प्रेम व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा भरता है

राजेश पुरोहित

14 फरवरी के दिन वेलेन्टाइन डे यानि प्रेम दिवस मनाया जाता है। कहा जाता है कि तीसरी शताब्दी में रोम के एक क्रूर सम्राट ने प्रेम करने वालों पर जुल्म ढाए तो वेलेन्टाइन नामक पादरी ने सम्राट के आदेशों की अवहेलना कर दी थी।

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उन्हें जेल में डाल दिया गया। 14 फरवरी को उन्हें फांसी पर लटका दिया था। इस तरह प्रेम के लिए बलिदान देने वाले इस सन्त की याद में हर वर्ष 14 फरवरी को यह दिवस मनाया जाता है।

प्रेम की विशद व्याख्या

प्रेम शब्द सब कुछ त्याग देने का नाम है। अपने प्रियतम के लिए तड़फ पैदा हो जाये। ईश्वर ही वह प्रियतम है  प्रेम की आध्यत्मिक व्याख्या करते हैं तो हम पाते हैं प्रेम से ईश्वर को पाया जा सकता है। कबीर ने कहा प्रेम गली अति सांकडी जामे दो न समाय। एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाने का नाम है प्रेम। जब आप प्रेम की आध्यात्मिक प्रक्रिया से रूबरू होते हैं तो प्रेम के कारण व्यक्ति में  एक आध्यात्मिक परिवर्तन दृष्टिगत होता है। यथार्थ प्रेम का अर्थ समझ मे आने के बाद मनुष्य का मैं हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। मैं तो हम में बदल जाता है। जीव मात्र में उसे वही परम् सत्ता के दर्शन होने लगते हैं। सब जीवों के प्रति समभाव नज़र आता है व्यक्ति के विचारों में बदलाव आता है वह आध्यत्मिक ईश्वर से प्रेम करने लगता है। मीरा की तरह राधा की तरह सुदामा की तरह प्रेम करने लगता है। सोच और दर्शन में बदलाव आता है।
प्रेम वह मनोवृति है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के सम्बंध में यह इच्छा होती है कि वह सदा हमारे पास या हमारे साथ रहे।उसकी वृद्धि उन्नति या हित ही हो।हमारे शास्त्रों में प्रेम अनिवर्चनीय कहा गया है। उसे मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है।मुमुक्षओं के लिए शुद्ध प्रेमभाव का ही विधान है साहित्य में प्रेम रति या प्रीति के तीन प्रकार माने गए हैं। उत्तम वह जिसमें प्रेम सदा एक सा बना रहे। जैसे ईश्वर के प्रति भक्त का प्रेम। मध्यम जो अकारण हो जैसे मित्रों का प्रेम। अधम जो स्वार्थ के कारण हो।
प्रेम एक एहसास है।प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की ओर धीरे धीरे अग्रसर करता है। ये एक मजबूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना को विस्मृत कर किसी एक के प्रति लगाव से जुड़ जाता है  ये किसी की दया भावना और स्नेह प्रस्तुत करने का तरीका मात्र है। प्रेम मानसिक व आंतरिक खुशी प्रदान करता है। प्रेम एक रसायन है।क्योंकि यह एक विलयन है द्रष्टा और दॄष्टि का। प्रेम का उद्भव उद्दीपन की प्रक्रिया से प्रारम्भ होता है। प्रेम में आसक्ति होती है।प्रेम की मोह और भक्ति के मध्य की अवस्था है।
प्रेम आकर्षण से मिलता है। आरएम सुख सुविधा से मिलता है। प्रेम दिव्य होता है जो असीम शांति देता है। अपार सुख देता है। मीरा ने कहा था प्रेम रतन धन पायो। प्रेम जो आकर्षण से मिलता है वह क्षणिक होता है क्योंकि वह प्रेम तो अनभिज्ञ या सम्मोहन के कारण होता है।आकर्षण से जिस दिन व्यक्ति का मोह भंग होता है उसी दिन प्रेम खत्म हो जाता है।जैसे ही ऐसा प्रेम खत्म होता है भय निराशा असुरक्षा उदासी आने लगती है।

यह वास्तविक प्रेम नहीं है, क्षणिक कहा गया है  

सुख सुविधा से मिलने वाले प्रेम से घनिष्ठता बढ़ती है, परंतु उसमें कोई उत्साह आनंद नही होता। दिव्य प्रेम हमेशा नया रहता है  हमेशा सुख आनंद शांति देता है  आत्मा परमात्मा में बदल जाती है। इसमें हमेशा उत्साह होता है। प्रेम असीम विश्वास है।असीम धैर्य है। असीम बल है।प्रेम का गुणगान संत महात्मा विद्वान सभी ने किया है। मीराबाई ने हँसते हँसते जहर पी लिया।प्रेम रंग सच्चा बाकि रंग झूंठे हैं। प्रेम में सुगंध है। जी. के. चेस्टरसन ने कहा था, ” \प्रेम का रास्ता किसी चीज़ के गुम होने की अनुभूति है। हेलन केलर ने कहा था, “प्रेम जीवन मे ताजगी लाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, प्रेम हमेशा कष्ट सहता है। प्रेम कभी दावा नहीं करता न कभी झुंझलाता न बदला लेता है। कबीरदास जी ने कहा “कबीरा यह घर प्रेम का खाला का घर नाहीं सीस उतारे हाथ धर सो पसे घर माहीं।” समर्पण का पर्याय है प्रेम।प्रेम संवेदना से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन प्रेम प्रतिबद्धता से अधिक है।
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