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शिक्षा नीति में संस्कृति का महत्व

डॉ दिलीप अग्निहोत्री
  डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

 नई शिक्षा नीति में मातृ भाषा को उचित सम्मान दिया गया है। इसके माध्यम से बच्चों को सहज रूप में शिक्षित किया जा सकता है। ग्रामीण परिवेश के विद्यार्थी भी अब मातृभाषा में उच्च व तकनीकी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। यह दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। ऐसे में इसके ज्ञान का विशेष महत्व है। राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल ने कहा कि संस्कृत अमृत भाषा है। यह अमृत्व प्रदान करती है। इसका ज्ञान संग्रहालय तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह संस्कृत के विद्वानों व विद्यार्थियों को इसके प्रसार में योगदान करना चाहिए। जीवन में इसका उपयोग करना चाहिए। यह देव भाषा है। इसके उत्थान और राष्ट्र के विकास में भी समर्पित रहना चाहिए।

आनंदीबेन पटेल ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के उनतालीसवें दीक्षान्त समारोह को संबोधित किया। कहा कि संस्कृत मात्र एक भाषा ही नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति का मूल आधार है क्योंकि भारतीय सभ्यता की जड़ें इसमें निहित है। यह हमारी परम्परा को गतिमान करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। आनन्दी बेन ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में संस्कृत भाषा को विशेष स्थान मिला है। इससे संस्कृत की प्रासंगिकता को नई दिशा मिलेगी। संस्कृत के साथ तीन अन्य भारतीय भाषाओं का विकल्प होगा नई शिक्षा नीति से आज की युवा पीढ़ी संस्कृत भाषा के अध्ययन अध्यापन से लाभान्वित होगी।

काशी का विकास

राज्यपाल ने काशी की महिमा और यहां हो रहे विकास का भी उल्लेख किया। कहा कि काशी तीनों लोकों से न्यारी नगरी जागृत रहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काशी को नव्य और भव्य रूप में प्रतिस्थापित किया है। पिछले दिनों उन्होंने भव्य काशी विश्वनाथ धाम को लोकार्पित किया। काशी में स्वास्थ्य सड़क राजमार्ग,रिंगरोड का विकास हुआ है। धर्म और पर्यटन की दृष्टि से बड़ा कार्य हुआ है।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी मन की बात में महामहोपाध्याय गंगा नाथ झा,गोपीराज कविराज जैसे विद्वानों का संस्मरण सुनाया था। इन विद्यानों ने देव भाषा संस्कृत का प्रसार प्रसार किया। विदेशी विद्यानों ने भी देवभाषा की सेवा और प्रचार प्रसार किया। दारा शिकोह भी बनारस आए थे। उन्होंने यहां आकर संस्कृत सीखी थी। आज मुस्लिम और विदेशी छात्र भी इस विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जो पूरे विश्व में संस्कृत भाषा के महत्व को दर्शाता है।

प्राचीनतम इस विश्वविद्यालय के उत्थान के लिए पूर्व मुख्यमंत्री संपूर्णानंद के योगदान अविस्मरणीय है।समारोह में मुख्य अतिथि लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कहा कि दुनिया के किसी भी देश में भारत जैसी संस्कृति और लोक परम्परा नहीं है। संस्कृति और शास्त्रों के संरक्षण में लोक कलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विद्यानिवास मिश्र कहते थे कि जिसने संस्कृत नहीं पढ़ी,इस पृथ्वी पर उससे बड़ा अभागा कोई नही है।

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