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बाबा लाल दयाल जी ने योग शक्ति से प्राप्त की थी 300 साल की आयु

योग शक्ति और भक्ति पंथ का प्रचार प्रसार करने वाले बाबा लाल दयाल जी का 666वाँ जन्म दिवस समारोह 13 फरवरी को पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। बाबा लाल के लाखों अनुयायी पूरे देश भर में फैले हुए हैं। लखनऊ में लोक परमार्थ सेवा समिति ने इस अवसर पर बाबा लाल दयाल जी को समर्पित भजन संग्रह का एक कैसेट जारी किया है।

बावा लाल दयाल जी महाराज का जन्म पिता भोलाराम और माता कृष्णा देवी के घर संवत 1412 (सन 1355) में माघ शुक्ल द्वितीय को पश्चिमी पंजाब की राजधानी लाहौर के समीप कस्बा कसूर पाकिस्तान में हुआ था। हालांकि भारत में इस पंथ की 15 गद्दी मानी जाती है, किन्तु दातारपुर-रामपुर-हरिद्वार के पीठाधीश्वर महंत 1008 रमेश दास शास्त्री जी के अनुसार 22 गद्दियों की स्थापना कर योगशक्ति द्वारा 300 साल की आयु प्राप्त करने वाले योगीराज बावा लाल दयाल जी ने विक्रम संवत 1712 रामपुर हलेड़ आश्रम में शरीर का त्याग किया था। उनके अंतिम वचन थे-“योग युग्त कर राखि वेहि फिर भी वस्तु पराई रहि।”

बाबा लाल दयाल जी का संक्षिप्त इतिहास

ढाका यूनिवर्सिटी के पूर्व उपकुलपति डॉ. एच आर मजूमदार की पुस्तक “दारा शिकोह” के अनुसार बाबा लाल जी क्षत्रीय थे और उनका जन्म जहांगीर के शासन काल में हुआ था। इसी तरह जेम्स हेस्टिंग्ज ने अपनी किताब कोर्ट पेंटर्स आफ 1832 में उनकी 300 साल की आयु पर प्रकाश डाला है। किताब में बताया गया है कि बाबा लाल जी की 22 गद्दियों में काबुल, कंधार तथा गजनी अफगानिस्तान में व चार पाकिस्तान में है। इसी बीच औरंगजेब का भाई दारा शिकोह बावा लाल जी के उपदेशों से प्रभावित होकर उनका शिष्य बन गया था। बावा जी के गुरु का नाम चेतन स्वामी था। बावा जी अपनी तपस्थली सहारनपुर से प्रतिदिन हरिद्वार का 50 किलोमीटर का सफर कर गंगा स्नान करने जाते थे।

उनका उपदेश था कि “हे मानव यदि तू मन के गुल (फूल) का चिंतन करेगा तो तू गुल बन जाएगा। यदि तेरे तन में व्याकुल बुलबुल का ख्याल घर किए बैठा है तो तू बुलबुल बन जाएगा। तू परमात्मा का अंश है और ब्रह्मपुरुष है यादि तू कुछ दिन तक कुल अर्थात (ब्रह्म) का ध्यान करेगा तो तू भी ब्रह्म बन जाएगा। बाबा लाल दयाल जी ने हिंदू-मुस्लिम का भेदभाव मिटाकर एक ही सच्चे भगवान की भक्ति करने का उपदेश देते हुए कहा है कि खुदा और परमात्मा एक ही है। “लाल हिंदू दावा वेद का, तुर्क कुतेन कुरान। दोनों दावे बांधियों भूले आत्मज्ञान।”

बाल्य काल में ही बाबा में दिखने लगे थे अलौकिक लक्षण

इतिहास के अनुसार जब सतगुरु बाबा लाल जी की आयु आठ वर्ष की थी तो पिता की आज्ञा से वे अपनी गाय चराने के लिए जंगल में गए हुए थे। गाय हरे हरे जंगल में घास चरने लगी और बालकलाल दयाल जी नदी के किनारे पेड़ के नीचे आकर बैठ गए और बहते पानी का नज़ारा देखने लगे। कुछ देर के बाद उनके सामने से एक साधुओं का झुंड आता दिखाई दिया। उनके निकट पहुंचने पर उस झुंड के महात्मा ने देखा के कड़कती धूप होने पर भी पेड़ की छाया वैसी की वैसी ही है, जबकि दूसरे पेड़ो की छाया अपने स्थान से दूर हो गई है। उस काफिले के महात्मा जब उनके निकट पहुँचे तो उन्हें यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उस अलौकिक बालक के सिर पर शेषनाग ने अपने फन से छाया की हुई है।

