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ओए पापा, बड्डी, यार मान जाओ ना

जैसा कि शीर्षक को पढ़ने से ही समझ आ रहा है कि यह वाक्य या वाक्यांश किसी बच्चे द्वारा अपने पिता के लिए बोला गया है, जिसमें बच्चा अपनी किसी बात को मनवाने के लिए अपने पिता से आग्रह कर रहा है। इस तरह के अनेक वाक्य हम सभी के घरों में अक्सर सुने जा सकते हैं वर्तमान समय में इस प्रकार के वाक्यांश बोलना और सुनना अति साधारण हो गया है या यूं कहे की नई जनरेशन के बच्चे अपने माता-पिता को अपने माता पिता और अभिभावक कम और दोस्त अधिक समझने लगे हैं। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अपने जन्म देने वालों को भी दोस्त मानने वाली आज की मॉडर्न जेनरेशन धीरे-धीरे यह भूलती जा रही है कि उनके माता-पिता उनके दोस्त अवश्य हो सकते हैं किंतु ,केवल दोस्त नहीं हो सकते। यह बात उन्हें समझनी ही होगी ,अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे रिश्तों को अपनी सुहुलियत के हिसाब से प्रयोग करना शुरू कर देंगे। हर रिश्ते को दोस्ती का जामा पहनाना किसी भी तरीके से उचित एवं तर्कसंगत नहीं माना जा सकता ।दोस्ती ,फ्रेंडशिप अपनी जगह..मित्रता और यारी का भी अपना एक विशेष दायरा होता है । जिस प्रकार खून के संबंधों की दोस्ती के रिश्ते से तुलना नहीं करनी चाहिए उसी प्रकार दोस्ती के संबंध की भी खून के संबंधों से कतई तुलना नहीं की जा सकती।

