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सुबह-ए-बनारस कार्यक्रम के नौ वर्ष पूरे, मालिनी अवस्थी के गीत पर झूमें श्रोता

मां गंगा का पावन तट… चिड़ियों का कलरव… दूर से आती आरती शंख की मंगल ध्वनि के बीच आज सुबह-ए-बनारस कार्यक्रम के नौ वर्ष पूरे होने पर अस्सी घाट पर हमें आवाज़ लगाने का सौभाग्य मिला। यह एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में नही बांधा जा सकता। ये कहना है लोक गायिका मालिनी अवस्थी का।

उन्होंने, सप्त बटुकों ने आरती का शुभारंभ व संजीवनी के नेतृत्व में पाणिनि कन्या महाविद्यालय की ऋषिकाओं ने वैदिक ऋचाओं के स्तवन के बाद यज्ञ सम्पन्न करने के बाद मैने ‘राग अहीर भैरव में विलम्बित एक ताल में निबद्ध ‘मेरो मन मोहे जोगिया’ व द्रुत बंदिश तीन ताल में निबद्ध हमारी गुरु के गुरु पंडित चंद मिश्र की रची बंदिश ‘उठहु गोपाल, भोर की चिरैया बोलन लागी” से कार्यक्रम आरंभ किया। उसके बाद राग जोगिया में ठुमरी ‘पिया के मिलने की आस के बाद समापन सबकी फरमाइश पर ‘गंगा रेती पे बंगला छवा द मोरे राजा’ इस दादरा से किया। तबला पर साथ थे पं. कुबेर मिश्र, हारमोनियम पर बनारस घराने के वरिष्ठ कलाकार पं. धर्मनाथ मिश्र साथ थे।

समक्ष बैठे थे बनारस के एक से एक मूर्धन्य विद्वान! पद्मभूषण प्रो.वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य, केजीएमयू के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. सरोज चूड़ामणि गोपाल, पद्मश्री अजित श्रीवास्तव, पद्मश्री चंद्रशेखर के साथ बनारस के वरिष्ठ कलाकार सुचारिता दास गुप्ता, देवाशीष डे, रविशंकर मिश्र एवम कलकत्ते से आए समर साहा आदि अनेक गुनिजनो की उपस्थिति में आज गायन के बाद “हर हर महादेव” का आशीर्वाद पाकर धन्य हुई। बनारस की यही परंपरा है, हर कलाकार की यही साध यही ईनाम “हर हर महादेव” का सामूहिक उद्घोष ही कलाकार का मूल्यांकन है।

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