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जीवन में कठिनाइयों का दौर

मुश्किलें आने पर जो हिम्मत जुटा नहीं सकते, दुखों का गम जो सहज से पी नहीं सकते।
दामन में भरी खुशियों को भी ऐसे लोग, सही मायनों में कभी खुलकर जी नहीं सकते।।

कहा जाता है कि मुश्किलें कभी बताकर नहीं आतीं। जीवन में आने वाली मुश्किलों और कठिनाइयों पर मनुष्य का कोई जोर नहीं चल पाता और इनके आने पर इनका सामना करना प्रत्येक व्यक्ति की क्षमताओं,योग्यताओं और समर्थताओं पर निर्भर करता है ।कहने का तात्पर्य है कि कौन व्यक्ति समस्याओं को किस प्रकार लेता है अर्थात वह समस्याओं के आगे अपने घुटने दे देता है और हार मान लेता है अथवा समस्याओं का डटकर सामना करता है और उनके समाधान के लिए कोई ना कोई तरकीब अवश्य निकाल लेता है। समस्याओं के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है।

कुछ व्यक्ति स्वयं को इस स्थिति में नहीं पाते कि वे अचानक से आने वाली समस्याओं और मुश्किलों को झेल पाएं, वहीं दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो इस प्रकार की चुनौतियों का सामना डटकर करते हैं और काफी हद तक जीत भी हासिल करते हैं ।वे समस्याओं को चुनौती के रूप में लेते हैं और पूरे तन, मन और धन से इन पर विजय पाते हुए जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। वास्तव में यही तो है जीवन की सच्चाई। जीवन जीने का सही अंदाज भी यही होता है।

अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि जीवन में कठिनाइयों का दौर जब आता है तो साथ में और भी अनेक प्रकार की मुसीबतें साथ लेकर आता है और ऐसे दौर में हमारे सगे संबंधी और अति निकट के मित्र भी हमारा साथ छोड़ देते हैं अर्थात कोई भी हमारी सहायता के लिए आगे हाथ नहीं बढ़ाता ।परंतु मेरे हिसाब से इस प्रकार की सोच रखना ही कमज़ोरी की सबसे बड़ी निशानी है क्योंकि जब हम स्वयं में दूसरों से अपेक्षा करने की आदत डाल लेते हैं तो ही हमारे भीतर इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण पनपने लगता है कि फलां आदमी ने हमारी अमुक मुश्किल समय पर मदद नहीं की और हम उनके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने लगते हैं, और फिर शुरुआत होती है हमारे आपसी संबंधों और रिश्तों के खराब होने की, जो किसी भी सूरत में सही नहीं है, क्योंकि आपसी मेल मिलाप, मिलना जुलना ,संबंध रखना एक सामाजिक व्यवहार है।

परंतु इस व्यवहार को यदि हम इस प्रकार से लेना शुरू कर दें कि यदि हमें मुश्किल समय का सामना करना पड़े तो उस समय हमारे मित्रगण और सगे संबंधी हमारे आवश्यक रूप से काम आएं ही आएं, तो यह बिल्कुल गलत सोच है। यह पूर्णतया हमारी स्वार्थी मानसिकता को दर्शाता है।दूसरों से मदद लेना गलत नहीं है, किंतु, अपेक्षाएं रखना गलत है। इसलिए स्वयं को इतना सक्षम, समर्थ और मजबूत बनाएं कि हम सभी अपने जीवन में आने वाली दिक्कतों का सामना स्वयं मजबूती से कर सकें।

दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके जीवन में दुख परेशानियां, कष्ट, संकट चुनौतियां, समस्याएं न आती हों, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन चुनौतियों को किस प्रकार अपने जीवन में शामिल होने देते हैं। मैं अक्सर एक कहावत सुना करती हूं कि एक पीढ़ी को अगली पीढ़ी को राहत और सुकून देने के लिए कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ता है, संघर्षरत रहना पड़ता है। अर्थात एक पीढ़ी संघर्ष करती है और उसकी आगे आने वाली पीढ़ी जीवन को आनंद पूर्वक जीती है, फिर उसके बाद आने वाली पीढ़ी संघर्ष करती है और इसी प्रकार यह क्रम चलता रहता है, परंतु मैं इस बात से कतई सरोकार नहीं रखती। मेरे अनुसार प्रत्येक पीढ़ी अपने कर्मों और पुरुषार्थ के बल पर ही अपना जीवन जी सकती है ।पुरखों द्वारा प्राप्त सुख संपदा का एक सीमा तक ही आनंद उठाया जा सकता है। किंतु यह कतई सत्य नहीं है कि यदि हमारे पूर्वजों ने विरासत में हमारे लिए काफी कुछ छोड़ा है तो हम सुखी रहेंगे ही। भौतिक सुखों की बात छोड़ दें, तो इसके अतिरिक्त भी हमारे जीवन में अनेक प्रकार के अन्य सुखों की कामना हम करते हैं जिसका अर्थ से, पैसे से कोई विशेष लेन-देन नहीं होता।अक्सर हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में ऐसे अनेक लोग दिखाई देते हैं जिनके पास पैसे की कोई कमी नहीं होती। परन्तु फिर भी वे लोग सुखी, खुश और संतुष्ट नहीं दिखते हैं। अर्थात पैसे की अहमियत एक सीमा तक ही होती है। उसके बाद वास्तविक सुख तभी मिल पाता है जब हम भीतर से खुश हों, संतुष्ट हों और यह तभी संभव है जब हम अपने जीवन में शुभ कार्य करें, अपने जीवन में आने वाले दुख, कष्ट और परेशानियों का डटकर सामना करें, चीज़ों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखें और दूसरों का कभी अहित न करें। अपनी जिम्मेदारियों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करें और अपने साथ-साथ अपने समाज, अपने देश और पूरे विश्व के कल्याण की बेहतरी के लिए सदैव प्रयासरत रहें।

           पिंकी सिंघल

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