामिल था। ‘मनुवादी पार्टी’ भाजपा के समर्थन से दो बार यूपी की सत्ता हासिल करने का प्रयोग भी कांशीराम ने ही किया था। जिसकी अम्बेडकरवादियों और वामपंथियों ने कड़ी आलोचना की थी।

तब कांशी राम का जवाब होता था- ‘अगर हमने भाजपा का सिर्फ एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया तो क्या गलत है?’ सवाल बनता है कि अपने ‘साहेब’ के उदाहरणों से सबक लेकर ही सही, ‘सर्वजन’ की सरकार बनाने के बाद क्या मायावती ने दलितों की मुक्ति का वह ताला खोलने की कोशिश की जो कांशीराम चाहते थे? क्या व्यापक दलित समाज का वास्तविक विकास होना शुरू हुआ? मायावती के चार बार यूपी की मुख्यमंत्री बनने से, जिसमें पांच साल का एक पूरा कार्यकाल भी शामिल है, दलितों का सामाजिक सशक्तीकरण जरूर हुआ। उन्होंने अपने दमन का प्रतिरोध करना और हक मांगना शुरू किया, लेकिन आर्थिक स्तर पर कुछेक दलित जातियां ही लाभान्वित हुईं।

60 से ज्यादा दलित जातियों में से सिर्फ तीन-चार यानी चमार, पासी, दुसाध और मल्लाह जाति के लोगों के हिस्से ही सत्ता के लाभ, विधायकी, मंत्री पद, नौकरियां, ठेके, आदि आए। कांशीराम ने दलितों के लिए अपना घर-परिवार छोड़ा था और कोई सम्पत्ति अर्जित नहीं की, लेकिन मायावती पर इसके विपरीत खूब आरोप लगे। मायावती के खिलाफ यह बात प्रमुखता से कही जाती है कि दलित स्वाभिमान की लड़ाई को आर्थिक सशक्तीकरण और दूसरे जरूरी मोर्चों तक ले जाना और सभी दलित जातियों को उसमें शामिल करना उनसे सम्भव नहीं हो पाया या इस तरफ उनका ध्यान नहीं है।

कांशीराम दलितों में महिला-नेतृत्व विकसित करने पर काफी जोर देते थे। मायावती के चयन के पीछे यह भी एक कारण था और वे कहते भी थे कि बसपा में कई मायावतियां होनी चाहिए, लेकिन खुद मायावती के नेतृत्व में कोई नेत्री नहीं उभर सकी। उन पर आरोप यह भी है कि वे पार्टी में नेताओं को उभरने नहीं देतीं। कांशीराम जिस तरह दौरे करते थे, कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिलते थे, मायावती का व्यवहार ठीक उसके उलट है। विधायकों-नेताओं से वे मुश्किल से मिलती हैं और कार्यकर्ता तो उन्हें सभाओं के मंच पर दूर से ही देख पाते हैं। बसपा में मायावती से नाराजगियां कांशीराम के जीते-जी ही उभरने लगी थीं। कांशीराम का पूरा विश्वास हासिल करने और पार्टी में नम्बर दो की जगह लेने के बाद मायावती के व्यवहार से कांशीराम के करीबी नेता-कार्यकर्ता खिन्न रहने लगे थे। जब भी बसपा नेताओं ने कांशीराम से शिकायत की तो उन्होंने मायावती का ही पक्ष लिया।

डॉ. मसूद अहमद जैसे कांशीराम के पुराने सहयोगी को मायावती के खिलाफ आवाज उठाने पर न केवल पार्टी और सरकार से बर्खास्त किया गया था बल्कि सरकारी आवास से उनका सामान तक बाहर फिंकवाया गया था। 2001 में आर के चौधरी को इसी कारण पार्टी छोड़नी पड़ी थी। बाबूराम कुशवाहा का भी वैसा ही हश्र हुआ था। यह सिलसिला आज तक चला आ रहा है। कांशीराम ने जिस मेहनत से पार्टी जोड़ी थी और सहयोगी जुटाए थे, मायावती उतनी ही आसानी से नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा देती हैं।

