स्वतन्त्रता संग्राम और हिंदी साहित्य

लखनऊ। आज़ादी का अमृत महोत्सव श्रंखला के अंतर्गत हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान,लखनऊ के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित स्वतन्त्रता संग्राम और हिंदी साहित्य नामक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि प्रो. अनिल कुमार शुक्ल, कुलपति महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,अजमेर ने कहा कि अमृत आसानी से नहीं निकला था, समाज को मथने की ज़िम्मेदारी साहित्यकारों की है। थोड़ा विष भी सही लेकिन अन्ततः साहित्य से अमृत ही निकलेगा।

साहित्य को दरबारों की जगह जनमानस से जुड़ना होगा। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.सदानंद प्रसाद गुप्त,कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने कहा कि जो जाति अतीत से विमुख हो जाती है वह भविष्य नहीं निर्मित कर सकती। स्वतंत्रचेता साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनमानस की भाषाए साहित्य परम्परा का स्वरूप बोध विकसित किया। स्वतंत्रता संबंधी लेखन के विपुल अध्ययन और पुरानी दृष्टियों से भिन्न उनके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।

उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित, सभापति भारतीय हिंदी साहित्य परिषद्, प्रयागराज ने हिंदी और उर्दू के साहित्यकारों की रचनाओं के माध्यम से स्वदेशी आंदोलन की रूपरेखा बताई। कहा कि तत्कालीन साहित्यकारों के लेखन में जागरण गीत बलिदानपंथी काव्य, तिरंगा गीत, राष्ट्रीय चरित्रों के गान तथा गांधीवादी साहित्य आदि प्रचुरता के साथ उपस्थित हैं। श्रीधर पाठक की काव्यपंक्ति जयाति जयति जय जय हिंद देश का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि यह सुभाष चंद्र बोस के प्रसिद्ध नारे जय हिंद का आधार बनी। उन्होंने पत्रकारिता को वास्तविक प्रतिपक्ष बताया। श्री सुधीर मिश्र संपादक नवभारत टाइम्स,लखनऊ ने कहा कि अंग्रेज़ियत से मुक्ति के लिए हमें हिंदी को विज्ञान और तकनीक से जोड़ना होगा। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि यह आज़ादी का अमृत महोत्सव है और हम इसे कोटि.कोटि जन तक ले जाना चाहते हैं।

प्रथम अकादमिक सत्र में प्रो. सुधीर प्रताप सिंह, दिल्ली ने छायावादोत्तर हिंदी कविता और स्वतंत्रता संग्राम पर बात रखते हुए कहा कि आलोचना के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उस समय की कविता में स्वतन्त्रता आन्दोलन के अप्रत्यक्ष बिंदुओं को भी देखने की ज़रूरत है। उन्होंने सुभद्रा कुमारी चौहान को स्त्री राष्ट्रवादी मन की कवयित्री बताया। प्रो. विद्योत्तमा मिश्र ने कहा कि स्वतंत्र को सुतंत्र होना चाहिए उन्होंने कहा कि कवि चौकीदार होता है वह सभी को जगाता है। प्रो. हरीश कुमार शर्मा, सिद्धार्थ नगर ने कहा कि हीनत्व भाव से जनता को उबारना उस समय के कवि के सामने बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने कुशलता से निभाया।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. नंद किशोर पाण्डेय, जयपुर ने स्वतंत्रता आंदोलन के चार महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख किया जिसमे स्वावलंबन, स्वाभिमान, समानता, स्वभाषा प्रमुख है। उन्होंने बताया कि स्वदेशी का सर्वप्रथम संदर्भ भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने किया। हरिऔध ने पहली बार दहेज समस्या पर कविता लिखी। माखनलाल चतुर्वेदी की कविता स्वधर्म स्वातंत्र्य और स्वदेश पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि भारतीय मन, दर्शन और चिंतन मनुष्य की समता की बात करता है। उस समय के कवियों की आवाज़ राजनेताओं को प्रेरित कर रही थी। सत्र का संचालन हिंदी विभाग की आचार्या प्रो. हेमांशु सेन तथा धन्यवाद ज्ञापन उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ के निदेशक डा. पवन कुमार (आईएएस) ने किया।

