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अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह होगा MSP कानून

डॉ. राकेश कुमार मिश्रा

कोई भी अर्थव्यवस्था अन्ततः बाजार तत्वों पर ही कुशलतापूर्वक चल सकती है बाजार में मांग एवं आपूर्ति ही स्थायी एवं सर्वजन हिताय सन्तुलन स्थापित करते हैं। सरकारी नियंत्रण में कमी एवं उदारीकरण के दौर में यह उचित नहीं कि सरकार निजी क्षेत्र में खरीद बिक्री एवं उसकी कीमत निर्धारण के लिए कानून बनाये एवं उसका अनुपालन सुनिश्चित करे। यह तो पुनः सरकारी नियंत्रण एवं लाल फीताशाही के पुराने दौर में लौटने की बात है। आप कानून बनाकर निश्चित कीमत से कम की खरीद को अवैधानिक एवं दण्डनीय तो बना सकते हैं परन्तु आप किसी को खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।

यदि निजी क्षेत्र एवं लोगों ने बाजार कीमत से ऊँची एमएसपी पर खरीद बंद या कम कर दी तो किसानों को ही संकट का सामना करना पड़ सकता है। किसानों को तो एम एस पी का फायदा तब होगा जब उनकी पूरी फसल निजी क्षेत्र एम एस पी पर खरीद ले। ऐसा न होने पर सरकार अतिरिक्त खरीद के लिए तैयार हो जो व्यावहारिक नहीं है। न तो सरकार मात्र अनाज खरीद पर इतना पैसा खर्च कर सकती है और खरीदकर करेगी भी क्या? अपनी जरुरत के लिए तो एम एस पी पर खरीद करती ही है। सरकार प्रतिवर्ष फसलें बोये जाने के पूर्व 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा करती है जिनकी सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा की जाती है।

आयोग की स्थापना 1965 में हुई जो एक सलाहकारी संस्था है और इसे संवैधानिक दर्जा आज तक नहीं मिला। एमएसपी पहले एसएमपी थी अर्थात वैधानिक न्यूनतम कीमत। इस कीमत पर सरकार किसानों की फसलों मुख्यतः गेहूँ, धान एवं गन्ना की खरीद की गारन्टी देती थी जिससे किसानों को देश की खाद्य सुरक्षा के लिए इन मुख्य फसलों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। आज देश अनाज संकट नहीं वरन अनाज के जरूरत से अधिक उत्पादन की स्थिति में पहुँच चुका है। मोदी सरकार में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद बढ़ी है और 6 प्रतिशत किसानों को इसका लाभ मिलने लगा है जो 2014 के पहले 3 प्रतिशत ही था।

इसमें भी प्रारम्भ से ही दो तिहाई से अधिक खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पंजाब एवं हरियाणा में ही की जाती है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण एवं अनुचित है कि एम एस पी का लाभ देश के सभी राज्यों के किसानों को बराबर नहीं मिलता। पंजाब एवं हरियाणा के शत प्रतिशत किसान अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेंच लेते हैं। आन्दोलन पर बैठे किसान संगठनों को इस बात का जवाब देना चाहिए कि आज तक इन्होंने अन्य राज्यों के किसानों के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाई। कृषि कानूनों से यह मात्र इसलिए आन्दोलित हैं एवं नए कृषि कानूनों की वापसी के लिए हठधर्मिता दिखा रहे हैं, क्योंकि इनको इस बात का भय है कि नई व्यवस्था में हो सकता है कि उनके वर्चस्व एवं हितों पर चोट न पहुंचे।

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सरकार द्वारा नए कृषि कानूनों की वापसी से इनकार किए जाने पर इन किसान संगठनों ने निजी खरीद के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की बाध्यता जैसी अतार्किक एवं अव्यवहारिक मांग रख दी। सरकार किसी भी निजी क्षेत्र में उत्पादित एवं खरीद बिक्री की जाने वाली वस्तु की कीमत निर्धारण का हक उत्पादक एवं खरीददार से छीनकर अपने हाथ में कैसे ले सकती है। जबकि सम्पूर्ण विश्व के साथ-साथ देश भी उदारीकरण एवं बाजार शक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करने की नीति पर चल रही है। और इसका लाभ भी भारतीय अर्थव्यवस्था को मिला है। सरकार किसानों को बाजार से जोड़कर एवं निजी निवेश को कृषि क्षेत्र में लाकर किसानों को स्वतंत्रता प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहती है वहीं किसान संगठनों की एम एस पी को निजी क्षेत्र के लिए भी बाध्यकारी बनाने की मांग सरकार पर तो नाजायज दबाव है ही, किसानों को भी पुराने सरकारी तंत्र के मकड़जाल में ही बने रहने देने का एक प्रयास भी है।

यदि किसानों की देखादेखी एम एस एम ई या अन्य क्षेत्रों के लोग भी सरकार पर उनके उत्पादन की लाभदायक कीमत दिलाने के लिए कानून की मांग एवं सरकार के दखल की अपेक्षा करने लगे तो इसमें क्या गलत होगा। धान एवं गेहूँ की एम एस पी पर अधिकतम खरीद की नीति के कारण फसलों के विविधीकरण पर बुरा प्रभाव पड़ा है। पंजाब जैसे राज्य पानी की कमी के बावजूद धान की बड़े पैमाने पर खेती करते है। सरकार को इस बात पर लोगो को विश्वास में लेना चाहिए कि फसलों का विविधीकरण करके ही वे अपने उत्पादन की सही कीमत प्राप्त कर सकते हैं न कि एमएसपी के सहारे धान,गेहूँ एवं गन्ना के उत्पादन पर ही जोर देकर।

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