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सी०ओ०पी०डी डिजीज बहुत ही गंभीर समस्या

फेफड़े की होने वाली बीमारियों में क्राॅनिक आॅब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सी०ओ०पी०डी) एक बहुत ही गंभीर समस्या है। इसे बोलचाल की भाषा में क्राॅनिक ब्राॅन्काइटिस भी कहते हैं। तापमान में कमी होते ही क्राॅनिक ब्राॅन्काइटिस के मामले काफी बढ़ जाते हैं तथा जो लोग पहले से ही इस बीमारी से ग्रसित हैं उनकी बीमारी बढ़ जाती है। बावजूद इसके अगर हम कुछ सावधानी रखें तब इस रोग का रोकथाम संभव है।
सी०ओ०पी०डी० प्रमुख रूप से धुम्रपान, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का या चिलम पीने वालों को होता है साथ ही साथ वैसे व्यक्ति जो कि धूल, धुंआ और प्रदूषित वातावरण तथा सिगरेट, बीड़ी आदि पीने वालों के साथ रहते हैं उनमें भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। सी०ओ०पी०डी० 30-40 साल की अवस्था के बाद शुरू होती है तथा ठंढ का मौसम आते ही यह तकलीफ का कारण बनने लगती है।
लक्षणः-
ऽ    शुरूआत में केवल सुबह ही खंासी आती है परन्तु बाद में यह पूरे समय होने लगती है तथा खांसी के साथ बलगम भी निकलने लगता है।
ऽ    सर्दियों की शुरूआत के साथ ही यह समस्या बढ़ने लगती है तथा बीमारी बढ़ने पर रोगी की सांस फूलने लगती है।
ऽ    शरीर का वजन घट जाता है। लगातार खांसी आने से पसलियो ंमे ंदर्द तथा कभी-कभी उल्टी भी हो जाती है।
कारणः-
ऽ    जैव ईंधन का दुष्प्रभाव,
ऽ    वायु प्रदूषणका बढ़ता स्तर,
ऽ    मिल या फैक्टरी के आसपास रहने के कारण ,
ऽ    मोस्क्विटो रिंपेलेंट
ऽ    स्ंाक्रमण ( वायरस,बैकटिरिया, कवक) कई वायरस है जो सी०ओ०पी०डी० का कारण बनते है जैसे इनफुएंजा ए तथा बी वायरस जीवाणु माइकोप्लाज्मा निमोनिया भी कभी कभी सी०ओ०पी०डी० का कारण बनता है।
ऽ     धुम्रपान करने वाले तथा उनके आस पास रहने वाले लोगों में भी यह खतरा अधिक होता है एवं वैसे लोग जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है उनमें भी यह समस्या बढ़ जाती है।
ऽ    तापमान  परिवर्तन
ूूूूूूूूजांचः-
ऽ    स्पाइरोमेट्री या च्थ्ज्
बचावः-
ऽ    सर्दी से बचकर रहें।
ऽ    पूरी बांह के कपड़े पहनें
ऽ    हाथो ंको साबून से धोयंे।
ऽ    गुनगुने पानी से स्नान करें।
ऽ    सर्दी, जुकाम, खांसी के रोगी सुबह-शाम स्टीम या भाप लें।
ऽ    संक्रामक बीमारियों से बचें।
ऽ    फ्लू या अन्य संक्रमित व्यक्तियों से दूर रहें।
ऽ    खांसते-छींकते समय मुंह-नाक ढ़ंक कर रखें।
ऽ    सी०ओ०पी०डी० मेें धुम्रपान छोडने या प्रदुषित वातावरण को छोडने वाले रोगियों को काफी फायदा होता है। ग्रामीण महिलाओं को लकडी, कोयला, या गोबर के उपलों के जगह गैस पर खाना बनाना चाहिये।
होमियोपैथिक उपचार
होमियोपैथिक दवाओं के प्रयोग से सी०ओ०पी०डी० पर काफी आसानी से काबु पाया जा सकता है । होमियोपैथिक दवाओं के प्रयोग से रोगी की प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है।
होमियोपैथिक दवाओं  मे प्रमुख हैं आर्सेनिक एल्ब, ब्रायोनिया, नेट्रम सल्फ, पोथस, एंटिम टार्ट, संबुकस, अरेलिया रेसिमोसा, सेनेगा,  आर्सेनिक आयोड, फास्फोरस इत्यादि।
नोटः
ऽ    घर बैठे कुरियर या डाक द्धारा दवा भेजने की सुविधा उपलब्ध है।
ऽ    चिकित्सक के सलाह के बिना होमियोपैथिक दवा का सेवन नहीं करना चाहिये।

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