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आज के आधुनिक कहे जाने वाले युग में हम सभी इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि हम सभी के घरों में हमारे बच्चे हमारे साथ इस कदर घुले मिले होते हैं कि अक्सर संबंधों की सीमा और दायरे को भूल जाते हैं और घर के सभी सदस्यों से दोस्ती का रिश्ता समझने लगते हैं ।वे यह भूल जाते हैं कि खून से जुड़े रिश्तों का अपना एक विशेष नाम होता है,अर्थ होता है,गरिमा होती है। इसमें गलती किसी भी प्रकार से हमारे बच्चों की नहीं होती अपितु हम माता-पिता और अभिभावक भी इस स्थिति के उतने ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम अक्सर अपने बच्चों को इतनी छूट और आजादी दे देते हैं कि वे रिश्तो को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ सके और उनकी गरिमा को ताक पर रखकर उनका प्रयोग कर सकें ।ऐसा अक्सर हम लाड प्यार में करते हैं ।यह कर कर हम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह साबित करना चाहते हैं कि हम अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार होते हैं।
स्वाभाविक सी बात है कि सभी माता-पिता अपने बच्चों से बेहिसाब प्यार करते हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते। उनकी सभी छोटी बड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे अपना सर्वस्व त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं। सामान्यता,सभी माता पिता दुनिया की हर खुशी को भी अपने बच्चों के कदमों में रख देना चाहते हैं।उनके बच्चों को किसी प्रकार की कोई कमी या अभाव न खलने पाए ,इसके लिए वे जी तोड़ मेहनत करते हैं और उनकी हर आवश्यकता को पूरी करने का हर संभव प्रयास भी करते हैं।
लेकिन स्थिति अगर प्यार लाड़ करने और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने तक हो तो समझ आती है, किंतु जब यही लाड़ प्यार बच्चों को अपनी मनमर्जी से कुछ भी सही गलत करने के लिए आजादी दे देता है तो इस पर रोक लगानी आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य हो जाती है।ऐसा न होने की स्थिति में बच्चों का नैतिक पतन होने लगता है जिस का नकारात्मक प्रभाव उनके सर्वांगीण विकास पर भी पड़ने लगता है।
अक्सर जब बच्चों को आवश्यकता से अधिक लाड प्यार और दुलार मिलने लगता है तो वे रिश्तों से जुड़ी अपनी सीमाओं को भूल जाते हैं और रिश्तों को ताक पर रखना शुरू कर देते हैं क्योंकि उस स्थिति में उन्हें रोकने टोकने वाला,समझाने वाला,गलत सही में फर्क बताने वाला कोई नहीं होता है ।वे अपनी ख़ुद की मर्जी के हिसाब से ,अपने मन मुताबिक रिश्तों को नई संज्ञा,नया नाम देना शुरू कर देते हैं, रिश्तों के लिए वे अपनी खुद की ही शब्दावली इजाद कर लेते हैं। अबे, ओए,अरे,यार, बड्डी जैसे शब्द आजकल उनकी आम बोलचाल की भाषा के शब्द बन चुके हैं, जिनका प्रयोग वे न केवल अपने मित्रों दोस्तों और हम उम्र बच्चों के लिए करते हैं ,अपितु अपने बड़े भाई- बहनों ,माता-पिता रिश्तेदारों और अभिभावकों के लिए भी करते हैं। भारतीय संस्कृति का अनुसरण करने वाले ,भारत देश में रहने वाले ,देश के भावी कर्णधारों और नैतिक मूल्यों को ही अपना सब कुछ समझने वाले सभ्य,सुसंस्कृत,संस्कारी और प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा इस तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जाना किसी भी सूरत में तार्किक और उचित नहीं कहा जा सकता।
भारत जैसे सभ्य समाज में तो इस तरह की बातें कतई स्वीकार्य नहीं हैं। भारत तो प्राचीन काल से ही अपनी विशेष सभ्यता संस्कृति और बड़ों के प्रति आदर सम्मान के लिए जाना जाता रहा है ।हमें कभी भी ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे हमारे राष्ट्र की प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंचे और विश्व गुरु कहे जाने वाले हमारे राष्ट्र को किसी अन्य राष्ट्र के सामने सिर्फ इस बात के लिए शर्मिंदा होना पड़े कि इस देश के नागरिक भी अब पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के रंग में रंगते जा रहे हैं ,जहां छोटे बड़े का कोई फर्क नहीं समझा जाता, अपने से बड़ों के प्रति सम्मान- अपमान से कोई फर्क नहीं पड़ता और साथ ही अपने छोटों के प्रति स्नेही होना कोई विशेष मायने नहीं रखता।
इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न न होने पाए, इसके लिए हमें आज से ही नहीं,अपितु अभी से ही अपनी सभ्यता को पुनर्जीवित करना होगा, अपनी संस्कृति को रिफ्रेश करना होगा और संस्कारों को अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना होगा। वर्तमान पीढ़ी के बच्चों को नैतिक मूल्यों और मानव मूल्यों की वास्तविकता से अवगत कराना होगा।उन्हें समझाना होगा कि जीवन मूल्य और नैतिक मूल्य हमारे लिए क्या मायने रखते हैं । नैतिकता का वरण करना हमें ही तो उन्हें सिखाना होगा।

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हमें उनके अभिभावक और माता पिता होने का सच्चा फर्ज निभाना होगा ताकि हमारी परवरिश पर भविष्य में हमें न पछताना पड़े। हमें ही अपने बच्चों को बड़ों का आदर सम्मान करना सिखाना होगा ,छोटों के प्रति मन में स्नेह का भाव जागृत करना होगा ,उनके भीतर से हर चीज को हल्के में लेने की आदत को खत्म करना होगा। हमें उन्हें समझाना होगा कि हमें अपनी भारतीय संस्कृति को पहले से कहीं अधिक तीव्रता से विकसित करना है जिसके लिए हमें नैतिकता का वरण करना होगा ,अपनी संस्कृति और सभ्यता को साथ लेकर चलना होगा, अपनी शब्दावली में सभ्य और सुसंस्कृत शब्दों को शामिल करना होगा ताकि हमारे संस्कार हमारे व्यवहार में स्पष्ट रूप से झलकें और हम सदैव की भांति पूरे विश्व के समक्ष सिर ऊंचा कर और सीना तानकर चलने का साहस जुटा सकें और अपने देश को नैतिकता की राह पर अग्रसर करने में अपना पूरा योगदान दे सकें।
               पिंकी सिंघल

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