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इंडिया पल्सेस ऐंड ग्रेन्स असोसीएशन ने लगाई गुहार, व्यापारियों का डर दूर करे सरकार

मुंबई। भारत में दालों के कारोबार और का केन्द्रीय संगठन, इंडिया पल्सेस ऐंड ग्रेन्स असोसीएशन (आईपीजीए) ने उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों के दालों के व्यापार पर पड़ने वाले प्रभाव की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। उपभोक्ता मामलों के विभाग (डीओसीए) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के फूड और सिविल सिप्लाई विभाग को 17 मई को आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसी एक्ट), 1955 के प्रावधानों का उपयोग करने के लिए कहा था, जिससे आम जनता को सस्ती कीमत पर सूचीबद्ध खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा सके। उपभोक्ता मामलों के विभाग ने राज्य सरकार को सलाह दी कि वह दालों का स्टॉक रखने वाले कारोबारियों, जैसे कि मिलर्स, आयातकों और कारोबारियों को अपने पास मौजूद स्टॉक की घोषणा करने और इसे सत्यापित करने का निर्देश दें।

आईपीजीए के उपाध्यक्ष बिमल कोठारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि, इन निर्देशों ने कारोबारियों में डर पैदा किया है। अब वह घरेलू उपज खरीदने के साथ दालों को आयात करने का ऑर्डर देने में भी हिचकिचा रहे हैं। इस सरकारी कदम से अरहर (तुअर), उड़द और मूँग की दालों के आयात पर लगी पाबंदी हटाने का सरकार का असली मकसद पूरा नहीं हो सका है।

श्री कोठारी ने कहा कि, 2020-21 के फसली वर्ष के लिए कृषि मंत्रालय की वेबसाइट से प्राप्त तीसरे अग्रिम अनुमानित आंकड़ों के अनुसार अरहर दाल के उत्पादन में करीब 7 लाख मीट्रिक टन की गिरावट आने का अनुमान है। उड़द दाल का उत्पादन 5.20 लाख मीट्रिक टन कम होने का अंदाजा है। कुल मिलाकर खरीफ की फसल में 2.12 मिलियन मीट्रिक टन की कमी आने की आशंका जताई गई है। हालांकि कारोबारी अनुमानों के अनुसार अरहर दाल का उत्पादन 2.90 मिलियन मीट्रिक टन, उड़द दाल का करीब 2.06 मिलियन मीट्रिक टन, मूँग दाल का लगभग 2 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान है। चने की दाल का उत्पादन करीब 9 मिलियन मीट्रिक टन और मसूर की दाल का उत्पादन करीब 0.95 मिलियन मीट्रिक टन रहने का अंदाजा लगाया गया है। कोरोना महामारी के मौजूदा प्रकोप के मद्देनजर आईजीपीए ने आगामी फसली वर्ष के लिए दालों के उत्पादन में और कमी आने की आशंका व्यक्त की है। आईपीजीए का मानना है कि दालों के कारोबार की सर्वोच्च संस्था होने के नाते आईपीजीए की यह जिम्मेदारी बनती है कि इस तथ्य से सरकार को पहले ही अवगत कराए।

उन्होंने कहा, सरकार का उद्देश्य किसानों की आमदनी को डबल करना है और यह तभी संभव है, जब कारोबारियों को केंद्र और राज्य सरकार की बलपूर्वक कार्रवाई का डर न रहे और वह बिना डर के उपज को खरीद सकें। इसके अलावा सरकार आम आदमी को दालों जैसे सूचीबद्ध खाद्य पदार्थ सस्ते दामों पर उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना चाहती हैं। व्यापारियों को डर है कि वैध तरीके से हासिल किया गया स्टॉक भी निगरानी में आ जाएगा। ईसी एक्ट के दायरे में कारोबारियों का कोई गलती न होते हुए भी उनकी गतिविधियाँ गैरकानूनी बन जाएंगी। इसलिए उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग को इस मामले में स्पष्टीकरण जारी करने की जरूरत है कि उनकी मंशा सिर्फ नीतिगत उद्देश्यों से व्यापार के लिए रखे गए स्टॉक की निगरानी करने की है। इससे कारोबारियों के डर को दूर करने में मदद मिलेगी।

