रामलीला से जीवन होती है कथा

रामलीला रामलीला मात्र मनोरंजन के लिए नहीं होती है। बल्कि इससे समाज को मर्यादा पालन की शिक्षा मिलती है। इसमें भारतीय दर्शन का कर्मफल सिद्धांत भी समाहित है। अयोध्या जी में चल रही भव्य रामलीला के दूसरे दिन इसी का सन्देश दिया गया। राजा दसरथ व कौशल्या ने पूर्व जन्म में हजारों वर्ष तप किया था। प्रभु ने प्रकट हो कर वर मांगने को कहा था। उन्होंने प्रभु को ही पुत्र रूप में प्राप्त करने का वर मांगा था। गुरु वशिष्ठ ने पुत्र प्राप्ति के लिए उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने का परामर्श देते हैं। राजा दशरथ शृंगी ऋषि को बुलाकर पुत्रेष्टि यज्ञ करते हैं। यज्ञ के बाद अग्नि देव प्रकट होकर राजा को प्रसाद देते हैं। जिसके प्रताप से महाराज को चार पुत्रों की प्राप्ति होती है। गुरु वशिष्ठ ने उनका नाम राम,लक्ष्मण,भरत व शत्रुघ्न रखा।  गीता में भगवान कृष्ण कहते है-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसी दास लिखते है- काहु न कोऊ सुख दुख कर दाता,  निज कृत कर्म भोगि सब भ्राता।। इस प्रसंग का भाव भी यही है। महाराज दशरथ चक्रवर्ती सम्राट थे। स्वयं परमात्मा प्रभु राम उनके पुत्र बन कर आये थे। ऐसे प्रतापी महाराज दशरथ को भी कर्म फल भोगना पड़ा। दशरथ के द्वारा अनजाने श्रवण कुमार का वध हो जाता है। उसके बाद अंधे माता पिता ने दशरथ को श्राप दिया। उसी श्राप के परिणाम स्वरूप उनको भी पुत्र राम के वियोग में अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ा। श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा पर कांवड़ के माध्यम से ले जा रहे थे।

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साभार दूरदर्शन

अयोध्या के समीप जंगल में वह लोग रात्रि विश्राम हेतु रुके थे। श्रवण कुमार माता पिता के लिए नदी से पानी लेने चले गए। उस समय राजा दशरथ शिकार हेतु निकले थे। श्रवण कुमार पात्र में जल भर रहे थे। दशरथ जी ने समझा कि कोई जंगली जानवर जल पी रहा है। उन्होंने शब्दभेदी वाण चला दिया। तीर श्रवण कुमार के सीने में लगता है। जब राजा दशरथ श्रवण के माता पिता के पास पहुंचते है। घटना को सुनकर दोनों विलाप करते है। वह राजा दशरथ को श्राप देते है- राजन तूम भी हमारी ह तरह पुत्र वियोग में तड़प कर प्राण त्याग करोगे।

रिपोर्ट-डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
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