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गणतंत्र का यही तकाज़ा

गणतंत्र का यही तकाज़ा

आओ हम भी गणतंत्र मनाए
एक तिरंगा जरूर फैहराये
तिरंगा बलिदानों से मिला है
सेनानियों की शहादत से मिला है
बाबा साहब ने जो संविधान दिया
उसकी हम वर्षगांठ मनाए।

पर,क्या संविधान पर चल रहे हम
उसको सर्वोच्च मान रहे है हम
संविधान में तो जनता है राजा
भूखे पेट है, पर है महाराजा
वोट के दिन ही ताकत दिखती
नेताओं ने ही ठग लिया राजा
प्रलोभनों में फंसा दिया जाता
रुपये बांटकर फेंक दिया पासा
सारी वोट ठगकर ले जाता।

चुनाव जीतते ही अंगूठा दिखाता
नेता तो महल,दुमहले बनाता
वोटर राजा शोषित हो जाता
गरीब-अमीर की बढ़ रही खाई
लोकतंत्र की दे रहे है दुहाई
ज्वलंत मुद्दे गौण हो रहे है
धर्म नाम पर वोट पा रहे है।

कब तक मां को ठगते रहोगे
अमीरों के कर्ज माफ़ करते रहोगे
किसानों को देने के लिए नही है
नेताओं की पेंशन बढाते रहोगे
नारी जाति कब सुरक्षित रहेगी
युवाओ को मिलेगा कब रोजगार
सुरक्षित बुढापा बुजुर्गों का होगा
नवनिहालो का पोषण अपार।

दे नही सकते अगर यह सब तुम
कुर्सी को छोड़ दो मेरी सरकार
असली राजा तो जनता ही रहेगी
उसे ही सौंप दो देश का घर द्वार
गणतंत्र का तो यही तकाज़ा है
धर्मनिरपेक्षता दिल से स्वीकार।

      श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

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