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तलफ़्फ़ुज़ और मीडिया पर कार्यशाला का आयोजन

लखनऊ के मीडिया संस्थानों में काम करने वाले लोगों को भाषा और उसके सही उच्चारण करने की जानकारी देने के लिये “तलफ़्फ़ुज़ और मीडिया” Talaffus aur Media नाम से एक कार्यशाला का आयोजन किया। गोमती नगर स्थित ओपन एयर रेस्त्रां में कार्यशाला का आयोजन स्वंय सेवी संस्था किश्वरी कनेक्ट ने किया। इस कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद विद्वानों ने भाषा की दो बहनों उर्दू और हिन्दी के सही उच्चारण पर अपने विचार रखे।

तलफ़्फ़ुज़ और मीडिया : हिंदी वैज्ञानिक तो ऊर्दू तकनीकी भाषा

दावा सुख़न का लखनऊ वालों के सामने,इज़हारे बू-ए-मुश्क ग़ज़ालों के सामने। यानी लखनऊ वालों के सामने साहित्य की बात करना, गुफ्तगू की बात करना, ज़बान की बात करना बयान की बात करना, सुख़न की बात करना…ये वैसा ही है जैसा कि आप कस्तूरी मृग के सामने ख़ुशबू की बात करें। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुऐ लखनऊ विश्वविधालय के उर्दू विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो० अनीस अशफाक़ ने कहा कि वैसे तो सभी लोगों को अपनी ज़बान पर पूरी तरह से नियंत्रण होना चाहिये,लेकिन मीडिया के लोगों को तो अपनी जुबान और लेखनी पर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि जो वह लिखते है वह आम लोगों तक सीधा पहुँचता है और फिर वही शब्द आम बोलचाल की भाषा में आ जाता है। उन्होंने बताया कि हर ज़बान की अपनी खूबियां होती हैं। हिंदी के पास ऐसे अल्फ़ाज़ हैं जो दुनिया में किसी भाषा के पास नहीं हैं। हिंदी के गंभीर का कोई विकल्प नहीं है। जो बात विमोचन में है वो इजरा में नहीं है। इसीतरह से भूमिपूजन में जो बात है वो बात ग्राउंड ब्रेकिंग में नहीं है। अख़बार की भाषा लोगों को प्रभावित करती है, इसलिए हमारी बुनियादी जिम्मेदारी यह है कि हम अस्ल ज़बान में लिखें और बोलें। हिंदी के शब्द को जब ग़लत बोला जाता है तो अटपटा लगता है। लब्ज़ का लहज़ा और इमला हर ज़बान की ज़रूरत है। ज़रा सा असावधानी में शब्द के मानी बदल जाते हैं। हिंदी पूरी तरह वैज्ञानिक तो ऊर्दू तकनीकी भाषा है। जितने लतीफ़े ऊर्दू में हैं, उतने और किसी में नहीं हैं। आप जज़्बात और ख्यालात इस्तेमाल जरूर करें, जब ठीक करेंगे तो उसका काफ़ी असर होगा। ऊर्दू एक रिदमिक लैंग्वेज है। इसमें रिदम इनबेल्ट जैसी होती है। ताराकेशरी सिन्हा हमेशा संसद में शेर पढ़ती थीं। आप लिखने और बोलने के स्तर पर जिस लब्ज़ का भी इस्तेमाल करें कि उसकी ख़ूबसूरती बनी रहे।

सौ साल भी जियो पर सीखते रहो

प्रो. साबरा हबीब ने बताया कि मैं लोगों से मुलाकातों के लम्हें याद रखती हूं। रूसी में कहावत है कि सौ साल भी जिंदा रहो तो सीखते रहो। हिंदी और ऊर्दू फो बहनें हैं, एक के माथे पर बिंदी लगती है, दूसरे में हिज़्ज़ा लगता है। तफ़सील बताई कहना चाहिए, खुलासा शब्द नहीं होता है। जिम्मेवारी ग़लत है। जज़्बा, जज़्बात और जज़्बातों बोला जाता है, यह समझ ठीक नहीं है। बेगम और बेग़म, फिर और फ़िर का मतलब बदल जाता है। लखनऊ में तो ईंट उठने में भी डर लगता है, न जाने कहां से शायर निकल आए। जब उस्ताद का तलफ़्फ़ुज़ ठीक नहीं है, तो फ़िर सहाफियों को कौन सिखाएगा। नज़र नज़र में कमाल होता है। बलंदियों पर पहुंचना कमाल होता है। इस अक्सर ग़लत पढा जाता है।

सहाफी की बात का भरोसा करती है आवाम

लेखिका सबीहा अनवर ने बताया कि तहरीर, तकरीर और कलम के ज़रिए सहाफी अपनी बात आवाम तक पहुंचाता है। इसलिए उसके सही तहफ़्फ़ुज़ की जानकारी जरूर होनी चाहिए। ख़बर को ख़बर ही रहने दीजिए। हुजूम को सैलाब मत कहिए। हिंदुस्तान की ख़ूबसूरती गंगा-जमनी तहज़ीब नहीं है। हिंदुस्तान तो इंद्रधनुषी तहज़ीब का मुल्क है। ऊर्दू आवाम की ज़बान है। सही लब्ज़ क्या है, मीडिया को इसे जानने की कोशिश करनी चाहिए। हिंदुस्तान को समझने में ऊर्दू आपकी मदद करती है। फ़िर को फिर कहना ग़लत लगता है। ग़ालिब के मुल्क से हिंदुस्तान पहचाना जाता है। आप बहुत अहम अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल करें। हम सिर्फ़ सरसरी गलतियां ही न दूर करें, बल्कि गहराई से समझने की ज़रूरत है। हम बगैर मामले को समझे हुए उसकी गहराई में जाएं, तो पता चलेगा कि वह लब्ज़ क्यों लिखा गया है। हमें इस बात की समझ हो जाए कि हम गलतियां न करने की कोशिश करें। हमें साफ़ करने और माफ़ करने का लहज़ा आपका अलग होना चाहिए।

जो माल बिकता है, उसे ही पेश करना मज़बूरी

शायरा, आयशा सिद्दीकी ने बताया कि सहाफी मुशायरा कवर करने ही नहीं महसूस करने के लिए जाता है। यह उनकी मज़बूरी है कि जो माल बिकता है, उसे ही पेश करना है। लखनऊ में रहने वाला हर सख्श ऊर्दू का आदमी है। हर सांसद चाहता है कि अपनी बात में ऊर्दू के शेर जरूर कहे। वो शेर इसलिए पढ़ता है कि उसकी बात में वज़न पैदा हो जाए। कभी कभी शायर भी ग़लत शेर पढ़ते हैं। शेर को तरन्नुम में पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है। ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है। बहुत से लेखक ऐसे हैं, जो लिखते सही हैं, और बोलते ग़लत।

वरिष्ठ पत्रकार ओसामा तलहा के जन्म जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के अंत में कार्यशाला की आयोजक कुलसुम तलहा ने उपस्थित अतिथियों का आभार जताया।

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