Breaking News

महाभारत के युद्ध में ये 6 महान योद्धा होते तो क्या होता?

ऐसे कई योद्धा थे जो महाभारत के युद्ध या कहें कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाग लेने से वंचित रह गए। यह भी कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण की नीति के चलते ही ऐसा हुआ। आओ जानते हैं उन महान योद्धाओं के नाम जो महान युद्ध का हिस्सा नहीं बन सकते और यदि वे इस युद्ध में होते तो युद्ध और भी ज्यादा दिलचस्प हो जाता।

1. जरासंध : जरासंध यदि महाभारत के युद्ध में होता तो युद्ध का रुख कुछ और होता। लेकिन श्रीकृष्ण को मालूम था कि महाभारत का युद्ध होना है उसके पहले ही उन्होंने कई महान योद्धाओं में से एक जरासंध को भी मारने की युक्ति सोच ली थी। उन्होंने भीम के हाथों पहले ही अपने सबसे शक्तिशाली शत्रु को निपटा दिया था। जरासंध को मारने बहुत ही मुश्किल था।

2. शिशुपाल : जरासंध का खास और श्रीकृष्‍ण की बुआ का लड़का शिशुपाल भी बहुत ही शक्तिशाली था। श्रीकृष्ण ने प्रण किया था कि मैं शिशुपाल के 100 अपमान क्षमा करूंगा अर्थात उसे सुधरने के 100 मौके दूंगा। शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था और रुक्मणि के माता-पिता रुक्मणि का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्म ने शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। कृष्ण रुक्मणि का हरण कर ले आए थे। तभी से शिशुपाल कृष्ण का शत्रु बन बैठा। श्रीकृष्ण ने उसके 100 अपराध के बाद उसका वध कर दिया था।

3. एकलव्य : महाभारत काल में प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। हिरण्यधनु के मृत्यु के बाद एकलव्य वहां का राजा बना। विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार एकलव्य अपनी विस्तारवादी सोच के चलते जरासंध से जा मिला था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण करके एक बार यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। बाद में उसका युद्ध श्रीकृष्‍ण से हुआ और वह मारा जाता है।

4. बलराम : भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने श्रीकृष्ण को कई बार समझाया कि हमें युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए, क्योंकि दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही हमारे मित्र हैं। ऐसे धर्मसंकट के समय दोनों का ही पक्ष न लेना उचित होगा। बलरामजी शिविर में जाकर दुर्योधन से कहते हैं कि अब जिस तरफ कृष्ण हों, उसके विपक्ष में कैसे जाऊं? भीम और दुर्योधन दोनों ने ही मुझसे गदा सीखी है। दोनों ही मेरे शिष्य हैं। दोनों पर मेरा एक जैसा स्नेह है। इन दोनों कुरुवंशियों को आपस में लड़ते देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता अतः में तीर्थयात्रा पर जा रहा हूं।

5. कालयवन : पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया। कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा। उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

6. बर्बरीक : बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। बर्बरीक ने कहा- मांगो ब्राह्मण! क्या चाहिए? ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि तुम दे न सकोगे। लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है।

इनके अलावा पौंड्रक, नरकारसुर जैसे कई और भी योद्धा थे जिन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया था। अन्यथा युद्ध का चित्र कुछ और ही होता।

Loading...

About Ankit Singh

Check Also

आज मेष राशि के जातकों के पारिवारिक विवाद का होगा निपटारा व वृषभ राशि वालों को मिलेगा साथी का सहयोग

🔊 खबर सुनने के लिए क्लिक करें आज बुधवार का दिन है। ज्योतिष में बुध ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *