पत्रकार बनाम नौटंकी!

पत्रकार यानि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ। पत्रकार शब्द सुनते ही लोगों के मन में एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि उभरती है जो हर सही या गलत की समझ रखते हुए लोगों की आवाज़ बनता है और उनके हक की बात जिम्मेदारों के समक्ष रखता है। इस बुद्धजीवी के हर सही या गलत लेख पर देश का भविष्य और वर्तमान निर्धारित होता है।
अगर कहें तो सबसे पहले देश का संविधान बना, जिसमें कानून बनाने की लिए विधानपालिका व उसे चलाने के लिए कार्यपालिका की व्यवस्था थी।संविधान द्वारा बनाए गए नियमों की देख-रेख के लिए न्यायपालिका की व्यवस्था की गई। उक्त तीनों जब अपने कार्य से भागने लगे, तब सवाल उठा कि इन्हें इनकी जिम्मेदारियों का अहसास कौन करवाएगा? तब इस पत्रकार रूपी प्राणी का जन्म हुआ।
समय के साथ-साथ समाज के इस प्रबुद्ध वर्ग की शक्तियों और संख्या में शनै:-शनै: इजाफा होता गया। भारत समेत कई देशों में इस वर्ग को विशिष्ट शक्तियां दी गई, ताकि समय पड़ने पर पत्रकार शासन-सत्ता व प्रशासन के खिलाफ अपनी आवाज उठा सके। क्योंकि यह वर्ग समस्त मानव जाति का प्रतिनिधित्व करता है और उनकी आवाज़ बनता है, इसके लिए इसे विशेष अधिकार भी दिए गए। विशेष अधिकार मिलते ही इस मनीषी का ईमान डोल गया और यह भी अन्य लोगों की तरफ हेर-फेर में पड़ गया। इस बात में कोई संशय नहीं है कि ऐसे बहुत कम पत्रकार बचे हैं जो वास्तव में जन-कल्याण की बात ध्यान में रखते हों।
आधुनिकता की भागमभाग के बीच पत्रकारिता का स्वरूप बदल और इस भीड़तंत्र में समाचार चैनलों का पदार्पण हुआ। जिसमें सनसनीखेज खबरें ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर दिखाने की होड़ मच गई। इस आपाधापी में जनता के असली मुद्दे खबरों से कोसों दूर हो गए और इनकी जगह राखी के स्वयंवर और विराट कोहली के पापा बनने की खबरों ने ले लिया। किसी ने विराट के होने वाले बच्चे का नामकरण कर दिया तो किसी ने राखी के संभावित पति को दुनिया का अजूबा घोषित कर दिया।
सुशांत मामले में जिस तरह से मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को देश का सबसे गंभीर मामला बताते हुए दिखाया उसने चैनलों की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया! एक अकेले सुशांत प्रकरण ने किसान, नौजवान और रोजगार जैसे अहम मुद्दों को पीछे धकेल दिया। जितना जरूरी सुशांत राजपूत के हत्यारों का पकड़ा जाना है, उससे कहीं अधिक जरूरी देशभर में कोरोना महामारी के चलते व्याप्त बेरोजगारी और स्वास्थ्य संकट से लोगों को उबारना है। सुशांत प्रकरण की जांच में जुटी एजेंसी समय आने पर हत्या या आत्महत्या का खुलासा तो कर देगी, लेकिन बेरोजगारी से जान गंवाने वाले लोगों की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?
चैनलों की गंभीरता को समझने के लिए मुंबई पर हुए आतंकी हमलों का जिक्र करना बेहद जरूरी है। उस दौरान लगभग सभी चैनलों ने मुबंई में छिपे आतंकवादियों व घेराव करते सुरक्षा बलों को लाइव दिखाया, जिससे आतंकवादी सचेत हो गए। और इसका खामियाजा सुरक्षा एजेंसियों को भुगतान पड़ा। ऐसे कई मामले रहे हैं जहां जिम्मेदार मीडिया ने गैरजिम्मेदाराना हरकतों को अंजाम दिया। तो क्या मीडिया को मिली इस आजादी को छीन लिया जाए? लेकिन तब पत्रकार होने का क्या औचित्य रह जाएगा?
कुछ ऐसा ही हाथरस कांड में मीडिया संस्थानों के बुद्धजीवी पत्रकार साथियों द्वारा देखने को मिला। जिसमें असली खबर कम नौटंकी और करतब ज्यादा दिखा। जिसका परिणाम रहा कि आम आदमी भी इन मुंहनोचवा पत्रकारों की हरकतों से आजिज़ आकर इसके विरोध में सड़कों पर उतर गया। इस घटना ने समाज के इस प्रबुद्ध वर्ग को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि पत्रकारों की सीमाएं भी निर्धारित होनी चाहिए! जिसके लिए जरूरी है कि सेंसर बोर्ड की तर्ज पर यहां भी एक समिति बनाई जाए, जो इनकी ऊलजलूल हरकतों पर कैंची चला सके।
अनुपम चौहान
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