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बीस साल बाद कोर्ट ‘पहुंचा’ फूलन की मौत का प्रमाण, तो बंद हुआ केस

     अजय कुमार

लखनऊ। 41 साल पुराने डकैती के मामले में कानपुर की एक अदालत ने दस्यु सुंदरी फूलन देवी के खिलाफ चल रहा मुकदमा खत्म कर दिया है। यह मुकदमा खत्म करने के लिए 20 वर्ष तो इसी लिए लग गय क्योंकि संबंधित पक्ष पिछले बीस वर्षाे में फूलन देवी की मौत का प्रमाण ही कोर्ट में नहीं जमा करा पाए थे। गत दिवस जब कोर्ट में फूलन की मौत का प्रमाण पत्र जमा गिया गया तो अदालत ने तुरंत केस बंद कर दिया।

गौरतलब हो कानपुर देहात की भोगनीपुर कोतवाली में 41 साल पहले डकैती और हत्या के प्रयास मामले में फूलन के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था,जिसको खत्म करने का आदेश कानपुर देहात की स्पेशल जज डकैती कोर्ट ने दिया। सहायक शासकीय अधिवक्ता आशीष कुमार तिवारी ने बताया कि भोगनीपुर कोतवाली में 25 जुलाई 1980 को डकैती युक्त हत्या के प्रयास का मुकदमा कालपी के शेरपुर गुढ़ा की रहने वाली दस्यु सुंदरी फूलन देवी व गौहानी के विक्रम मल्लाह व गिरोह के खिलाफ दर्ज किया गया था।

41 साल से मामले की सुनवाई चल रही थी। डकैत विक्रम मल्लाह को पुलिस ने मुठभेड़ में 12 अगस्त 1980 को मार गिराया था। जिसकी पुष्टि होने के बाद कोर्ट ने उसके खिलाफ चल रही सुनवाई को 4 सितंबर 1998 को खत्म कर दिया था। वहीं, फूलन देवी आत्मसमर्पण करने के बाद सांसद बन गईं। इसके बाद भी फूलन का मुकदमा अदालत में विचाराधीन रहा। दिल्ली में 25 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा ने फूलन की गोली मारकर हत्या कर दी थी, लेकिन पुलिस उसकी मौत होने की अब पुष्टि करा सकी।  एडीजीसी ने बताया कि शेरपुर गुढ़ा के ग्राम प्रधान की ओर से फूलन की मौत होने का प्रमाण पत्र आने, पुलिस रिपोर्ट व भोगनीपुर कोतवाली के पैरोकार व अन्य साक्ष्यों को विशेष न्यायाधीश दस्यु प्रभावित क्षेत्र सुधाकार राय की अदालत में पेश किए गए। जिसपर अदालत ने फूलन के खिलाफ चल रहे मुकदमे को खत्म करने का आदेश जारी कर दिया। सरकारी सिस्टम की लाचारी का इससे बड़ा प्रमाण शायद ही दूसरा देखने को मिले। एक तरफ समाजवादी पार्टी, निषाद पार्टी और बिहार की वीआईपी पार्टी के नेता आज भी फूलन देवी के नाम पर रोटियां सेंक रहे हैं तो दूसरी और उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि फूलन के परिवार का क्या हाल है।

दस्यु फूलन का गिरोह बेहमई में सामूहिक नरसंहार के बाद चर्चा में आया था। फूलन के गिरोह ने बेहमई गांव में 26 लोगों को लाइन में खड़ा करके गोलियां बरसाईं थीं। इसमें 20 लोगों की मौत हो गई थी और बाकी को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया था। इसके बाद से यमुना बीहड़ में डकैत गिरोह की सरदार फूलन ने अपना भय बना लिया था। बेहमई के नरसंहार में पति लाल सिंह की मौत होने पर शादी के चार दिन में ही 16 साल की मुन्नी विधवा हो गई थी। बेहमई नरसंहार में मुकदमा दर्ज हुआ, जिसमें राजाराम वादी बने थे। ग्रामीण आज भी कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद फूलन ने राजनीति में कदम रखा था। सपा की टिकट पर मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और फिर संसद पहुंच गई थीं।

दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जीवनगाथा में काफी उतार-चढ़ाव रहे। 10 अगस्त 1963 को जन्मी और 25 जुलाई 2001 को मौत के घाट उतार दी गईं। थी। फूलन क जन्म एक निम्न वर्ग परिवार में उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव गोरहा का पूर्वा में हुआ था। बेहद गरीब मल्लाह के परिवार में जन्मी फूलन देवी के घर में दो समय की रोटी की व्यवस्था करना भी पहाड़ जैसा होता था।

फूलन पर उसके अड़ोस-पड़ोस के बिगड़ैल ठाकुर लड़कों की हमेशा नजर रहती थी। इन लड़कों ने कई बार फूलन को हवश का भी शिकार बनाया था। फूलन को बेहमई गांव में एक घर के एक कमरे में बंद कर दिया गया था। करीब तीन हफ्ते तक कई पुरुषों द्वारा उसे पीटा गया, बलात्कार किया गया और अपमानित किया गया। इन लोगों ने फूलन कोे गाँव के चारों ओर नग्न कर घुमाया। किसी तरह से फूलन इन लोगों की कैद से भागने में सफल हो गई और चंबल में जाकर बागी बन गई। इसी के चलते फूलन को ठाकुरों से काफी नफरत थी।फूलन की इसी नफरत ने बेहमई नरसंहार कांड को अंजाम दिया।