द्वितीय अकादमिक सत्र: डॉ. नवीन कुमार मंडवाना ने विभिन्न विधाओं के साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि तत्कालीन रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता में नई चेतना जगाने का काम किया। राष्ट्रीय भावना जन – जन तक पहुंचे इसलिए साहित्यकारों ने जनभाषा का प्रयोग किया। प्रो. सुनील कुमार द्विवेदी ने स्वतन्त्रता संग्रामकालीन हिंदी उपन्यासों के आसपास अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इतिहास जहां अपनी तथ्यपरकता से चूक जाता है वहीं से कथा साहित्य की यात्रा शुरू होती है। जिन्हें इतिहास ने बहिष्कृत किया उन्हें केंद्र में लाने का प्रयास उपन्यास करते हैं। हमारी औपन्यासिक परंपरा का ठेठ देसी ठाट हमें बंकिम के यहां से मिलता है। आगे उन्होंने बताया कि प्रेमचंद के साहित्य में लोक की परंपरा शक्ति अर्जित करती है।

प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि हमें साहित्य में आज़ादी की राह पर चलने वालों को पक्ष और प्रतिपक्ष में नहीं देखना चाहिए। आज़ादी के समय स्वतः स्फूर्त लेखन हुआ। उन्होंने बताया कि आज़ादी के आंदोलन का बीज शब्द है वन्दे मातरम जो कि आनन्द मठ की देन है। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों और उनकी चाल समझने में तत्कालीन नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। राष्ट्रीयता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग बालकृष्ण भट्ट ने किया। स्वतन्त्र भारत के पाठ्यक्रम में आज़ादी की लड़ाई का साहित्य नहीं है, क्रांतिकारियों का साहित्य नहीं है।अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरीश अरोड़ा ने कहा कि गायब हो गए इतिहास के पन्नों को खोजकर उनसे सूत्र ग्रहण करें। विभिन्न रचनाओं के संदर्भ देकर उन्होंने बताया कैसे अंग्रेज़ लोगों का उत्पीड़न कर रहे थे और उनके लेखकों और कलाकारों के अधिकारों को सीमित कर रहे थे। उस समय के रचनाकारों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दो रूपों में स्वतंत्रता की अनुगूंज वाला साहित्य लेखन किया। भारतेंदु मंडल का प्रत्येक रचनाकार अंग्रेज़ सरकार की नीतियों की आलोचना करते है।
सत्र का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के प्रो. रविकांत ने किया।

“स्वाधीनता आंदोलन में पत्रकारिता शस्त्र थी और हिंदी भाषा ख़ुद उसकी निर्माणशाला”

राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन तृतीय अकादमिक सत्र में ‘स्वतंत्रता संग्राम और हिंदी पत्रकारिता’ विषय पर विद्वान वक्ताओं ने अपनी बातें रखीं।

“स्वाधीनतापूर्व पत्रकारिता में विचार थे विचारवाद नहीं था” – अनन्त विजय

दैनिक जागरण समाचार पत्र के उप संपादक अनन्त विजय ने कहा कि भारत विचार की भूमि है, विचारधारा की नहीं। गांधी, दीनदयाल और लोहिया इन राष्ट्रनायकों ने किसी वाद का प्रवर्तन नहीं किया बल्कि अपने दर्शन की अभिव्यक्ति की। उन्होंने कहा कि हमें आज़ादी के आंदोलन के समय की पत्रकारिता का अध्ययन करते हुए समग्र दृष्टि रखनी होगी। उन्होंने बताया कि हमारे पूर्वज पत्रकार स्वराज और स्वाधीनता के लिए जनता में स्वाभिमान जगाने का स्वप्न देख रहे थे। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि हमारी हिंदी के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीयता की संकल्पना पर भी विमर्श होने चाहिए। स्वाधीनतापूर्व पत्रकारिता का नायक था देश तथा संघर्ष के बीज थे स्वराज, आत्मबल और आत्माभिमान। उस समय की पत्रकारिता स्त्रियों की भूमिका को प्रोत्साहित करती है।

