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सरकार हुई फेल, किसान डिरेल! 

जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा देकर किसानों को खुशहाल और समृद्ध बनाने का दावा करने वाली मोदी सरकार के विरोध में एकबार फिर किसान आंदोलन कर रहे हैं। नए कृषि क़ानूनों को वापस लेने और फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग को लेकर आंदोलनरत किसानों की तपिश से दिल्ली की सियासत का पारा एक बार फिर चढ़ गया है। किसान इस बार सरकार के साथ दो-दो हाँथ करने पर पूरी तरह से आमादा हैं। पंजाब और हरियाणा से आए हजारों किसान पिछले कई दिन से दिल्ली बार्डर पर डटे हुए हैं। उनके इस आंदोलन ने 32 साल पहले घटित उस घटना की याद दिला दिया, जिसमें किसानों ने दिल्ली के बोट क्लब पर हल्ला बोलकर पूरी दिल्ली को रोक कर दिया था।

आखिर क्या वजह है कि देश का अन्नदाता सरकार के इस नए क़ानूनों का विरोध कर रहा है, वो भी तब जबकि सरकार इसे पूरी तरह से किसानों के हक़ में बता रही है। कई दौर की बातचीत के बावजूद बेनतीजा निकली मैराथन बैठकों से बात बनती नजर नहीं आ रही है, क्योंकि किसान इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा। किसानों के मामले में एकबार फिर केंद्र सरकार विफल साबित हुई है। ऐसा लग रहा है मानों सर्जिकल स्ट्राइक, धारा 370, तीन तलाक, राम मंदिर, विदेशनीति, जन-धन योजना, भ्रष्टाचार, सवर्ण आरक्षण, नागरिकता संशोधन कानून और कोरोना महामारी के दौरान सरकार द्वारा उठाये गए कदमों के बलबूते सफलता की पटरी पर सरपट दौड़ती उसकी रेलगाड़ी अचानक डिरेल हो गयी है।

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के विरद्ध किसानों का यह पहला आंदोलन है। इसके पूर्व 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश लेकर आई थी, जिसके खिलाफ देश भर के किसान सड़क पर उतर आए थे। तब मोदी सरकार ने इस अध्यादेश को लोकसभा से पास भी करा लिया था, लेकिन किसानों का आंदोलन इतना बढ़ गया कि सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था।

वर्ष 2017 में तमिलनाडु के किसान कर्ज माफी, सूखा राहत पैकेज और सिंचाई संबंधी समस्या के समाधान के लिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर महीनों धरने पर बैठे थे। इस दौरान तमिलनाडु के किसानों ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने से लेकर अपना मलमूत्र तक पिया था। बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई.पलानिस्वामी द्वारा आश्वासन मिलने के बाद किसानों ने धरना खत्म कर दिया।

2018 में गांधी जयंती के मौके पर किसान गांधी समाधि पर कार्यक्रम करना चाहते थे, लेकिन किसानों को दिल्ली में दाखिल होने के पहले ही यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर रोक दिया गया। किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठी चार्ज किया, जिसमें कई किसान घायल भी हुए। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान आरएलडी मुखिया चौ. अजित सिंह भी बेहोश हो गए थे। इसके बाद राजनाथ सिंह से मुलाकात और आश्वासन मिलने के बाद किसान वापस लौट गए। यह सब तो महज वो आंकड़ें हैं जो दर्शाता हैं कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद मोदी सरकार का किसानों को खुशहाल और समृद्ध बनाने का दावा उन्हें रास नहीं आ रहा है।

इस नए कानून को लेकर उनका मत है कि इससे किसानों को नुकसान और निजी खरीदारों व बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा। इसके साथ ही किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होने का भी डर सता रहा है। अब जबकि केंद्र सरकार साफ कर चुकी है कि एमएसपी खत्म नहीं की जाएगी, उसके बाद भी किसान बिना कानून वापस लिए पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने, एमएसपी और कन्वेंशनल फूड ग्रेन खरीद सिस्टम खत्म नहीं होगा का लिखित आश्वासन देने और केंद्र सरकार के बिजली कानून 2003 की जगह लाए गए बिजली (संशोधित) बिल 2020 को वापस लेने समेत अन्य मांगों को लेकर आंदोनल कर रहे किसानों को जवान, बुजुर्ग और महिलाओं समेत समाज के हर वर्ग और समुदाय का समर्थन है।

ऐसे में जरूरत है कि सरकार बिना समय गँवाय किसान आंदोलन को समाप्त करने के प्रयासों में जुट जाये ताकि इसका फायदा अन्य दल ना उठा सकें। क्योंकि तब कोई फायदा नहीं होगा जब “अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत” वाली कहावत इनके ऊपर ही लागू हो जाएगी!

Anupam Chauhan

अनुपम चौहान

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