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भारत के दिलों में बसने वाला लोक संगीत क्यों है विलुप्तता के कगार पर?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी 

महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर सदियों पुराने भारतीय परंपरागत संगीत, यानी लोक संगीत की चाहत और प्रतिष्ठा आज भी अनेक देशों में कायम है और उसे देखने अनेक सैलानी भारत यात्रा करते हैं। हमने कई बार सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर देखा ही होगा कि विदेशी सैलानी भारत के अनेक जगहों में वहां के लोक संगीत पर सन्तुष्टि के साथ ख़ुशी से नाचते-झूमते नज़र आते हैं। यह देखकर हमारा भी सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है और हम भारतीय होने पर गौरवान्वित महसूस करते हैं।

हम सदियों पुराने भारत को पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा और पहचान दिलाने वाले शास्त्रीय संगीत के फनकारों और उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम भारत की रंगबिरंगी अनेक संगीत कलाओं की बात करें, तो आज भी किसी विशेष अवसर पर हमें इन फनकारों के करिश्माई हुनर की काबिलियत देखने को मिलती है। आज के शोर-शराबे से भरे संगीत को पसंद करने वाले युवाओं को क्या इन सबके बारे में मालूमात भी है या नहीं? अगर नहीं तो ये दुख और हैरानी की बात है। हालांकि, हम यह भी देख रहे हैं कि साल दर साल हमारे विभिन्न प्रदेशों के लोक संगीत की शैली और निरंतरता में कमी आ रही है क्योंकि यह क्षमता में गिरावट पीढ़ी दर पीढ़ी होने के कारण पहले जैसी बात आज की शैलियों में नहीं मिल रहा है और धीरे-धीरे यह विलुप्तता की और बढ़ रही है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि जो चीजें चलन से बाहर हो जाती हैं, उनका हश्र यही होता है। इसलिए, यह बेहद ज़रूरी है कि शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत को सुरक्षित रखा जाए।

अगर शास्त्रीय संगीत शैलियों, और भारतीय लोक संगीत की परंपराओं को संरक्षित, सुरक्षित करने और विलुप्तता से बचाए रखना है, तो सबसे पहले हमें युवाओं को पारंपरिक संगीत की ओर प्रेरणा देकर, उनकी रुचि को जगाना होगा। आज 65 फ़ीसदी भारतीय जनसंख्या युवा है और अधिकतम युवा पाश्चात्य संस्कृति की ओर प्रेरित होने को मजबूर होते जा रहे हैं। उन्हें वर्तमान परिओप्रेक्ष मेंअंग्रेजी गाने, हिंदी धूम-धड़ाके वाले गीतों में अधिक उत्साह और चाहत दिखती है। इसलिए,  हमें युवाओं में इस पारंपरिक संगीत की ओर रुझान देने की ज़रूरत है। इसमें हमारे बड़े बुजुर्गों, शिक्षकों, अभिभावकों के महत्वपूर्ण योगदान की ज़रूरत है। युवा इनके संपर्क में ही बचपन से बड़े होते हैं। इसलिए, इनपर बचपन से ही भारतीय पारंपरिक संगीत के प्रति रुझान पैदा करने की ज़रूरत है ताकि, यह अपनी पीढ़ियों में इस संगीत को संरक्षित, सुरक्षित कर अगली पीढ़ियों को प्रोत्साहित हो सकेंगे।

इतना ही नहीं संगीत में मानवीय काया को निरोगी रखने की अपार संभावनाएँ हैं। संगीत में मानवीय काया निरोगी करने की भी अपार क्षमता है। आज हम यह विशेषता पारंपरिक और आधुनिक संगीत दोनों में देखते हैं। क्योंकि, आज योगा क्लास, व्यायाम, पीटी इत्यादि फिटनेस के तरीकों में हम देखते हैं कि इसकी प्रक्रिया में मानवीय संकेतों, निर्देशों, आवाजों का स्थान अब गीतों ने ले लिया है। अब यह सब प्रक्रियाएं गीतों के माध्यम से होती हैं। कोई भी नया पुराना गीत चलता है और योगा, व्यायाम, पीटी की प्रक्रिया होती है।

यहाँ पर प्रधानमंत्री के 28 जनवरी 2022 को एक कार्यक्रम में संबोधन की करना मैँ ज़रूरी समझता हूँ। पीआईबी के अनुसार, प्रधानमंत्री मरेंद्र मोदी ने भारतीय संगीत परंपरा में संतों के वृहद ज्ञान के बारे में चर्चा की है। उन्होंने कहा था कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा को महसूस करने की शक्ति और ब्रह्मांड के प्रवाह में संगीत को देखने की क्षमता ही भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा को इतना असाधारण बनाती है। उन्होंने कहा, संगीत एक ऐसा माध्यम है जो हमें हमारे सांसारिक कर्तव्यों से अवगत कराता है। यह हमें सांसारिक आसक्तियों को पार ले जाने में भी मदद करता है। प्रधानमंत्री ने भारत की कला और संस्कृति की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने के लक्ष्य के लिए एक फाउंडेशन की प्रशंसा की। उन्होंने  फाउंडेशन से प्रौद्योगिकी के इस युग के दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने को कहा। उन्होंने कहा कि सबसे पहले भारतीय संगीत को वैश्वीकरण के इस युग में, अपनी पहचान बनानी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने योग दिवस के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि योग दिवस के अनुभव ने संकेत दिया है कि भारतीय विरासत से दुनिया को फायदा हुआ है और भारतीय संगीत में भी मानव मन की गहराई में उतरने की क्षमता है। उन्होंने कहा, दुनिया में हर व्यक्ति भारतीय संगीत के बारे में जानने, सीखने और लाभ पाने का हकदार है। इसका ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है। वहीं, उन्होंने यह भी कहा कि जब टेक्नोलॉजी का प्रभाव हर क्षेत्र में है, तो संगीत के क्षेत्र में भी टेक्नोलॉजी और आईटी का रिवॉल्यूशन होना चाहिए। भारत में ऐसे स्टार्ट-अप तैयार होने चाहिए, जो पूरी तरह संगीत को डेडिकेटेड हों, भारतीय वाद्ययंत्रों पर आधारित हों और भारत के संगीत की परंपराओं पर आधारित हों।


इसलिए, अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें, तो हम पाएंगे कि भारतीय पारंपरिक संगीत बेहद अनमोल है। भारतीय लोक संगीत की परंपराओं और शास्त्रीय संगीत को संरक्षित व सुरक्षित करना तात्कालिक ज़रूरी है। संगीत में मानवीय काया को निरोगी रखने की अपार संभावनाएं हैं। भारतीय परंपरागत संगीत को विलुप्तता से बचाने की तात्कालिक ज़रूरत है।

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