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राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित पत्रकारिता

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

ब्रिटिश काल में हिंदी का समाचार पत्र प्रकाशित करना क्रांतिकारी कदम था. भारतीय भाषाओं से अंग्रेज आशंकित रहते थे .उन्हें लगता था कि भारतीय भाषा के समाचार पत्र भारत की राष्ट्रीय चेतना का जागरण करेंगे .इसलिए उन्होंने किसी समाचार पत्र के संचलन हेतु आवश्यक सभी संसाधन अंग्रेजों को ही सुलभ कराए थे .भारतीयों के लिए यह सब बहुत महंगे हुआ करते थे .इसके अलावा प्रकाशित सामग्री पर भी अंग्रेजों की पैनी नजर रहती थी .ऐसे में भारतीय य़ह जोखिम उठाने से बचते थे .दूसरी तरफ ऐसे लोग भी थे जो ब्रिटिश नियमों को सीधी चुनौती देने का हौसला रखते थे .समाचार पत्र निकालना इनके लिए व्यवसाय नहीँ बल्कि मिशन था .उनके लिए य़ह राष्ट्र भाव को जागृत करने का माध्यम था.

जुगल किशोर शुक्ल ऐसे लोगों में शुमार थे .वहीं जानते थे कि ब्रिटिश सत्ता ईसाई मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा उपलब्ध कराती है. किन्तु भारतीय इस सुविधा से वंचित है .किन्तु जुगल किशोर ने उदन्त मार्तण्ड समाचार पत्र का प्रकाशन 30 मई,1826 को कलकत्ता से शुरू किया .उदन्त मार्तंड को किसी प्रकार की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। डेढ़ साल बाद इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। ३० मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। य़ह दुनिया का प्रथम हिन्दी समाचार पत्र था.य़ह ज्यादा दिनों तक नहीँ चला .लेकिन परतंत्रता के दौर में इसने राष्ट्रीय चेतना का संचार किया था .इसका प्रकाशन नारद जयन्ती पर शुरू हुआ था .य़ह भी भारतीय राष्ट्रवाद के अनुरूप था .आज मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है।

भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। उनकी सभी बात आज के मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है। भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है। यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादीदियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है।

इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा। वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया। वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना एजेंडा बना लिया। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर उन्होंने यह विचार फैलाया की हिन्दू शोषक और मुसलमान शोषित है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल की राजनीतिक हिंसा उन्हें दिखाई नहीं देती। किंतु कुछ लोग मजहब के आधार पर समाजविरोधी कार्य करें, यह कानून को अपने हाँथ में लेने की कोशिश करें, तो इसे भगवा आतंकवाद के रूप में प्रसारित किया जाता है।

सामाजिक व सांस्कृतिक वर्ग संघर्ष का प्रचार सुनियोजित ढंग से किया गया। फिल्मों में वर्ग विशेष के लोगों को इबादत करने वाला, सदैव सच बोलने वाला, नेक इंसान बताया जाता है, वही हिंदुओ को विभाजित करके दिखाया जाता है, इसमें ब्राह्मण को हास्यस्पद रूप में, क्षत्रिय को अत्याचारी और वैश्य को व्यापार में गड़बड़ी करने वाला दिखाया जाता है। सत्तर के दशक तक केवल प्रगतिशील लोगों को ही बौद्धिक या श्रेष्ठ पत्रकार माना जाता है। धीरे धीरे इसमें बदलाव आना शुरू हुआ। राष्ट्रवादी पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति और मूल्यों को महत्व दिया। उदारीकरण ने भी स्थिति बिगाड़ी है। किस मीडिया संस्थान में विदेश की कितनी पूंजी लगी है, इसे कोई नहीं जानता। यह एक प्रकार का संकट है। इसका असर भी दिखाई दे रहा है। भाषा शैली सभी पर इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। स्वतंत्रता के बाद ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हींनभावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है .वर्तमान मे प्रदूषण केवल पर्यावरण का ही नहीं सांस्कृतिक भी है। पश्चिमी और पूंजीवादी विचार में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति होती है। मीडिया में इनका वर्चस्व हो रहा है।

राष्ट्रवादी पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति और मूल्यों को महत्व दिया। उदारीकरण ने भी स्थिति बिगाड़ी है। किस मीडिया संस्थान में विदेश की कितनी पूंजी लगी है, इसे कोई नहीं जानता। यह एक प्रकार का संकट है। इसका असर भी दिखाई दे रहा है। भाषा शैली सभी पर इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है. अंग्रेजी का महत्व बढ़ना और हिंदी के महत्व का कम होना चिंता का विषय है। मदर्स,फादर्स के नाम पर एक दिन का आयोजन यूरोप की सोच है। यह भी सांस्कृतिक प्रदूषण है। हमारे यहां प्रतिदिन माता पिता के सम्मान होता है। पूर्वाग्रह से कभी सही दिशा नहीं मिलती। जैसे असिष्णुता अभियान चलाने वाले लोग पूर्वाग्रह से पीड़ित थे। ये वही लोग थे जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ थे। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले यही लोग राष्ट्रपति से मिले थे। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया था। यह विचार संविधान और प्रजातंत्र के विरुद्ध था। कल्चर छोटा शब्द है, संस्कृति व्यापक होती है . पहले आंगन में तुलसी जी का विरवा होता था। पूरा परिवार आंगन के चारो ओर रहता था। कमरे से बाहर आते ही संस्कृति शुरू होती है। जेएनयू हमारे देश में है। वामपंथी बुद्धिजीवी हिन्दू धर्म की निंदा करते है,ज्ञानव्यापी को लेकर अमर्यादित टिप्पणी करने है .लेकिन उन्हें रोका नहीं जाता . यह सहिष्णुता नहीं, दूसरों की भावनाओं पर हमला है। इस प्रकार की सहिष्णुता केवल हिन्दू धर्म के विरुद्ध ही क्यों होती है, इस पर भी विचार होना चाहिए।

