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आँखे

मैं अपने रिजर्वेशन कोच में बैठा, सामने वाली सीट पर कोई नहीं था। मैंने अपना लगेज व्यवस्थित रखा और मोबाइल चलाने लगा, क्यूंकि अभी गाड़ी चलने में दस मिनिट का समय था, आसपास काफ़ी शौर गुल, हो रहा था। कभी चाय वाले की आवाज़ तो कभी ठंडा गर्म,कुछ आवाजे बच्चों के खिलोने बेचने वाले की…मैं ट्रेन की खिड़की से बाहर आते जाते लोगों को देखने लगा, तभी तीन औरते बुरखे में पूरी तरह ढकी हुई।

मेरे सामने वाली सीट पर अपना सीट नम्बर देखने लगी, एक मोबाइल में नम्बर देख कहने लगी यही है, अपना सीट नम्बर, तीनों औरते साथ ही एक चार साल की लड़की और एक दो साल की नन्ही सी बच्ची गोद में थी। वे औरते अपना लगेज जमा रही थी इतने में ट्रेन भी चल दी। छोटी लड़की ने भी अपने सर पर छोटा सा नकाब जैसा बाँध रखा था। दिखने में वह छोटी सी गुड़िया जैसी लग रही थी। पीले कलर का कुरता पायजामा और सर पर सुंदर सा कड़ाई कसीदा वाला हरा कपड़ा बाँध रखा था। भूरी आंखे, छोटी सी लम्बी नाक, गुलाबी होंठ, रंग गोरा होने से वह कलर खिल रहा था उस पर !

छोटी सी लड़की की सुंदरता इतनी आकर्षक थी, कि मैं उसकी ओर ही देखता रहा,छोटी लड़की खिड़की के पास बैठी दादी से इठलाती शर्माती बोली ”मुझे खिड़की के पास बैठना है- दादी जान”, दादी ख़ुद पीछे खिसक गई। उसे खिड़की के पास बैठा दिया दो बुरखे वालियों ने तो अपना अपना बुरखा उतार दिया। किन्तु तीसरी औरत ने अपना बुरखा नहीं उतारा, उसकी शारीरिक बनावट देख ऐसा लग रहा था कि वह एक बाइस तेइस साल की युवती हो।

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मेरे आसपास बैठे यात्री गण अपनी अपनी बातों में व्यस्त हो गए, बच्ची खिड़की के बाहर देखने में मग्न थी। मैं कभी खिड़की से बाहर देखता तो कभी मोबाइल या फिर सामने बैठी उन महिलाओं को, सामने बुरखे में बैठी उस युवती की आँखे गज़ब की सुन्दर लग रही थी। बड़ी बड़ी नीले भूरे रंग पर काले काले रंग का काज़ल ऐसा लग रहा था मानो समुन्द्र के चारों ओर किसी ने ओट बना दी हो, काले रंग के बुरखे में उसके हाँथ मैदे के समान सफ़ेद दिख रहे थे।

पतली पतली उंगलियों में सोने की अंगूठी हांथो की शोभा बड़ा रहे थे, कुछ समय बाद कोई नींद के झोंको में जाने लगा तो कोई मोबाइल में…पर मेरी नज़र तो उसी बुरखे वाली युवती की आँखों की ओर बार बार जा रही थी। उसकी आँखों में अजीब सी कशिश थी,उसे देख ऐसा लग रहा था। जैसे ये #आँखे पहले भी मैं देख चूका हूँ,मैने आंखे बंद की तो.. मेरे कॉलेज की फ्रेंड की आँखे याद आ गई। उसकी आँखे देख कर हमेशा मुझे कामचोर फ़िल्म का गाना याद आ जाता था, “ये आँखे देख कर…. सारी दुनियाँ भूल जाते हैं,..” वह कॉलेज की हर एक्टिविटी में भाग लेती थी, डिबेट में तो माहिर थी, हमेशा आँखों में चमक होंठो पर मुस्कुराहट रहती थी। वह अकसर मुझे बोलती “किसी एक्टिविटी में तो पार्टिसिपेट किया कर! क्या लड़कियों जैसा शर्माता रहता है”, मैं उसकी यह बात सुन मुस्कुरा देता वह हँस कर चली जाती।

बस दो साल ही तो हम साथ पढ़े थे। फिर पता नहीं कहाँ गायब हो गई। चाय वाले की करकश आवाज़ से एक दम आँख खुल गई। मेरी नज़र फिर उसी बुरखे वाली युवती पर पड़ी,वह भी कुछ इस तरह देख रही थी,मानो मुझे पहचानती हो….और बहुत कुछ कहना चाह रही हो…वह मुझे देखती..,तो मैं इधर उधर अपनी आंखे घुमा लेता, जब मैं उसे देखता तो वह अपनी नज़रे फेर लेती। बस यही क्रम चलता रहा….उन तीनों को देख ऐसा लग रहा था जैसे सास अपनी दोनों बहुओ को कहीं ले जा रही हो, बुरखे वाली से बड़ी दिख रही औरत ने बुरखे वाली युवती की ओर इशारा करते हुए कहा, “फरज़ाना सम्भालो अपनी बेटी को अब मेरे पास रो रही है”, फरजाना ने छोटी सी दूध मुही बच्ची को अपने गोद में बैठा लिया, और बॉटल से दूध पिलाने लगी, तभी सास मुंह बनाते हुए बोली,”पता नहीं अकील को इसमें क्या पसंद आया जो इससे शादी कर ली”! “मैंने तो मना किया था, पर मोहब्बत का भूत चड़ा था”, “अब दो-दो लड़कियां पैदा कर दी”…”लड़के का तो अभी तक मुंह नहीं देखा”, फरज़ाना चुप चाप अपनी सास जेठानी की बातें सुन मायूस हो रही थी,चार घंटे के सफर में फरज़ाना के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला…, फरज़ाना की आँखे देख ऐसा लग रहा था, जैसे इस छोटी सी उम्र में उसने जिंदगी के दुःखो को करीब से देख लिया हो,उसकी आँखों में चमक की जगह उदासी ने ले रखी थी, वह इस शादी से ख़ुश नहीं है।

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सास जेठानी की बातें सुन कर तो ऐसा ही मालूम हो रहा था, घर में भी इसके साथ घर वालों का अच्छा व्यवहार नहीं होगा। खैर “मुझे क्या करना?” यह सोच, मैंने खिड़की से बाहर देखा तो स्टेशन आने वाला ही था, पर मुझे यहाँ नहीं उतरना था। अगले स्टेशन पर उतरना था, तो मैं इत्मीनान से बैठा रहा, और सामने वाली सभी औरते उतरने के लिए तैयार हो गई। जब सभी औरतें उतर गई। खाली सीट पर एक कागज़ का टुकड़ा रखा हुआ देखा…मैंने उसे उठाया देख पढ़ा तो आँख भर आई, मैं दौड़ कर ट्रेन के दरवाजे तक पहुंचा उसकी ओर देखा। उसने जब मुड़ कर देखा तो आँखों से आंसू गिरते नज़र आए.., मेरी आँखों से भी आंसू निकल आए। ऐसा लग रहा था, मानो बहुत कुछ बिछड़ गया हो।

कागज़ में लिखा था,”मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती……तुम्हारे साथ पढ़ने वाली…मीनाक्षी..!”

         वैदेही कोठारी

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