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चैंपियन बन अब टीबी मुक्त भारत अभियान को पंख दे रहे शिवप्रसाद

• टीबी ग्रसित प्रवासी मजदूरों की कर रहे मदद

कानपुर नगर। काम-धंधे के तलाश में शहर आने वाले प्रवासी मजदूरों के सामने कई तरह की चुनौतियाँ होती हैं जिसके चलते कई बार वे अपनी सेहत का ध्यान नहीं रख पाते और बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। ऐसे ही एक प्रवासी मजदूर बलरामपुर जनपद के निवासी 42 वर्षीय शिवप्रसाद जो खुद टीबी की बीमारी के शिकार हुए, स्वस्थ होने के बाद अब अन्य प्रवासी मजदूरों को टीबी जैसे रोग के प्रति जागरुक कर रहे हैं।

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शिवप्रसाद को पिछले वर्ष टीबी हुई थी। नए शहर में काम से जुड़ी और अन्य परेशानियों को झेलते हुए हुए भी उन्होंने पूरा इलाज लिया और इस बीमारी से मुक्ति पाई। नवम्बर 2022 में वर्ल्ड विजन इण्डिया संस्था से जुड़कर टीबी चैंपियन बनने का मौका मिला। अब हर माह करीब 10-20 टीबी मरीजों को यह एहसास दिलाने का काम करते हैं कि टीबी के खिलाफ इस लड़ाई में वे अपने को अकेला न महसूस करें, कोई भी दिक्कत हो तो नि:संकोच क्षयरोग केंद्र जाकर परामर्श लें । इनमें से कई ऐसे भी हैं जो रोज़गार के चक्कर में घर-परिवार से दूर यहाँ अकेले रहते हैं। ऐसे मरीजों को भावनात्मक सहयोग भी प्रदान करते हैं ताकि वे आसानी से इलाज पूरा कर सकें। मरीजों को योग, व्यायाम व सुबह टहलने के लिए प्रेरित करते हैं।

टीबी मुक्त भारत अभियान

शिवप्रसाद बताते हैं वे पिछले वर्ष फरवरी में कानपुर आये थे। चार बच्चों के पिता शिवप्रसाद के कुछ सपने थे जिसके लिए वो एक रोजगार की तलाश में थे। इसी बीच उनके बलराम जनपद के साथी मिले और शिवप्रसाद ने फलों का काम शुरू किया और वह थोक फल लेकर फुटकर में फल बेचने लगे। इसी बीच उनको सर्दी, खासी और जुखाम हो गया। बदन दर्द और कमजोरी भी लगने लगी। उन्हें लगा शायद मौसम में बदलाव के कारण ये दिक्कतें हो रहीं हैं। निजी मेडिकल स्टोर से दवा ली और राहत मिलते ही फिर से ठेला लगाने लगे। इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया।

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दिन बीतते गये और कुछ दिनों बाद अप्रैल 2022 में फिर वही स्थिति हुई और खासी बढ़ती ही गयी। प्रवासी होने की वजह से उनको पहले तो रहने के लिए घर मिलने में दिक्कत हुई और फिर महंगा किराया जिसकी वजह से बिना छत के वे रात ठेले पर ही बिता देते थे। ऊपर से मंडी में और दुकानदारों का सताना कि यहाँ नहीं कहीं और दुकान लगाओ। मन विचलित था क्यूंकि घर पैसे भी भेजने थे। ऐसे में शिवप्रसाद दोस्तों के साथ ही डॉक्टर को दिखाने पहुंचे। डॉक्टर ने बलगम के जाँच और छाती के एक्सरे की सलाह दी। जिला क्षयरोग केंद्र 20 मई 2022 को शिवप्रसाद के बलगम की जाँच हुई तो टीबी का संक्रमण निकला। वहां जिला कार्यक्रम समन्वयक राजीव सक्सेना ने उन्हें टीबी की दवा देकर नियमित खाने की सलाह दी| शिवप्रसाद का कहना है कि डाक्टर की सलाह के मुताबिक ही दवा खाते रहे। इसका परिणाम रहा कि छह माह बाद अब वह टीबी से मुक्त हैं और अपने काम पर वापस आ गये हैं।

टीबी मुक्त भारत अभियान

शिवप्रसाद ने बीमारी के दौरान ही ठान लिया कि जिन दिक्कतों से उन्हें गुज़रना पड़ा है उसका सामना किसी और प्रवासी कामगार को न करना पड़े। इसलिए वे ऐसे टीबी मरीजों के सच्चे मददगार बनेंगे। वे बताते हैं, “मैं समुदाय को जागरक करने में जुटा हूँ ताकि देश को टीबी मुक्त बनाने में सहयोगी बन सकूं। टीबी चैंपियन बनकर जहां भी जनसमूह होता है, वहां अपने अनुभव बताकर लोगों को टीबी की गंभीरता समझाता हूँ” वे कहते हैं कि घर-परिवार से सैकड़ों मील दूर अकेले रहकर काम-धंधे के साथ अपने को बीमारी से सुरक्षित बनाना कठिन तो बहुत है लेकिन असम्भव कतई नहीं है।

डॉट सेंटर से जोड़कर दिया जा रहा इलाज

जिला कार्यक्रम समन्वयक राजीव सक्सेना ने बताया कि शिव[रसाद एक सक्रिय टीबी चैंपियन हैं और अब तक 25 से अधिक लोगों को प्रेरित कर टीबी की जांच करा चुके हैं। इनमें कई पॉजिटिव मिले। इलाज के लिए उन्हें प्रेरित करने के साथ ही विभागीय सुविधाएं दिलवाने में सहयोग कर रहे हैं। उनका कहना है कि काम-धंधे के लिए घर से दूर रहने वाले सेहत का ठीक से ख्याल नहीं रख पाते।

कार्यस्थल पर साफ़-सफाई और पर्याप्त रोशनी के अभाव में उन्हें बीमारियाँ आसानी से घेर लेती हैं। ऐसी ही फैक्ट्रियों और संस्थानों में स्वास्थ्य विभाग के तत्वावधान में टीबी व अन्य बीमारियों के संभावित लक्षण वालों की जांच भी कराई जाती है। टीबी की पुष्टि वाले प्रवासी कामगारों को डॉट सेंटर से जोड़ दिया जाता है, जहाँ से दवाएं और अन्य सरकारी सुविधाएँ मिलने लगती हैं।

रिपोर्ट-शिव प्रताप सिंह सेंगर

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