भारत जैसी सहिष्णुता विश्व में कहीं नहीं है। यह ऐसा अकेला देश है जिसने अपने आक्रान्ताओ से भी घृणा नहीं की। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आस्था को लेकर जाहिल अंदाज में टिप्पणी की जाए .ऐसा करने वालों की भी किसी न किसी के प्रति आस्था होगी .उन्हें दूसरे के प्रति ऐसा व्यवहार नहीँ करना चाहिए जो इसने अपने लिए पसन्द न हो .इतनी सभ्यता और मर्यादा का पालन तो सभी लोगों को करना चाहिए .राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति आत्मगौरव होना चाहिए। वामपंथी विचारकों और पत्रकारों ने सदैव भारत के राष्ट्रवादियों पर हमला किया है .वीर सावरकर महान राष्ट्रवादी थे .उन्होंने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। अंग्रेजों ने उन्हें बहुत यातना दी। लेकिन भारत के वामपंथी लेखकों, पत्रकारों ने उनकी सदैव निंदा की। यही लोग सोवियत संघ,चीन, क्यूबा आदि कम्युनिस्ट देशों में लाखों लोगों की हत्या की भी कभी आलोचना नहीं करता। ये लोग ईसाई मिशनरी के विरोध में कुछ नहीं बोलते। हिन्दू संघठन सदैव इनके निशाने पर रहते है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खिलाफ बोलना तो इनके लिए अनिवार्य होता है। लेकिन किसी मजहबी संघठन से इनको शिकायत नहीं होती। कम्युनिस्ट देशों में मीडिया सरकार के नियंत्रण में रहता है।

भारत के वामपंथी अभिव्यक्ति की आजादी और सहिष्णुता का दावा करते है। कम्युनिस्ट व्यवस्था में मीडिया की कोई हैसियत नहीं होती। वैश्वीकरण के बाद भारत मे मीडिया के दो रूप उभरे है। एक पश्चिम सभ्यता से प्रभावित मीडिया है। दूसरा राष्ट्रवादी मीडिया है। यह भारतीय संस्कृति के अनुरूप कार्य करता है। पत्रकारिता संस्कृति की संवाहक होती है। ऐसे में इसका भारतीय मूल्यों के अनुरूप अपरिहार्य है। संस्कृति से मनुष्य की मानसिक और सभ्यता से भौतिक क्षेत्र की जानकारी मिलती है। भारत की पत्रकारिता को श्रेष्ठ होना है तो उसे भारतीय मूल्य स्वीकार करना होगा। भारत में महिला शक्ति का बहुत सम्मान दिया गया। जबकि पश्चिमी सभ्यता में नारी को उपभोगवादी मानसिकता से देखा गया। उसी के अनुरूप फिल्मों में नारी को दिखाया जा रहा है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में भी इसका असर है . मीडिया के विज्ञापनों में अक्सर नारी की छवि मर्यादित दिखाई जा रही है। भारत के समाज को असहिष्णु बताने के अभियान को मीडिया ने ही हवा दी थी। जबकि मीडिया को यह बताना चाहिए था कि भारतीय चिंतन में असहिष्णुता संभव ही नहीं है। जिस दिन यह विचार प्रभावी होगा, उसके सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगेंगे।पत्रकारिता अपनी संस्कृति से अलग होकर कल्याणकारी नहीं हो रही है। यह अच्छा है कि भारतीय पत्रकारिता में राष्ट्रवादी लोगों की संख्या बढ़ रही है।

भारत में प्राचीन काल से सकारात्मक संवाद का महत्व रहा है। प्रश्न जिज्ञासा व तर्क विर्तक से दर्शन यात्रा आगे बढ़ती रही। वर्तमान समय में संवाद के क्षेत्र में व्यापक बदलाव हुए है। तकनीक के चलते संवाद सम्प्रेषण आसान हुआ है। किंतु सकारात्मक संवाद के शाश्वत मूल्य यथावत है। इसमें विश्वसनीयता के साथ साथ समाज व राष्ट्र का हित भी समाहित रहता है। संवाद में सामाजिक सरोकार होना चाहिए। ऐसा संवाद देश काल की सीमा तक सीमित नहीं रहता है। भारतीय परिवेश के संवाद ने उच्च प्रतिमान स्थापित किये है। जबकि वामपंथी रुझान की संवाद में नकारात्मक तत्व भी रहते है। उसमें राष्ट्र के हित का आग्रह नहीं रहता है। भारत का इतिहास लिखते समय कुछ विशेष लोगों पर ही ध्यान दिया गया। अन्य महत्वपूर्ण योगदानों को इतिहास का हिस्सा नहीं बनाया गया। इसलिए इतिहास में सभी के योगदान का उल्लेख आवश्यक है। भारत का इतिहास सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं है। यह आदिकाल से भारतीय संस्कृति की यात्रा है। भारत का इतिहास ऐतिहासिक इमारतों के साथ संस्कृति,परंपराएं, संस्कार और जीवन मूल्यों को संजोए हुए है।

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