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महात्माओं को अपने सामने देख कर बालक लाल दयाल ने उठ कर उन्हें प्रणाम किया। कुछ पल बाद महात्मा चैतन्य स्वामी ने अपने शिष्यों में से एक को नदी से जल भर कर लाने के लिए कहा। गुरु जी की आज्ञा पाकर तुरन्त एक शिष्य हाथ में कमंडल लेकर नदी से जल भर लाया। स्वामी जी ने शिष्यों को जल पिलाकर फिर स्वयं पिया।

चैतन्य स्वामी को समाधि के दौरान इनके जन्म का हो गया था ज्ञान

इसके बाद एकाएक चैतन्य स्वामी जी को मथुरा में भगवान श्री कृष्ण जी के मंदिर में पूरे आठ वर्ष पहले लगाई गई समाधि की घटना स्मरण हो आई। घटना इस प्रकार थी कि समाधि में ध्यान लगाने के दौरान सारा शरीर खुशी से झूम उठा। समाधि खुलने पर मंदिर के पुजारी श्री भोगेशवरा नंद ने पूछा कि स्वामी जी, क्या बात है आज आप परम आनंदित होकर गदगद हो रहे है। स्वामी जी ने खुश होकर उत्तर दिया कि आज हमारा एक शिष्य पंजाब के शहर कसूर में महान शक्ति को लेकर उत्पन हुआ है जो परमहंस योगीराज कहलाएगा। भ्रमणके दौरान अपने सामने शिष्य को देखकर स्वामी जी के हर्ष की कोई सीमा न रही और उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि यहां पर कुछ समय विश्राम कर इस बालक को ज्ञान का उपदेश करेगे।

बाबा लाल दयाल के गुरू चैतन्य स्वामी ने योग शक्ति से प्रकट किया अग्नि

अब वह भोजन का विचार करने लगे उन्होंने एक मिट्टी के बर्तन में पानी डालकर कुछ चावल डाले फिर अपने पांव का चूल्हा बनाकर उसपर वह बर्तन रख अपनी योग शक्ति से अग्नि प्रचंड की। कुछ पल में चावल उबलकर पक गए और फिर उन्हें ठंडा किया। सब साधुओं को खिलाकर खुद भी खाया इसके बाद उस मिट्टी के बर्तन में तीन दाने चावल के रख इसे पृथ्वी पर फोड़ दिया।

यह सब देख बाबा लाल जी आश्चर्य से चैतन्य स्वामी जी की और देखते ही रह गए। इसके बाद स्वामी जी ने कहा कि बेटा “हरि ओम तत्सत ब्रह्म सच्चिदानंद” कहो और भक्ति में हर समय मग्न रहो। संसार सराय मुसाफिरखाना है भूलकर भी इस संसार में दिल न लगाना। हमारी इस शिक्षा को ग्रहण करोगे तो तुम अवश्य एक दिन परमहंस योगीराज कहलाओगे। इसके बाद उन्होने चावल के तीन कण प्रदान कर श्री बाबा लाल जी को ब्रह्मज्ञान प्रदान किया। उन्होने उपदेश दिया कि ईश्वर एक है, निराकार है, केवल उसी की उपासना उचित है। जिसके लिए किसी बाहरी आडम्बर की आवश्कता नहीं है। कर्म करो परन्तु उनमें ममता नहीं करनी चाहिए। संसार के निरर्थक कर्मो को छोड़कर सच्चे सद्गुरू की शरणागत होना चाहिए।

उसी शाम श्री बाबा लाल दयाल जी माता पिता की आज्ञा से श्री चैतन्य स्वामी जी की शरण में आ गए। तभी से बाबा लाल जी ने योग और ब्रह्मज्ञान का प्रचार आरंभ किया। देश भ्रमण करते हुएबाबा जी ने मानव जाति को प्रेम व भाईचारे का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति व परोपकार इन्हीं दो बातों की ओर ध्यान देना चाहिए। दिल्ली,पंजाब, यूपी, नेपाल सहित पूरे देश में बाबा जी को मानने वाले लाखों लोग हैं। इसके अलावा काबुल के पठानों सहित सिंध “लाल फकीर” के नाम से प्रसिद्ध है। वहां के बहुत से मुसलमानों ने बाबा जी को अपना पीर माना है।सिंध के मुसलमानों ने बाबा के नाम की कबर बना रखी है वहाँ द्वितीया के दिन मेला लगता है।

दया शंकर चौधरी
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