आरोप लगते रहे कि वे कांशी राम के रास्ते से दूर हो गई हैं, इस आरोप का मायावती जोर-शोर से खण्डन भी करती रही हैं। 2012 का विधान सभा चुनाव हारने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि कुछ लोग मेरे खिलाफ ऐसा दुष्प्रचार कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि मैं मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं और पूरे दिल से उनका अनुसरण कर रही हूं।

2012 और 2014 की पराजयों के बाद मायावती के रुख में कुछ बदलाव दिखा है। ‘सर्वजन’ का प्रयोग उन्होंने पूरी तरह छोड़ा नहीं है लेकिन ‘बहुजन’ की ओर वापसी की है। 2017 के चुनाव के लिए मायावती मुस्लिम समुदाय का समर्थन हासिल करने पर बहुत जोर दे रही थी। उन्होंने एक सौ के करीब टिकट मुसलमानों को दिए थे। मुसलमान कांशीराम के बहुजन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। पिछले दिनों एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर अब वे मूर्तियां नहीं लगवाएंगी, हालांकि दलित नेताओं की मूर्तियां स्थापित करना कांशीराम के दलित आंदोलन के सांस्कृतिक राजनैतिक एजेण्डे का महत्वपूर्ण हिस्सा था। कांशीराम दलित समाज के सर्वांगीण विकास के लिए राजनैतिक सत्ता हासिल करना जरूरी मानते थे। उनकी नजर अल्पकालीन लाभों में न हो कर बहुत दूर तक जाती थी। लेकिन कांशीराम जैसे विजन का मायावती में अभाव सा दिखता है।

पिछले दस वर्षों में यूपी के बाहर बसपा का प्रभावी विस्तार भी मायावती नहीं कर पाईं। अब जबकि बसपा बगावतों से कमजोर हुई दिखती है और भाजपा एवं सपा जैसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी मुकाबिल हैं, बसपा के लिए 2024 का चुनाव कड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। बसपा के अब तक के पड़ावों में मायावती का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आगे की यात्रा और भी चुनौतीपूर्ण है। क्या कांशीराम की असली वारिस होने को वे साबित कर सकेंगी।

भारतीय राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक: कांशीराम (15 मार्च 1934–9 अक्टूबर 2006)

कांसी राम ने भारतीय वर्ण व्यवस्था में बहुजनों के राजनीतिक एकीकरण तथा उत्थान के लिए कार्य किया। इसके अन्त में उन्होंने दलित शोषित संघर्ष समिति (डीएसएसएस), 1971 में अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों का कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की।

कांशीराम साहब ने सरकार की सकारात्मक कार्रवाई की योजना के तहत पुणे में विस्फोटक अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला (डीआरडीओ) में नौकरी करते समय पहली बार जातिगत भेदभाव का अनुभव उस समय किया किया जब उन्होंने ऑफिस में देखा कि जो कर्मचारी डॉक्टर आंबेडकर का जन्मदिन मनाने के लिए छुट्टी लेते थे उनके साथ ऑफिस में भेदभाव किया जाता था। वे इस जातिगत भेदभाव को ख़त्म करने के लिए 1964 में एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता बन गए थे। उनके करीबी लोगों के अनुसार उन्होंने यह निर्णय डॉक्टर आंबेडकर की किताब “एनीहिलेशन ऑफ कास्ट” को पढ़कर लिया था। कांशीराम को  बी. आर. अम्बेडकर और उनके दर्शन ने काफी पभावित किया था।

कांशीराम साहब ने शुरू में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) का समर्थन किया था लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़े रहने के कारण उनका मोह भंग हो गया था।इसके कारण उन्होंने 1971 में अखिल भारतीय एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ की स्थापना की जो कि बाद में चलकर 1978 में बामसेफ (BAMCEF) बन गया था। बामसेफ एक ऐसा संगठन था जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य वर्गों और अल्पसंख्यकों के शिक्षित सदस्यों को अम्बेडकरवादी सिद्धांतों का समर्थन करने के लिए राजी करना था।  बामसेफ न तो एक राजनीतिक और न ही एक धार्मिक संस्था थी और इसका अपने उद्देश्य के लिए आंदोलन करने का भी कोई उद्देश्य नहीं था। जानकार कहते हैं, इस संगठन ने दलित समाज के उस संपन्न तबके को इकठ्ठा करने का काम किया जो कि ज्यादातर शहरी क्षेत्रों, छोटे शहरों में रहता था और सरकारी नैकारियों में काम करता था, साथ ही अपने अपने अछूत भाई बहनों से भी किसी तरह के संपर्क में नहीं था।

