Cherrapunji : बारिश के साथ साथ और भी बहुत कुछ है खास

पहाड़ों पर बरसात का मौसम बहुत ही खूबसूरत और रोमांटिक होता है। चेरापूंजी में 12 महीने बरसात होती है। ऐसे में यहां के मौसम के तो कहने ही क्या। सबसे ज्यादा बारिश का रिकॉर्ड दर्ज होने की वजह से चेरापूंजी ( Cherrapunji ) को ”वेटेस्ट प्लेस ऑफ द वर्ड” तथा ”बारिश की राजधानी” भी कहा जाता है।

साल भर टूरिस्ट्स का आना-जाना : Cherrapunji

सदाबहार मौसम के कारण ही यहां साल भर टूरिस्ट्स का आना-जाना लगा रहता है। मेघालय की राजधानी शिलांग से चेरापूंजी केवल 56 किमी दूर है। मंजिल तक पहुंचने के लिए ऊंची-नीची पहाडि़यों और टेडे-मेडे रास्तों से गुजरना पड़ सकता है।

चेरापूंजी के चारों तरफ पहाड़ और घाटियां हैं। यहां फर्न, चीड़ और ऐरोकेरिया के पेड़, कई तरह के लोकल फ्रूट्स, संतरा और अन्नानास बहुत होते हैं। कुछ खास किस्म की घास और फूल भी देखने को मिलते हैं। यहां की खासी जाति का मुख्य व्यवसाय जंगली उपज ही है। ये लोग सौंदर्य प्रेमी होते हैं। कलात्मक कपड़ों, शालों व सजावटी चीज़ों को बनाते हैं और उन्हें बेचते भी हैं। इनके घर बड़े सुंदर होते हैं, जिन्हें ये सजाकर रखते हैं।
अपनी धरती, धर्म, समाज और रीति-रिवाज के प्रति ये बहुत ही आस्थावान होते हैं।

फिर से सोहरा हो गया

मेघालय आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के इस पसंदीदा जगह का नाम अब बदल गया है। इसका नाम पहले भी सोहरा था और अब फिर से सोहरा हो गया है। ब्रिटिश शासकों ने सन् 1830 में चेरापूंजी को अपना क्षेत्रीय मुख्यालय बनाया था। अंग्रेजों को इसके तत्कालीन नाम सोहरा के उच्चारण में काफी दिक्कत होती थी। वे लोग इसे चेरा कहने लगे। उसके बाद स्थानीय लोगों ने बादलों के समूह को देखते हुए इस नाम में पूंजो जोड़ दिया जो बाद में चेरापूंजी हो गया, लेकिन चेरापूंजी को उसका असली नाम देने की मांग जोर पकड़ने लगी और जन आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने इसका नाम बदल कर फिर से सोहरा करने का फैसला किया।

61 इंच बारिश का रिकॉर्ड

चेरापूंजी या सोहरा के नाम बारिश के कई रिकॅार्ड दर्ज है। गिनीज बुक ऑफ वर्ड रिकॉर्ड के अनुसार यहां एक ही साल में सबसे ज्यादा बारिश 22 हजार 987 मि.मि. एक अगस्त 1860 से जुलाई 1861 के बीच हुई थी। एक महीने में सबसे ज्यादा बारिश भी जुलाई 1861 में 9300 मि.मि. दर्ज की गई। एक दिन में सबसे ज्यादा 61 इंच बारिश का रिकॉर्ड भी सोहरा के नाम ही दर्ज हैं। इन सबके बावजूद पिछले कुछ सालों से यहां बरसात कम होने लगी हैं और मोहसिनराम में यहां से अधिक वर्षा होती है। खैर, बारिश कम हो या ज्यादा, लेकिन होती बहुत खूब हैं। अपनी अद्भुत व आकर्षक नैसर्गिक छटा के कारण ही चेरापूंजी के आसपास स्थित झरने और नेचुरल ब्यूटी टूरिस्ट्स को लुभाती रही है।

लिकाई नाम की महिला

चेरापूंजी की सबसे आकर्षक जगह है नोहकलिकाई जलप्रपात, काफी उंचाई से गिरता यह दूधिया झरना अपने में एक मार्मिक कथा समेटे हुए है। कहते हैं कि लिकाई नाम की एक महिला जब एक दिन अपने काम पर से घर लौटी तो उसने अपने बच्चे के लिए पति से पूछताछ की। पति ने कहा कि बच्चे को काट कर खाने के लिए पका लिया है। सुनते ही लिकाई सदमे से भर गई और इस झरने में कूद पड़ी। तभी से इस झरने का नाम नोहकलिकाई पड़ा । वैसे तो व्यू प्वाइंट से झरने का समग्र स्वरुप देखा जा सकता है, लेकिन ठेठ नीचे तक जाने के लिए सीढि़यां भी बनी हुई हैं।

बूटियों से दवा बनाने का काम

चेरापूंजी में एक सबसे पुराना रामकृष्ण मिशन संस्थान है। यहां के विद्यार्थी हिंदी, अंग्रेजी, खासी, बंगला भाषाओं के ज्ञाता हैं। यहां ऊनी कपड़े, कलात्मक वस्तुएं, जड़ी बूटियों से दवा बनाने आदि का काम होता हैं। पूरा संस्थान अपनी भव्यता, शांति, सफाई और अलग-अलग एक्टिविटीज के लिए मशहूर है।

चूने के पत्थरों के साथ पानी

चेरापूंजी से 5 किमी. दक्षिण में बसा नोह संगीथियांग प्रपात और मौसमाई प्रपात है। मौसमाई ग्राम के निकट जंगल में गुफाएं प्रकृति की अपनी विशिष्ठ रचना है। यहां चूने के पत्थरों के साथ पानी के मेल से अजीबोगरीब अश्चुताष्म एवं निश्चुताष्म आकृतियां बन गई है, जो पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती हैं। गुफा में घुटनों तक पानी भरा होता है। पत्थरों की उंची-नीची, चिकनी और तीखी, कहीं संकरी और कहीं चौड़ी आकृतियों पर चलना, चढ़ना डराता भी है और रोमाचिंत भी करता है।

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