खुदरा बाज़ार में दालों की बढ़ती कीमत के बारे में कोठारी ने कहा कि, “सरकार को खुदरा बाजारों में दालों की कीमतों पर बारीकी से निगाह रखने की जरूरत है। पिछले कुछ सालों से आईपीजीए खुदरा मार्केट के मुकाबले थोक और एक्स-मिल लेवल पर दालों की कीमतों पर नजर रख रहा है। हमने यह पाया कि रिटेल मार्केट में दालों के दाम परंपरागत रूप से थोक और एक्स-मिल कीमतों से औसतन 50 रुपये किलो ज्यादा है। इस समय औसत थोक मार्केट में अरहर दाल की कीमत करीब 95 रुपये, उड़द की दाल की कीमत 110 रुपये और मूँग की दाल की कीमत 92 रुपये किलो है। वहीं औसत रिटेल मार्केट में अरहर दाल 130 रुपये किलो, उड़द की दाल 160 रुपये प्रति किलो और मूँग की दाल 115 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रही है। हालाँकि दाल की बढ़ती कीमतों पर जब कभी चर्चा होती है तो इसका सारा दोष रिटेलर्स पर न डालकर कारोबारियों पर डाला जाता है। इसे बदलने की जरूरत है। रिटेल सेगमेंट को भी बढ़ती कीमतों के लिए जवाबदेह ठहराना चाहिए और इसकी भी निगरानी होनी चाहिए। आईपीजीए के इस अनुरोध को इस तथ्य से भी बल मिला है कि आरबीआई ने अपनी सालाना रिपोर्ट में दालों के थोक और खुदरा बाजार के मूल्यों में लगातार बढ़ते बहुत बड़े अंतर पर चर्चा की है।

आईजीपीए ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछसुझाव दिया है, जिसे सरकार और विशेषकर उपभोक्ता मामला विभाग द्वारा आरम्भ किया जा सकता है

  • दालों का अधिकतम खुदरा मूल्य तय किया जाना चाहिए, जिससे दालों को अस्वाभाविक रूप से बहुत ऊँचे दामों पर उपभोक्ताओं को न बेचा जा सके। डीओसीए की वेबसाइट पर थोक कारोबारियों और रिटेलर्स की ओर से रोजाना अपलोड किए गए आंकड़ों के आधार पर यह कदम उठाया जा सकता है।
  • आईजीपीए ने सरकार से दालों पर आयात कर लगाने जैसे विकल्पों के प्रयोग की संभावना का पता लगाने का आग्रह किया है, जिससे घरेलू किसानों के साथ उपभोक्ताओं के हितों की भी रक्षा की जा सकेगी। सरकार आयात की जाने वाली दालों पर इस स्तर तक ड्यूटी लगा सकती है कि आयात की गई दालों का मूल्य एमएसपी से ज्यादा हो जाए। इस तरीके से जब आयात की गई दालों की कीमत एमएसपी के बराबर या उससे ज्यादा रहेंगी तो कारोबारी घरेलू उपज खरीदने की ओर ध्यान देंगे। अगर कुछ कमी रहती है तो वह किफायती कीमत पर दालों की उचित उपलब्धता सुनिश्चित करने और डिमांड और सप्लाई के अंतर को पाटने के लिए दालों का आयात भी कर सकेंगे।
  • आईजीपीए ने सरकार से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि नीतिगत ढांचे में किसी तरह के बदलाव को कम से कम 6 से 9 महीने की अवधि तक बरकरार रखा जाए, ताकि कोई ऐसी अटकलें न लगाई जा सकें, जिससे भारत और विदेश में दालों की कीमतों पर कोई प्रभाव पड़े और कारोबार सुगम और सक्षम तरीके से चलता रहे।

आईजीपीए ने यह भी कहा कि सरकार को नीतियों का मसौदा तैयार करते हुए उन प्रमुख कारकों का भी ध्यान रखना होगा, जिससे दालों की उपलब्धता पर नजर रखी जाती है। इसमें से कुछ कारक इस प्रकार हैं।

  • घरेलू उत्पादन।
  • विदेशों में दालों के उत्पादन और फसलों की कटाई का समय।
  • उपज का अनुबंध करने से लेकर मूल देशों से भारत तक समुद्र मार्ग से आने में लगने वाले समय जैसे लॉजिटिक्स से संबंधित मुद्दे।
  • विदेश से दालों को खरीदने वाले दूसरे देशों पर भी नजर रखी जानी चाहिए। इससे भारत के लिहाज से इस खाद्य पदार्थ का आयात करने की संभावित उपलब्धता का पता चलेगा।
  • भारत और विदेश में फसल की बुआई, कटाई और रसद पर कोरोना महामारी के प्रभाव का पता लगाया जाना चाहिए।

श्री कोठारी ने आगे बताया कि, हम चाहते हैं कि सरकार इस तथ्य को पहचाने कि दालों के कारोबारी खेत से खाने की टेबल तक दालों को पहुँचाने की वैल्यू चेन से जुड़ी एक मुख्य कड़ी है। अगर कारोबारी किसानों से दालें नहीं खरीदेंगे तो इससे सीधे उनकी कमाई पर असर पड़ेगा और इसका नतीजा यह होगा कि उपभोक्ताओं को कम आपूर्ति मिलेगी। इससे रिटेल मार्केट में दालों में कमी आएगी और इसकी कीमतें काफी बढ़ जाएंगी, जिससे यह उपभोक्ताओं के बजट के बाहर हो जाएंगी।

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