इसके बाद कांशीराम साहब ने 1981 में एक और सामाजिक संगठन बनाया, जिसे दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसएसएसएस, DSSS या DS4) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने दलित वोट को इकठ्ठा करने की अपनी कोशिश शुरू की और 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की। उन्होंने अपना पहला चुनाव 1984 में छत्तीसगढ़ की जांजगीर-चांपा सीट से लड़ा था, बीएसपी को उत्तर प्रदेश में सफलता मिली, शुरू में दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच विभाजन को पाटने के लिए संघर्ष किया, लेकिन बाद में मायावती के नेतृत्व में इस खाई को पाटा गया।

सन 1982 में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द चमचा युग’ लिखी, जिसमें उन्होंने जगजीवन राम, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे दलित नेताओं का वर्णन करने के लिए “चमचा” शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने तर्क दिया कि दलितों को अन्य दलों के साथ काम करके अपनी विचारधारा से समझौता करने के बजाय अपने स्वयं के समाज के विकास को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक रूप से काम करना चाहिए।

बीएसपी के गठन के बाद, कांशीराम ने कहा था कि उनकी ‘बहुजन समाज पार्टी’ पहला चुनाव हारने के लिए, दूसरा चुनाव नजर में आने के लिए और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ेगी।1988 में उन्होंने भावी प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह के खिलाफ इलाहाबाद सीट से चुनाव लड़ा और प्रभावशाली प्रदर्शन किया, लेकिन 70,000 वोटों से हार गए।
वह 1989 में पूर्वी दिल्ली (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से लोक सभा चुनाव लडे और चौथे स्थान पर रहे। सन 1991 में, कांशीराम और मुलायम सिंह ने गठबंधन किया और कांशीराम ने इटावा से चुनाव लड़ने का फैसला किया, कांशीराम ने अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी को 20,000 मतों से हराया और पहली बार लोकसभा में प्रवेश किया। इसके बाद कांशीराम ने 1996 में होशियारपुर से 11वीं लोकसभा का चुनाव जीता और दूसरी बार लोकसभा पहुंचे। अपने ख़राब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने 2001 में सार्वजनिक रूप से मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

अधूरी रह गयी बौद्ध धर्म ग्रहण करने की मंशा

सन 2002 में, कांशीराम जी ने 14 अक्टूबर 2006 को डॉक्टर अम्बेडकर के धर्म परिवर्तन की 50 वीं वर्षगांठ के मौके पर बौद्ध धर्म ग्रहण करने की अपनी मंशा की घोषणा की थी। कांशीराम जी की मंशा थी कि उनके साथ उनके 5 करोड़ समर्थक भी इसी समय धर्म परिवर्तन करें। उनकी धर्म परिवर्तन की इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि उनके समर्थकों में केवल अछूत ही शामिल नहीं थे बल्कि विभिन्न जातियों के लोग भी शामिल थे, जो भारत में बौद्ध धर्म के समर्थन को व्यापक रूप से बढ़ा सकते थे। हालांकि, 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो गया और उनकी बौद्ध धर्म ग्रहण करने की मंशा अधूरी रह गयी।

इस मामले में मायावती का कहना है कि उन्होंने और कांशीराम साहब ने तय किया था कि हम बौद्ध धर्म तभी ग्रहण करेंगे जब केंद्र में ‘पूर्ण बहुमत’ की सरकार बनायेंगे। हम ऐसा इसलिए करना चाहते थे क्योंकि हम धर्म बदलकर देश में धार्मिक बदलाव तभी ला सकते थे जब हमारे हाथ में सत्ता हो और हमारे साथ करोड़ों लोग एक साथ धर्म बदलें। यदि हम बिना सत्ता पर कब्ज़ा किये धर्म बदल लेंगे तो हमारे साथ कोई नहीं खड़ा होगा और केवल ‘हम दोनों’ का ही धर्म बदलेगा हमारे लोगों का नहीं, इससे समाज में किसी तरह के धार्मिक क्रांति की लहर नहीं उठेगी।

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