आज़ादी के आंदोलन से पहले स्त्रियों की इतनी अधिक संख्या में कभी भागीदारी नहीं थी। स्वतंत्रता संग्राम के समय की हिंदी पत्रिकाएँ स्त्री के स्वत्व की परिपार्श्व थीं। प्रो. रमेश चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता आधुनिक जीवन का विश्वकोश बन गई है। उन्होंने बताया कि माखनलाल चतुर्वेदी ने प्रभा के माध्यम से स्वतन्त्रता आंदोलन के लिए कई नारे देते हैं और संपादकीय लेखन की कला भी सिखाते हैं। उत्तर प्रदेश से कुल 42 ऐसे पत्र थे जो असहयोग आंदोलन के समर्थन में निकले। उन्होंने चांद पत्रिका और रामरख सिंह सहगल के महत्त्व को बताया एवं तमाम पत्र–पत्रिकाओं और पत्रकारों पर तथ्यपरक बातें करते हुए आज़ादी के आंदोलन में उनकी भूमिका बताई।
प्रो. गोविन्द पाण्डेय ने कहा कि लोगों के लिए काम करना पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण कार्य है। उन्होंने स्वदेश, स्वराज आदि पत्रिकाओं के माध्यम से तत्कालीन क्रांतिकारी पत्रिकारिता पर प्रकाश डाला। उस समय की पत्रकारिता उद्देश्यपरक और मूल्यपरक थी।

चतुर्थ एवं अन्तिम अकादमिक सत्र: डॉ. विद्याबिंदु सिंह ने कहा कि नवजागरण की चेतना जगाने में लोक साहित्य का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। लोक साहित्य में नैसर्गिक संवेदना के साथ विरोध और आक्रोश का स्वर भी है। उसमें फिरंगी शासकों का विरोध प्रचुर है। सुराजी गीत गाए जाते थे जिसमें नरम एवं गरम दल दोनों का बखान किया गया है। गांधी, नेहरू और नेता जी(सुभाष) जैसे नायकों पर कई लोकगीत गाए गए। स्वराज और चरखे ने लोकगीतों में राष्ट्रीयबोध तथा स्वावलंबन का स्वर भरा। प्रो. हरिमोहन ने कहा कि अनाम लोक साहित्य लेखन के साथ परिवारीजन को आज़ादी की लड़ाई के लिए प्रेरित करने में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

डॉ. बहादुर सिंह परमार ने कहा कि लोकत्व हमें राष्ट्रत्व से जोड़ता है। हरबोलों ने राजा परीक्षत, रानी लक्ष्मीबाई आदि के लिए गीत गाए जिन्होंने स्वाभिमान तथा मिट्टी की आज़ादी के लिए लड़ाइयां लड़ीं। कटक जैसे वीरोचित लोक काव्य का लेखन हुआ। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गाए जाने वाले लोकगीतों में जनता पर अंग्रेज़ों द्वारा क्रूर अत्याचार का वर्णन किया गया है तथा भग्गी राव, मर्दन सिंह और सीला देवी जैसे लोक के नायक-नायिकाओं द्वारा उनका प्रतिरोध भी दर्ज किया गया है। तृतीय एवं चतुर्थ सत्र का संचालन क्रमश: हिंदी विभाग की आचार्या प्रो. श्रुति और प्रो. अलका पाण्डेय ने किया। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने सभी सत्रों के वक्ताओं तथा आयोजन में सम्मिलित श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापन किया। प्रो. कृष्णा श्रीवास्तव ने चंद्रगुप्त नाटक से एक देशभक्ति गीत का गायन किया।

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