बेहमाई से ठाकुरों की कैद से भागने के महीनों बाद, फूलन बदला लेने के लिए गाँव लौटी। 14 फरवरी 1981 का वह दिन था। शाम को, उस समय गाँव में एक शादी चल रही थी। फूलन और उसके गिरोह के डकैत पुलिस वर्दी में थे। फूलन ने मांग की कि  श्री राम और लाला राम को उसग सौंप दिया जाए,लेकिन श्री राम और लाला राम पहले ही वहां से निकल गए थे,इसके बाद फूलन ने रौद्र रूप धारण कर लिया और गाँव के सभी युवकों को गोलबंद करके एक कुएँ से पहले एक लाइन में खड़ा कर दिया। फिर उन्हें लाइन में ही नदी तक ले जाया गया। तटबंध पर उन्हें घुटने टेकने का आदेश दिया गया। जैसे ही इन लोगों के घुटने टेके, फूलन और उसके साथियों ने गोलियों की बौछार कर दी जिसमें  22 ठाकुर लोग मारे गए। बेहमई नरसंहार ने पूरे देश को झंझोर के रख दिया। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वी॰पी॰ सिंह ने बेहमाई हत्याओं के मद्देनजर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद फूलन के खिलाफ एक बड़ा पुलिस अभियान शुरू किया गया,लेकिन पुलिस को कोई सफलता हाथ नहीं लगी। जो फूलन का पता लगाने में विफल रहा था।  

बेहमई नरसंहार के दो साल बाद भी पुलिस फूलन को नहीं पकड़ सकी थीा। इसके बाद इंदिरा गांधी सरकार की सरकार ने फूलन के आत्मसमर्पण पर बातचीत करने का फैसला किया। इस समय तक, फूलन की तबीयत खराब रहने लगी थी और उसके गिरोह के अधिकांश सदस्य मर चुके थे, कुछ पुलिस के हाथों मारे गए थे, कुछ अन्य प्रतिद्वंद्वी गिरोह के हाथों मारे गए थे।

फरवरी 1983 में, वह कुछ शर्तो के साथ आत्मसमर्पण के लिए सहमत हुई। हालाँकि, उसने कहा कि उसे उत्तर प्रदेश पुलिस पर भरोसा नहीं है और उसने जोर देकर कहा कि वह केवल मध्य प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करेगी। उसने यह भी आग्रह किया कि वह महात्मा गांधी और हिंदू देवी दुर्गा की तस्वीरों के सामने अपनी बाहें रखेगी, पुलिस के सामने नहीं।फूलन ने जो शर्ते रखी थीं उसके अनुसार समझौता यह हुआ था कि आत्मसमर्पण करने वाले उसके गिरोह के किसी भी सदस्य पर मृत्युदंड नहीं लगाया जाएगा। गिरोह के अन्य सदस्यों के लिए सजा आठ वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। उसके पूरे परिवार को पुलिस द्वारा उसके आत्मसमर्पण समारोह का गवाह बनाया जाना चाहिए।

फूलन को आत्मसमर्पण कराने के लिए एक निहत्थे पुलिस प्रमुख ने उससे चंबल के बीहड़ों में मुलाकात की थी। इसके बाद फूलन ने मध्य प्रदेश के भिंड में महातम गांधी और देवी दुर्गा के चित्रों के समक्ष अपनी राइफल रखी। दर्शकों में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अलावा लगभग 10,000 लोग और 300 पुलिसकर्मी शामिल थे। उसके गिरोह के अन्य सदस्यों ने भी उसी समय उसके साथ आत्मसमर्पण कर दिया।

फूलन देवी पर डकैती और अपहरण के तीस सहित अड़तालीस अपराधों का आरोप लगाया गया था। उसके मुकदमे को ग्यारह साल की देरी हो गई, इस दौरान वह एक उपक्रम के रूप में जेल में रहा। इस अवधि के दौरान, उन्हें डिम्बग्रंथि अल्सर के लिए ऑपरेशन किया गया और एक हिस्टेरेक्टॉमी से गुजरना पड़ा। अंत में उसे निषाद समुदाय के नेता विशम्भर प्रसाद निषाद, (नाविकों और मछुआरों के मल्लाह समुदाय का दूसरा नाम) के हस्तक्षेप के बाद 1994 में पैरोल पर रिहा किया गया था। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ सभी मामलों को वापस ले लिया। इस कदम ने पूरे भारत में सदमे की लहर भेज दी और सार्वजनिक चर्चा और विवाद का विषय बन गया। आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में रॉबिनहुड की तरह गरीबों का पैरोकार समझा जाता था।

फूलन ने अपनी रिहाई के बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। 1996 में फूलन ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर सीट से (लोकसभा) चुनाव जीता और वह संसद तक पहुँची। 25 जुलाई सन 2001 को दिल्ली में उनके आवास पर फूलन की हत्या कर दी गयी। उसके परिवार में सिर्फ़ उसके पति उम्मेद सिंह हैं।

बाद में फिल्म निर्माता शेखर कपूर ने माला सेन की 1993 की पुस्तक भारत की बैंडिट क्वीन ‘द ट्रू स्टोरी ऑफ़ फूलन देवी’ पर आधारित फिल्म में फूलन देवी के जीवन के बारे में उनके 1983 के आत्मसमर्पण के बारे में बताया। बाद में फूलन ने फिल्म की स्टोरी की सटीकता पर सवाल खड़ा किया और इसे भारत में प्रतिबंधित करने के लिए संघर्ष किया। यहाँ तक कि उसने एक थिएटर के बाहर खुद को आत्मदाह करने की धमकी दी थी। आखिरकार, निर्माता द्वारा उसे करीब 40,000 रूपए का भुगतान करने के बाद उसने अपनी आपत्तियाँ वापस ले लीं। फिल्म ने फूलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। 

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