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पुरस्कार से ही क्यों मिलती है साहित्य को पहचान!

राखी सरोज

पुरस्कार छोटा हो या बड़ा हर पुरस्कार का अपना एक स्थान होता है, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में। किंतु भारतीय राजभाषा में लिखें जाने वाले साहित्य और साहित्यकार को पहचान के लिए मोहताज ही पुरस्कारों का होना पड़ता है। यहां कोई इल्जाम नहीं है यह भारतीय हिंदी साहित्य का एक सत्य है।अभी हाल ही में ही हिंदी की वरिष्ठ लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार का मिलना हिंदी साहित्य संसार के लिए बेहद सम्मान की बात है। इससे पहले कई भारतीय लेखकों को यह सम्मान मिल चुका है, लेकिन हिंदी के लिए मिला यह पहला बुकर सम्मान है। इस सम्मान के बाद हिंदी के कई रचनाकारों ने इसे हिंदी के लिए मील का पत्थर बताया।

गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ का अंग्रेजी अनुवाद डेजी रॉकवेल ने ‘टूंब ऑफ सैंड’ के नाम से किया है। एक हिंदी उपन्यास जिसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया और इसके अंग्रेजी अनुवाद को मिले पुरस्कार के चलते, एक हिंदी उपन्यास को अपना वह स्थान प्राप्त हुआ जो उसे हिंदी साहित्य की भाषा में नहीं प्राप्त पाया था।

पुरस्कार की प्राप्ति के बाद रेट समाधि उपन्यास और इस उपन्यास की लेखिका गीतांजलि श्री दोनों ही लोगों की नजरों में आ चुके हैं। ऐसा नहीं है कि उनका उपन्यास पहले उत्तम भाषा में नहीं था और पुरस्कार मिलने के बाद उसमें बदलाव आ गया है, किंतु लोगों के विचारों में एक पुरस्कार से ही बदलाव आता है। यह हमें इस तरीके के मिलते पुरस्कार बताते हैं। जब उपन्यास की कमाई अचानक से पहले से बहुत अधिक होने लगे और हर हर किसी की जुबान पर बस उसी उपन्यास और उसके ही लेखक का नाम या लेखिका का नाम हो।

2021 में हिंदी भाषा में सुप्रसिद्ध कवयित्री अनामिका को उनके काव्य संग्रह टोकरी में दिगंत : थेरीगाथा 2014 के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। जिस के बाद एक प्रसिद्ध लेखिका को एक प्रसिद्ध पहचान मिली। अक्सर देखा जाता है कि हिंदी साहित्य में पुरस्कारों के आधार पर ही साहित्यकारो को और उनके साहित्य को पहचान मिलती है। यदि कोई साहित्यकार जिसे कोई पुरस्कार नहीं मिला है।

उसे वह पहचान, वह मुकाम नहीं दिया जाएगा जिसकी वह लायक है क्योंकि हिंदी साहित्य में हिंदी साहित्य की पहचान पुरस्कारों से ही होती हैं। हम अगर इस बात को सही मानते हैं तो क्या हिंदी साहित्य पुरस्कारों पर ही आधारित रह जाएगा, ना कि एक अच्छा साहित्य रचने पर। साहित्यकार का काम होता है कि वह जिस भाषा में साहित्य रचे, इस प्रकार का साहित्य रचे कि वह उस भाषा के साहित्य में बढ़ोतरी करें ना कि किसी पुरस्कार को पाने के लिए किसी साहित्य को रचा जाएं।

अच्छे साहित्य को ही साहित्य पुरस्कार प्राप्त होते हैं यह हम सभी मानते हैं। किंतु अक्सर ऐसा नहीं हो पाता क्योंकि जब साहित्यकार बहुत से होते हैं तो बहुत सा अच्छा साहित्य पुरस्कारों की दौड़ में पीछे रह जाता है पुरस्कार मिलता है वह साहित्य और साहित्यकार तो लोगों की नजरों में आ जाते हैं किंतु वह साहित्य जो पुरस्कार नहीं पा पाता, कहीं अंधेरे कोने में लोगों की पहुंच से दूर खो जाता है। यही हिंदी भाषा के साहित्य का सबसे बड़ा दुख है जिसके चलते हिंदी साहित्य में अनेक साहित्यकारों की पहुंच खो जाती हैं, क्योंकि वह किसी बड़े पुरस्कार को पाने का संघर्ष नहीं कर पाते हैं।

डेट समाधि उपन्यास को मुकर सम्मान मिलने के बाद बुकर सम्मान केवल ब्रिटेन से प्रकाशित पुस्तकों के लिए नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए कहा जा रहा हैं क्योंकि बुकर सम्मान के चयन में यह अनिवार्य शर्त है कि वह किताब ब्रिटेन के किसी भी प्रकाशक से प्रकाशित हुई हो। इस पुरस्कार पर प्रतिक्रिया देते वक्त अमूमन सारे लेखकों ने इस बात पर दुख जताया। उनका मानना है कि इस अनिवार्य शर्त का खमियाजा कई लेखकों को भुगतना पड़ा है और भविष्य में भी यह लेखकों के लिए बाधक बनेगा। प्रतिक्रिया देने वालों का कहना है कि हर लेखक की पहुंच ब्रिटिश प्रकाशक तक नहीं होती। ऐसे में इस शर्त का साथ छोड़ देना चाहिए।

जिस प्रकार से हम ब्रिटेन पुरस्कार पर से शर्त को हटाने के लिए बात करते हैं उसी तरीके से क्यों हम हिंदी साहित्य और हिंदी साहित्यकारों की स्थिति पर बात नहीं करते। क्या हिंदी साहित्यकारों की स्थिति में सुधार लाने का कार्य हमारा और हमारे देश का नहीं है क्यों हम उन्हें एक संघर्ष के दौर से गुजरने देते हैं संपूर्ण जीवन के लिए। हिंदी साहित्यकारों का जीवन क्यों अंग्रेजी साहित्यकारों की जीवन से इतना अलग होता है। अंग्रेजी साहित्यकार संपूर्ण जीवन केवल अपनी लेखिका पर गुजार देते हैं।

वही हिंदी साहित्यकार अपनी लेखनी को केवल शौक के लिए ही रखते हैं। हिंदी भाषा कि यह स्थिति उचित है क्या इसमें सुधार करने के लिए हमें और हमारी सरकार को कार्य नहीं करना चाहिए। राजभाषा में रचा गया साहित्य लोगों की दया और पुरस्कारों की उम्मीद पर अपना जीवन जीने के लिए कब तक मजबूर रहेगा यह विचार करना आज उतना ही जरूरी है जितना हम यहां मांग करते हैं कि अन्य देश हमें मौका दें उनके देश में आकर अपना विकास करने का।

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